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‘नीच’ शब्द कहना SC/ST एक्ट लगाने के लिए पर्याप्त नहीं, IIT जोधपुर विवाद केस में गंभीर धाराएं रद्द: राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Rajasthan High Court Rules: Saying “Neech” Alone Not Enough to Invoke SC/ST Act, Quashes Key Charges in IIT Jodhpur Case

बंद कार्यालय कक्ष में हुई घटना को “पब्लिक व्यू” मानने से अदालत का इनकार; कहा-जाति के आधार पर अपमान का स्पष्ट इरादा और सार्वजनिक दृष्टि दोनों होना अनिवार्य

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने SC/ST एक्ट लागू करने के लिए आवश्यक आधार और कानूनी बिंदुओं को तय करते हुए ऐतिहासिक और रिपोर्टेबल फैसले के जरिए महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने रिपोर्टेबल फैसले के जरिए यह स्पष्ट किया है कि केवल ‘नीच’ शब्द कहना SC/ST एक्ट लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

इसके साथ ही राजस्थान हाईकोर्ट ने एक और कानूनी बिंदु को स्पष्ट करते हुए कहा कि किसी बंद कार्यालय कक्ष में सीमित कर्मचारियों की उपस्थिति में हुई कथित घटना को “पब्लिक व्यू” (सार्वजनिक जगह पर हुई घटना) नहीं माना जा सकता, जो कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की कुछ धाराओं को लागू करने के लिए अनिवार्य शर्त है।

जस्टिस संदीप शाह ने यह ऐतिहासिक फैसला IIT जोधपुर के एक एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. दीपक अरोड़ा के खिलाफ दर्ज एफआईआर की कई गंभीर धाराओं को निरस्त करते हुए दिया है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने इसी फैसले में “पब्लिक सर्वेंट” जैसे कानूनी शब्दों की विस्तृत व्याख्या की है।

ये है मामला

IIT जोधपुर के कार्यवाहक रजिस्ट्रार अंकुर गुप्ता की शिकायत पर थाना करवड़, जिला जोधपुर सिटी ईस्ट में 2 सितंबर 2025 को एफआईआर संख्या 118/2025 दर्ज की गई.

इस एफआईआर में याचिकाकर्ता एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. दीपक अरोड़ा के खिलाफ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धाराओं 3(1)(r), 3(1)(s) तथा 3(2)(va) के तहत मामला दर्ज किया गया।

एफआईआर के अनुसार, 2 सितंबर 2025 को लगभग 11:30 बजे निदेशक कार्यालय में चर्चा के दौरान आरोप है कि डॉ. दीपक अरोड़ा ने निदेशक प्रो. अविनाश अग्रवाल पर हमला करने का प्रयास किया और मारपीट की।

आत्मरक्षा में निदेशक ने उनके हाथ पकड़ लिए, जिस पर आरोप है कि डॉ. अरोड़ा ने उन्हें लात मारी और बाहर जाने का रास्ता अवरुद्ध कर दिया। हस्तक्षेप करने आए अधिकारियों के साथ भी कथित मारपीट तथा विवेक गौतम को जातिसूचक शब्द कहकर धमकाने का आरोप लगाया गया।

शिकायत में आरोप लगाया गया कि निदेशक के कार्यालय में हुई एक बैठक के दौरान प्रोफेसर ने संस्थान के निदेशक के साथ धक्का-मुक्की की और बीच-बचाव करने आए एक कर्मचारी विवेक गौतम को कथित रूप से अपमानित करते हुए “नीच” शब्द का प्रयोग किया।

प्रोफेसर ने इन आरोपों को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में एफआईआर निरस्त करने की याचिका दायर की और कहा कि शिकायत में लगाए गए आरोप कानूनी रूप से संबंधित धाराओं के आवश्यक तत्वों को पूरा नहीं करते।

याचिका में दलीलें

प्रोफेसर डॉ. दीपक अरोड़ा की ओर से दायर याचिका में कहा गया कि एफआईआर में लगाए गए आरोपों को यदि पूरी तरह सही भी मान लिया जाए, तब भी संबंधित धाराओं के आवश्यक कानूनी तत्व सिद्ध नहीं होते।

अधिवक्ता ने तर्क दिया कि कथित घटना निदेशक के बंद कार्यालय कक्ष में हुई थी, जहां आम जनता की कोई पहुंच नहीं थी। इसलिए इसे “पब्लिक व्यू” नहीं माना जा सकता, जबकि अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धाराएं लागू होने के लिए यह आवश्यक शर्त है कि कथित अपमान सार्वजनिक दृष्टि में हुआ हो।

अधिवक्ता ने यह भी कहा कि शिकायत में जिस “नीच” शब्द के प्रयोग का आरोप लगाया गया है, वह किसी विशेष जाति का उल्लेख नहीं करता और सामान्य अपमानजनक शब्द है। इसलिए इसे जातिसूचक टिप्पणी मानकर एससी/एसटी एक्ट की धाराएं लगाना कानून की मंशा के विपरीत है।

अधिवक्ता ने दलील दी कि एफआईआर में यह भी स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया कि कथित रूप से अपमान करने का उद्देश्य जाति के आधार पर अपमानित करना था। किसी व्यक्ति के अनुसूचित जाति से होने का ज्ञान मात्र पर्याप्त नहीं है; अपराध सिद्ध करने के लिए जाति के आधार पर अपमान का स्पष्ट इरादा होना आवश्यक है।

इसके अलावा याचिकाकर्ता की ओर से यह भी दलील दी गई कि जांच के दौरान दर्ज गवाहों के बयानों में भी जातिसूचक शब्दों के प्रयोग का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि एफआईआर में लगाए गए गंभीर आरोप तथ्यों से समर्थित नहीं हैं।

सरकार ने कहा कोर्ट हस्तक्षेप नहीं कर सकता

मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और शिकायतकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि एफआईआर में संज्ञेय अपराध के स्पष्ट आरोप हैं और ऐसे मामलों में प्रारंभिक चरण में अदालत को जांच प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

सरकार ने कहा कि शिकायत के अनुसार घटना के समय कई कर्मचारी मौजूद थे और उनके सामने ही आरोपी ने अनुसूचित जाति के कर्मचारी को अपमानित किया। इसलिए यह कहा जाना गलत है कि घटना “पब्लिक व्यू” में नहीं हुई। कर्मचारियों की उपस्थिति ही यह दर्शाती है कि कथित अपमान सार्वजनिक दृष्टि में हुआ था।

राज्य पक्ष ने यह भी कहा कि आरोपी को यह जानकारी थी कि संबंधित कर्मचारी अनुसूचित जाति से है और इसके बावजूद उसे अपमानित किया गया, जिससे आरोपी की मंशा स्पष्ट होती है।

इसके अतिरिक्त प्रतिवादी पक्ष ने यह भी दलील दी कि IIT जैसे केंद्रीय संस्थान के निदेशक को कानून के तहत “पब्लिक सर्वेंट” माना जा सकता है, क्योंकि वे सरकारी अधिनियम के तहत नियुक्त होते हैं और सार्वजनिक दायित्व निभाते हैं।

राज्य पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि यदि एफआईआर में अपराध के प्रारंभिक तत्व दिखाई देते हों तो अदालत को जांच पूरी होने से पहले कार्यवाही रद्द नहीं करनी चाहिए। इसलिए याचिका खारिज कर पुलिस को जांच जारी रखने की अनुमति दी जानी चाहिए।

मुख्य कानूनी बिंदु

राजस्थान हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामले में फैसले के लिए चार अहम कानूनी बिंदु तय किए। हाईकोर्ट ने चार कानूनी बिंदुओं को लेकर दोनों पक्षों से सवाल करते हुए इन्हें निर्धारित किया—

क्या सरकारी कार्यालय कक्ष में हुई कथित घटना “पब्लिक व्यू” में हुई मानी जा सकती है?
क्या “नीच” शब्द का प्रयोग जातिसूचक अपमान माना जा सकता है?
क्या IIT निदेशक को “पब्लिक सर्वेंट” की श्रेणी में माना जाएगा?
क्या एफआईआर में वर्णित आरोप प्रथम दृष्टया संबंधित धाराओं का गठन करते हैं?

राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला

‘नीच’ शब्द पर स्पष्ट फैसला

इस मामले में SC/ST एक्ट लागू करने के लिए “नीच” शब्द पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट व्याख्या करते हुए कहा कि “नीच” शब्द का अर्थ सामान्य रूप से “घटिया” या “निम्न स्तर का” होता है और यह किसी विशेष जाति को इंगित करने वाला शब्द नहीं है।

इसलिए केवल ‘नीच’ शब्द का प्रयोग अपने-आप में जातिसूचक टिप्पणी नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि एससी/एसटी एक्ट की धारा लागू होने के लिए स्पष्ट रूप से जाति का उल्लेख या जाति के आधार पर अपमान का इरादा सिद्ध होना आवश्यक है। यदि ऐसा स्पष्ट तत्व मौजूद नहीं है तो संबंधित धाराएं लागू नहीं की जा सकतीं।

हाईकोर्ट को कई गवाहों के बयानों में जातिसूचक शब्दों के प्रयोग का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिला। कुछ गवाहों ने बाद के पूरक बयानों में भी केवल “नीच” शब्द का उल्लेख किया, जो जाति-विशेष से संबंधित नहीं था।

अदालत ने कहा कि जब आरोपों में आवश्यक कानूनी तत्व स्पष्ट रूप से मौजूद न हों, तब ऐसी धाराओं के आधार पर अभियोजन जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जा सकता है।

‘पब्लिक व्यू’ की अवधारणा

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सरकारी कार्यालय कक्ष को लेकर कहा कि एससी/एसटी एक्ट की धाराओं 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत अपराध सिद्ध होने के लिए यह आवश्यक है कि कथित अपमान या धमकी “किसी सार्वजनिक दृष्टि वाले स्थान” पर हुई हो।

अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी कार्यालय के बंद कमरे में, जहां केवल सीमित कर्मचारी मौजूद हों और आम जनता की पहुंच न हो, उस स्थान को “पब्लिक व्यू” नहीं माना जा सकता।

फैसले में कहा गया कि “पब्लिक व्यू” का अर्थ केवल सार्वजनिक स्थान नहीं बल्कि ऐसा स्थान है जहां बड़ी संख्या में सामान्य लोग घटना को देख या सुन सकें। सीमित संख्या में परिचित कर्मचारियों की उपस्थिति इस मानक को पूरा नहीं करती।

एफआईआर रद्द करने की शक्ति

राजस्थान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले भजनलाल केस सहित कई मामलों का हवाला देते हुए कहा कि सामान्यतः अदालतें जांच प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करतीं, लेकिन यदि प्रथम दृष्टया आरोप किसी अपराध का गठन ही नहीं करते, तो न्यायालय के पास एफआईआर निरस्त करने की शक्ति है।

अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में अदालत का दायित्व है कि वह यह सुनिश्चित करे कि आपराधिक कानून का दुरुपयोग न हो और निर्दोष व्यक्ति अनावश्यक मुकदमेबाजी में न फंसे।

“पब्लिक सर्वेंट” की स्पष्ट परिभाषा

मामले में यह भी तर्क दिया गया कि IIT निदेशक “पब्लिक सर्वेंट” की श्रेणी में आते हैं या नहीं।

हाईकोर्ट ने संबंधित कानूनों और परिभाषाओं का विश्लेषण करते हुए यह माना कि कुछ परिस्थितियों में संस्थान के अधिकारी सार्वजनिक सेवक की श्रेणी में आ सकते हैं, लेकिन संबंधित धाराओं के लागू होने के लिए अन्य आवश्यक तत्व भी सिद्ध होना जरूरी है।

हाईकोर्ट ने कहा कि केवल किसी अधिकारी का पद ही पर्याप्त नहीं है; अपराध के अन्य कानूनी तत्व भी पूरे होने चाहिए।

अंतिम फैसला

सभी पक्षों की दलीलें और कानूनी बिंदु तय करने के साथ ही हाईकोर्ट ने सरकारी कार्यालय कक्ष में हुई कथित घटना बंद कार्यालय कक्ष में होने के आधार पर “पब्लिक व्यू” मानने से इनकार किया।

इसके साथ ही “नीच” शब्द को जातिसूचक अपमान नहीं मानने से भी इनकार करते हुए कहा कि एफआईआर में वर्णित तथ्य संबंधित धाराओं के आवश्यक तत्वों को प्रथम दृष्टया सिद्ध नहीं करते।

इन आधारों पर अदालत ने एससी/एसटी एक्ट से संबंधित धाराओं सहित कई गंभीर आरोपों को निरस्त कर दिया।

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