हाईकोर्ट ने एफआईआर रद्द करते हुए कहा उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों से अधिक परिपक्वता, संयम और जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है।
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने IAS पति-पत्नी के बीच लंबे समय से चल रहे वैवाहिक विवाद से जुड़े आपराधिक प्रकरण में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति-पत्नी के बीच सभी विवाद आपसी समझौते से समाप्त हो चुके हैं और ऐसे में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।
जस्टिस अनिल कुमार उपमन की एकलपीठ ने IAS अधिकारी पति तथा अन्य सह-आरोपियों की ओर से दायर आपराधिक याचिका का निस्तारण करते हुए पारित किया।

यह मामला उस समय चर्चा में आया था जब राजस्थान कैडर की IAS अधिकारी भारती दीक्षित ने अपने पति IAS अधिकारी आशीष मोदी के खिलाफ गंभीर आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी।
शिकायत के आधार पर जयपुर के एसएमएस थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी, जिसमें मारपीट, अवैध रूप से बंधक बनाकर रखने और निजी डेटा तक अवैध पहुंच जैसे आरोप शामिल थे।
उस समय जयपुर पुलिस ने मामले की जांच भी प्रारंभ कर दी थी और प्रदेशभर में यह मामला चर्चा का विषय बन गया था।
शिकायत में लगाए गए थे गंभीर आरोप
शिकायत के अनुसार, भारती दीक्षित ने राज्य पुलिस प्रमुख को लिखित शिकायत देकर आरोप लगाया था कि उनके पति आशीष मोदी ने उनसे गलत तथ्यों के आधार पर विवाह किया और बाद में कई वर्षों तक शारीरिक तथा मानसिक उत्पीड़न किया।
शिकायत में यह भी कहा गया था कि उन्हें कुछ समय तक अवैध रूप से रोककर रखा गया तथा उनके निजी डेटा और व्यक्तिगत जानकारी तक भी अवैध तरीके से पहुंच बनाई गई।
इन आरोपों को गंभीर मानते हुए पुलिस ने 7 नवंबर 2025 को एफआईआर दर्ज की थी।
उस समय भारती दीक्षित राज्य के वित्त विभाग में संयुक्त सचिव के पद पर कार्यरत थीं, जबकि आशीष मोदी सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग में निदेशक के पद पर तैनात थे।
दोनों उच्च प्रशासनिक पदों पर होने के कारण यह मामला प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में भी काफी चर्चा में रहा।
हाईकोर्ट में दायर की गई थी याचिका
एफआईआर दर्ज होने के बाद आशीष मोदी तथा अन्य आरोपियों ने राजस्थान हाईकोर्ट में आपराधिक याचिका दायर करते हुए एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता सुधीर जैन ने अदालत में पक्ष रखते हुए कहा कि पति-पत्नी के बीच उत्पन्न विवाद अब पूरी तरह समाप्त हो चुका है और दोनों पक्ष आपसी समझौते पर पहुंच चुके हैं। इसलिए आपराधिक मुकदमे को जारी रखना न्यायहित में नहीं होगा।
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि पति-पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी के तहत आपसी सहमति से तलाक की याचिका पारिवारिक न्यायालय में दायर की थी, जिसे 15 दिसंबर 2025 को स्वीकार कर लिया गया।
तलाक की प्रक्रिया पूर्ण होने के साथ ही दोनों पक्षों ने अपने सभी विवाद समाप्त करने का निर्णय लिया।
सह-आरोपियों के खिलाफ मुकदमा
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायालय ने कहा कि यह विवाद मूल रूप से वैवाहिक संबंधों से उत्पन्न हुआ था और अब जब दोनों पक्ष आपसी समझौते से अपने मतभेद समाप्त कर चुके हैं, तब आपराधिक कार्यवाही को जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है।
अदालत ने यह भी कहा कि पति-पत्नी के बीच विवाद समाप्त होने के बाद सह-आरोपियों के खिलाफ मुकदमा जारी रखना भी न्यायसंगत नहीं होगा, विशेष रूप से तब जब उनकी स्वतंत्र और ठोस भूमिका स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं होती है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि ऐसे मामलों में न्यायालयों को व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए ताकि आपराधिक न्याय प्रणाली का अनावश्यक उपयोग न हो।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलो का हवाला देते हुए कहा कि वैवाहिक विवादों में अक्सर रिश्तेदारों या सहयोगियों को भी आरोपी बना दिया जाता है, जबकि उनकी भूमिका स्पष्ट रूप से प्रमाणित नहीं होती।
ऐसे मामलों में न्यायालयों का दायित्व है कि तथ्यों का गहन परीक्षण कर न्यायसंगत निर्णय दिया जाए।
उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों से अपेक्षित जिम्मेदारी
हाईकोर्ट ने इस मामले में टिप्पणी करते हुए कहा कि दोनों पक्ष भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं और ऐसे पदों पर आसीन व्यक्तियों से अधिक परिपक्वता, संयम और जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक सेवा में कार्यरत अधिकारियों को निजी विवादों के समाधान में भी संतुलित और जिम्मेदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, ताकि अनावश्यक आपराधिक मुकदमों की स्थिति उत्पन्न न हो।
समझौते के आधार पर रद्द हुई एफआईआर
हाईकोर्ट ने यह मानते हुए कि दोनों पक्षों ने आपसी सहमति से अपने सभी विवाद सुलझा लिए हैं और तलाक की प्रक्रिया भी पूरी हो चुकी है, एफआईआर को रद्द करने का आदेश दे दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब शिकायतकर्ता स्वयं विवाद समाप्त होने की पुष्टि कर रहा है और आगे किसी प्रकार की कार्रवाई की आवश्यकता नहीं है, तब आपराधिक मुकदमे को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।