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94 की उम्र में भी कानून के गुरु: जब एक व्यक्ति अपने चरित्र, न्याय और सिद्धांतो के बलबूते पर एक पूरी संस्था बन जाता हैं- जस्टिस वी. एस. दवे मना रहे 95 वां जन्मदिन

Justice V. S. Dave Turns 95: The Veteran Jurist Who Continues to Inspire Generations of Legal Professionals

देश के सबसे वयोवृद्ध सक्रिय सेवानिवृत्त हाईकोर्ट न्यायाधीश जो, आज भी प्रतिदिन विद्यार्थियों को पढ़ा रहे कानून की भाषा; राजस्थान के प्रथम विधि आयोग अध्यक्ष के रूप में भी निभाई ऐतिहासिक भूमिका

जयपुर। उम्र जब 90 के पार पहुँच जाती है, तो सामान्यतः लोग सार्वजनिक जीवन से दूर हो जाते हैं, लेकिन राजस्थान हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस विनोद शंकर दवे (जस्टिस वी. एस. दवे) इस धारणा को हर दिन गलत साबित कर रहे हैं। आज वे अपने जीवन के 94वें वर्ष में प्रवेश कर चुके हैं, फिर भी उनकी दिनचर्या, ऊर्जा और समाज के प्रति समर्पण ऐसा है कि युवा पीढ़ी भी उनसे प्रेरणा लेती है।

देश के न्यायिक इतिहास में वे सबसे वयोवृद्ध सक्रिय सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जज के रूप में जाने जाते हैं, जो आज भी प्रतिदिन कानून के विद्यार्थियों को पढ़ा रहे हैं और नई पीढ़ी को न्याय की भाषा सिखा रहे हैं।

जस्टिस वी. एस. दवे केवल एक पूर्व न्यायाधीश नहीं, बल्कि एक ऐसी संस्था बन चुके हैं, जिनके अनुभव, मार्गदर्शन और अनुशासन ने तीन पीढ़ियों के अधिवक्ताओं को आकार दिया है।

सेवानिवृत्ति के लगभग 32 वर्ष बाद भी उनका कार्यालय उतना ही सक्रिय है, जितना उनके हाईकोर्ट जज रहने के समय था।

जस्टिस वी. एस. दवे आज अपने जीवन के 95 वें वर्ष में प्रवेश कर चुके हैं, लेकिन उनकी दिनचर्या, कार्यशैली और समाज के प्रति समर्पण देखकर यह विश्वास करना कठिन हो जाता है कि वे नौ दशक पार कर चुके हैं।

न्यायपालिका में लगभग चार दशकों की सक्रिय सेवा और सेवानिवृत्ति के बाद तीन दशकों से अधिक समय तक लगातार विधि शिक्षा और सामाजिक जागरूकता में योगदान-यह यात्रा उन्हें एक व्यक्ति से अधिक एक संस्था बनाती है।

बूंदी से शुरू हुआ न्याय का सफर

जस्टिस वी. एस. दवे का जन्म 16 फरवरी 1932 को राजस्थान के बूंदी में हुआ।

उनके पिता स्वर्गीय जस्टिस दुर्गा शंकर दवे राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे, जिससे उन्हें प्रारंभ से ही विधि और न्याय के संस्कार मिले।

बूंदी और कोटा में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने जयपुर और जोधपुर के प्रतिष्ठित महाविद्यालयों में अध्ययन किया और अहमदाबाद के सर एल.ए. शाह लॉ कॉलेज से विधि स्नातक की डिग्री प्राप्त की।

अधिवक्ता से न्यायाधीश तक-एक प्रेरक यात्रा

1959 में अधिवक्ता के रूप में नामांकन के बाद जस्टिस दवे ने जोधपुर में वकालत शुरू की और जल्द ही वे दीवानी, आपराधिक, संवैधानिक और राजस्व मामलों के सफल अधिवक्ता के रूप में पहचान बनाने लगे।

जल्द ही अपनी गहन कानूनी समझ, सशक्त तर्कशक्ति और मेहनत के बल पर उन्होंने अग्रणी अधिवक्ताओं की श्रेणी में स्थान बना लिया।

दीवानी, आपराधिक, संवैधानिक और राजस्व मामलों में उनकी दक्षता ने उन्हें विशेष पहचान दिलाई।

उनकी विधिक क्षमता के कारण उन्हें भारत सरकार, सीबीआई और केंद्रीय राजस्व विभाग के मामलों में वरिष्ठ स्थायी अधिवक्ता नियुक्त किया गया।

इसके बाद उनका सार्वजनिक जीवन और भी व्यापक होता गया और अंततः उन्हें राजस्थान हाईकोर्ट के जज के रूप में नियुक्त किया गया।

राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ की स्थापना के बाद वे जयपुर स्थानांतरित हुए और यहाँ भी उन्होंने अपनी पहचान कायम की।

अधिवक्ता संगठनों में नेतृत्व

जस्टिस दवे केवल सफल अधिवक्ता ही नहीं रहे, बल्कि अधिवक्ता संगठनों में भी उन्होंने महत्वपूर्ण नेतृत्व दिया।

वर्ष 1963 में वे बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया की गवर्निंग काउंसिल के सदस्य चुने गए और 1964 से 1984 तक लगातार राजस्थान स्टेट बार काउंसिल के सदस्य रहे।

वे दो बार राजस्थान हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष निर्वाचित हुए।

राजस्थान हाईकोर्ट के 25वें वर्ष में आयोजित कई कार्यक्रम आज भी देशभर में याद किए जाते हैं।

राजस्थान हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में

12 जून 1984 को उन्हें राजस्थान हाईकोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया और लगभग एक दशक तक उन्होंने न्यायपालिका में महत्वपूर्ण सेवाएँ दीं।

10 वर्ष की सेवा के बाद वे राजस्थान हाईकोर्ट से 15 फरवरी 1994 को सेवानिवृत हुए.

अपने न्यायिक कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई संवैधानिक, प्रशासनिक और जनहित से जुड़े मामलों में संतुलित और दूरदर्शी निर्णय दिए, जिनका प्रभाव लंबे समय तक न्यायिक व्यवस्था पर देखा गया।

उनका न्यायिक दृष्टिकोण हमेशा न्याय की मूल भावना—निष्पक्षता, पारदर्शिता और संवेदनशीलता—पर आधारित रहा, जिसके कारण वे अधिवक्ताओं और न्यायिक समुदाय में अत्यंत सम्मानित रहे।

आयोगों और संवैधानिक जिम्मेदारियों में अहम भूमिका

राजस्थान हाईकोर्ट से रिटायर होने के बाद जस्टिस वी एस दवे के कार्यक्षेत्र और भी ज्यादा बढ गया.

एक ओर जहां हाईकोर्ट के जज सेवानिवृत होकर अपने परिवार में रम जाते है वही जस्टिस दवे जयपुर शहर की इबारत लिखने में लग गए.

जस्टिस दवे देश और विदेश में बेहद मांग वाले सेवानिवृत जज बन गए. रिटायर होने के बाद भी सरकारें और अदालतों से उन्हे कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारिया दी गयी.

1987 में गुजरात में आरक्षण विरोधी और साम्प्रदायिक दंगों की जांच के लिए गठित एक सदस्यीय आयोग के अध्यक्ष रहे।

राजस्थान के पहले लॉ आयोग चैयरमेन

1993 में वे राजस्थान राज्य विधि आयोग के प्रथम अध्यक्ष नियुक्त हुए और राज्य की विधिक नीतियों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

1994 में कार्यवाहक लोकायुक्त के रूप में उन्होंने प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत किया।

बाद में राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग के अध्यक्ष के रूप में उपभोक्ता अधिकारों को सशक्त बनाने में अहम भूमिका निभाई।

विधि शिक्षा और युवा अधिवक्ताओं के मार्गदर्शक

जस्टिस वी एस दवे ने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा विधि शिक्षा और युवा अधिवक्ताओं के मार्गदर्शन को समर्पित किया।

वे होम्योपैथी विश्वविद्यालय, जयपुर के संस्थापक अध्यक्ष रहे और कई शैक्षणिक संस्थानों के संचालन तथा विकास में सक्रिय भूमिका निभाई।

वर्ष 2005 से वे राजस्थान एजुकेशन ट्रस्ट के ट्रस्टी के रूप में विधि विद्यार्थियों के लिए लाइब्रेरी इंटर्नशिप, विधिक जागरूकता कार्यक्रम, स्मारक व्याख्यान और शैक्षणिक गतिविधियों का संचालन कर रहे हैं, जिससे नई पीढ़ी के अधिवक्ताओं को दिशा मिल रही है।

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व

जस्टिस दवे ने कई अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों और मंचों पर भारत और राजस्थान का प्रतिनिधित्व किया।

विश्व शांति संसद, संयुक्त राष्ट्र से जुड़े कार्यक्रमों, खाद्य सुरक्षा सम्मेलन और उपभोक्ता अधिकारों से संबंधित अंतरराष्ट्रीय बैठकों में उन्होंने सक्रिय भागीदारी निभाई।

जस्टिस दवे ने यूरोप, अमेरिका, रूस, मध्य एशिया और कई अन्य देशों की यात्राएँ कर अंतरराष्ट्रीय अनुभवों को भारतीय न्याय और सामाजिक व्यवस्था से जोड़ने का प्रयास किया।

तीन पीढ़ियों के जज तैयार करने वाले गुरु

जस्टिस वी. एस. दवे का सबसे बड़ा योगदान यह है कि उनके कार्यालय से जुड़े अधिवक्ताओं की तीन पीढ़ियाँ आगे बढ़कर न्यायपालिका के उच्च पदों तक पहुँची हैं और कई अधिवक्ता हाईकोर्ट जज के पद से सेवानिवृत्त भी हो चुके हैं।

उनके शिष्य आज सुप्रीम कोर्ट के से लेकर देश के विभिन्न हाईकोर्ट में न्यायाधीश, वरिष्ठ अधिवक्ता और विधिक विशेषज्ञ के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी अपने वकालत के शुरुआती दिनों में जस्टिस वी. एस. दवे के कार्यालय में समय बिताया था।

समाजसेवा और जनजागरूकता के क्षेत्र में सक्रियता

जस्टिस दवे समाजसेवा के क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहे। वे दिव्यांग और नेत्रहीन कल्याण से जुड़ी संस्थाओं के संरक्षक रहे तथा कई सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर शिक्षा और जनजागरूकता के कार्यक्रम संचालित करते रहे।

उन्होंने मानवाधिकार, महिला अधिकार, बाल अधिकार और अपराध-समाज जैसे विषयों पर हिंदी में कई पुस्तिकाएँ प्रकाशित कर आम नागरिकों तक कानून की जानकारी पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

सार्वजनिक जीवन में सादगी और सिद्धांतों की मिसाल

जस्टिस दवे का पूरा जीवन सादगी, अनुशासन और सार्वजनिक उत्तरदायित्व का उदाहरण रहा है।

न्यायिक पद पर रहते हुए उन्होंने निष्पक्षता और पारदर्शिता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी और सेवानिवृत्ति के बाद भी समाज और शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय बने रहे।

जस्टिस दवे के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने कानून को केवल अदालत की सीमाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि समाज में जागरूकता और जनहित के माध्यम के रूप में भी विकसित किया।

जन्मदिन पर देश-प्रदेश से शुभकामनाएँ

आज उनके 94 वर्ष कर 95 वें साल में प्रवेश किया हैं उनके जन्मदिन पर न्यायिक समुदाय, अधिवक्ता संगठन, शिक्षण संस्थान और सामाजिक संगठनों द्वारा उन्हें सम्मानपूर्वक शुभकामनाएँ दी जा रही हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ताओं और न्यायिक अधिकारियों का कहना है कि जस्टिस वी.एस. दवे का जीवन नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा है—यह बताता है कि कानून का असली उद्देश्य केवल निर्णय देना नहीं बल्कि समाज को न्याय और जागरूकता की दिशा देना भी है।

सेवानिवृत्ति नहीं, समाज सेवा का नया अध्याय

अधिकांश लोग सेवानिवृत्ति को विश्राम का समय मानते हैं, लेकिन जस्टिस वी. एस. दवे ने इसे समाज सेवा का नया अध्याय बना दिया।

लगभग तीन दशक से अधिक समय से वे लगातार कानूनी शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं।

आज जब वे अपना जन्मदिन मना रहे हैं तब भी उनके कार्यालय में लॉ स्टूडेंट्स और युवा अधिवक्ताओं की तादाद मौजूद है, जो उनसे कानूनी लेखन, कोर्ट क्राफ्ट और पेशेवर नैतिकता की बारीकियाँ सीख रही हैं।

94 वर्ष की आयु में भी उनका नियमित रूप से विद्यार्थियों को पढ़ाना अपने आप में एक दुर्लभ उदाहरण है।

वे छात्रों को केवल कानून की किताबें नहीं पढ़ाते, बल्कि उन्हें न्याय की सोच, तर्क की मजबूती और पेशे की जिम्मेदारी भी समझाते हैं।

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