26 लाख करोड़ के मासिक डिजिटल लेनदेन में सिर्फ 1.7% राशि साइबर अपराध की जद में; ‘डिजिटल अरेस्ट’ को बताया सबसे खतरनाक और मानसिक उत्पीड़न वाला ट्रेंड
जयपुर, 21 फरवरीं। साईबर क्राइम इतना बड़ा मुद्दा नहीं है जितना इसके लिए हौवा खड़ा किया जा रहा हैं.
ये कहना हैं राजस्थान हाईकोर्ट के जज जस्टिस अशोक कुमार जैन का, जस्टिस अशोक कुमार जैन रालसा की आरे आयोजित तीन दिवसीय साईबर सुरक्षा की नेशनल कार्फेस के दूसरे सत्र को संबोाित कर रहे थे.
उन्होने आज हमारे देश में कुल 26 लाख लाख करोड़ रूपये का प्रतिमाह डीजीटल लेनदेन हो रहा हैं और हमारे देश मे ये बहुत सुगमता से हो रहा हैं. और इसका संपूर्ण मोनिटरिंग आरबीआई करता है। और अगर आप देखे तो साइबर क्राइम में सिर्फ 1.7 प्रतिशत राशि ही साईबर क्राइम में जा रहा हैं.
बहुत ज्यादा होवा
जस्टिस अशोक कुमार जैन ने कहा कि साईबर क्राइम के बारे में बहुत ज्यादा होवा खड़ा किया जा रहा हैं लेकिन ये इतना बड़ा नहीं है
जस्टिस अशोक जैन ने कहा कि हम ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है हमें सबसे ज्यादा अगर किसी बारे में सोचना हैं तो वह हैं डिजिटल अरेस्ट क्योंकि ये मानव जीवन को नुकसान में डाल रहा हैं.
मोबाईल, इंटरनेट या डिजिटल लेनदेन से डरे नही बल्कि ये आपकी सुविधाए है। जो हमारे देश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद जरूरी हैं.
इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की भूमिका
सत्र को संबोधित करते हुए जस्टिस अशोक कुमार जैन ने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की भूमिका अपनी बात रखते हुए कहा कि डिजिटल युग में अपराध की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। अब जुर्म केवल सड़कों या बंद कमरों में नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन, सीसीटीवी कैमरों, सर्वर और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी दर्ज हो रहा है।
जस्टिस जैन ने कहा कि ऐसे में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की भूमिका न्याय व्यवस्था में बेहद अहम हो गई है। लेकिन यह साक्ष्य जितना शक्तिशाली है, उतना ही संवेदनशील भी।
उन्होने कहा कि भारत में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65A व 65B के तहत नियंत्रित किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने अनवर पी.वी. बनाम पी.के. बशीर और अर्जुन पंडितराव खोतकर मामले में स्पष्ट किया है कि धारा 65B का प्रमाणपत्र इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की स्वीकार्यता के लिए अनिवार्य है, जब तक कि मूल डिवाइस अदालत में पेश न किया जाए।

सिर्फ स्क्रीनशॉट पर्याप्त नहीं
जस्टिस जैन ने कहा कि सीसीटीवी फुटेज, व्हाट्सएप चैट और डिजिटल फोटोग्राफ जैसे साक्ष्यों की पहचान, संग्रहण, संरक्षण और प्रस्तुतीकरण चार महत्वपूर्ण चरण हैं।
जांच एजेंसियों को तुरंत स्रोत डिवाइस, स्टोरेज माध्यम और समय-सीमा की पहचान करनी होती है, क्योंकि कई डीवीआर सिस्टम 7 से 30 दिनों में डेटा ओवरराइट कर देते हैं।
सिर्फ स्क्रीनशॉट पर्याप्त नहीं माने जाते। फोरेंसिक इमेजिंग, हैश वैल्यू (MD5/SHA) रिकॉर्ड करना और चेन ऑफ कस्टडी बनाए रखना आवश्यक है। जरा सी लापरवाही साक्ष्य को अदालत में खारिज करा सकती है।
डिजिटल सबूत न्याय का मजबूत हथियार है, लेकिन इसकी विश्वसनीयता कानून के सख्त पालन और तकनीकी दक्षता पर निर्भर करती है। डिजिटल युग में न्याय तभी संभव है, जब सच को तकनीकी और विधिक रूप से प्रमाणित किया जाए।