नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने जूस और सामान्य पेय पदार्थों जैसे दिखने वाले tetra packs, sachets और PET bottles जैसे पैकेजिंग फॉर्मेट में बिक रही शराब को लेकर गंभीर चिंता जताई है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे पैक आम fruit juice या soft drink products जैसे दिखाई देते हैं, जिससे underage drinking, सार्वजनिक स्थानों पर शराब सेवन और drunk driving जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है।
मुख्य न्यायाधीश Justice Surya Kant और Justice Joymalya Bagchi की बेंच ने इस मामले में केंद्र सरकार और सभी राज्यों के Excise Departments को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की packaging “बहुत deceptive” यानी भ्रामक दिखाई देती है।
बेंच ने यह टिप्पणी उस जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें मांग की गई है कि शराब की बिक्री को ऐसे पैकेजिंग फॉर्मेट में प्रतिबंधित किया जाए जो fruit juice या सामान्य soft drink products जैसे दिखते हों।
क्या है पूरा मामला और किसने दायर की याचिका
यह मामला Community Against Drunken Driving (CADD) नामक संगठन द्वारा दायर जनहित याचिका से जुड़ा है।
यह संगठन 2001 से drunk driving और underage drinking के खिलाफ अभियान चलाने का दावा करता है।
याचिका में कहा गया है कि देशभर में शराब को अब ऐसे tetra packs और छोटे sachets में बेचा जा रहा है जो देखने में सामान्य juice packs जैसे लगते हैं।
इससे शराब को सार्वजनिक जगहों पर ले जाना और छिपाकर इस्तेमाल करना आसान हो गया है।
याचिका में Bunty Premium Vodka, Chelli Mango Vodka और Romanov Apple Thrill जैसे उत्पादों का उदाहरण देते हुए कहा गया कि इनकी packaging में फलों की तस्वीरें और आकर्षक रंगों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे वे सामान्य beverage products जैसे दिखाई देते हैं।
चेतावनी की कमी पर भी सवाल
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि तंबाकू उत्पादों की तरह शराब पर इस तरह की पैकेजिंग में कोई प्रमुख चेतावनी (warning) नहीं होती।
जहां सिगरेट या तंबाकू पर बड़े-बड़े चेतावनी संदेश अनिवार्य हैं, वहीं इन टेट्रा पैक शराब उत्पादों पर ऐसी कोई स्पष्ट चेतावनी नहीं दी जाती। इससे उपभोक्ताओं को उत्पाद की प्रकृति का सही अंदाजा नहीं लग पाता।
कोर्ट के सामने यह भी कहा गया कि कई उत्पादों में फल के नाम और तस्वीरें इस्तेमाल की जाती हैं, जिससे यह पूरी तरह सामान्य पेय पदार्थ जैसा लगता है।
क्या है सबसे बड़ी चिंता?
याचिका में यह भी बताया गया कि टेट्रा पैक और सैशे में शराब बेचना कंपनियों के लिए सस्ता पड़ता है। इससे शराब की कीमत कम हो जाती है और इसकी उपलब्धता बढ़ जाती है।
साथ ही, यह पैक हल्के, न टूटने वाले और आसानी से छुपाए जा सकने वाले होते हैं, जिससे:
- सार्वजनिक जगहों पर सेवन आसान हो जाता है।
- नाबालिगों में शराब सेवन का खतरा बढ़ सकता है।
- राज्यों के बीच अवैध तरीके से ले जाना आसान हो जाता है।
- ड्रंक ड्राइविंग के मामले बढ़ सकते हैं।
- कानून लागू करने वाली एजेंसियों के लिए निगरानी कठिन हो जाती है।
यह स्थिति सार्वजनिक सुरक्षा और कानून व्यवस्था के लिए भी चुनौती बन सकती है।
याचिका में यह भी कहा गया कि छोटे और सस्ते packs की वजह से शराब कम उम्र के युवाओं तक ज्यादा तेजी से पहुंच रही है। packaging psychology consumer behaviour को प्रभावित करती है और यदि शराब को सामान्य beverage की तरह पेश किया जाएगा तो उससे उसके प्रति social hesitation कम हो सकती है।
इस पर Chief Justice Surya Kant ने टिप्पणी करते हुए कहा कि “यह बहुत deceptive है।”
कोर्ट की यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि पहली बार शीर्ष अदालत ने liquor packaging के presentation और visual appearance को लेकर इतनी गंभीर चिंता जाहिर की है।
एक समान नीति बनाने की मांग
याचिका में मांग की गई है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर शराब की packaging को लेकर uniform national policy तैयार करें। याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की है कि:
- tetra packs, sachets और juice-like containers में शराब की बिक्री पर रोक लगाई जाए।
- Excise Laws में संशोधन कर शराब की bottling केवल glass bottles या visibly distinct containers में सीमित की जाए।
- शराब की packaging पर स्पष्ट warning labels अनिवार्य किए जाएं।
- सभी राज्यों में packaging approval के लिए समान नियम लागू हों।
याचिका में कहा गया है कि फिलहाल अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग excise policies लागू हैं। कई जगह packaging approvals revenue generation को ध्यान में रखकर दिए जा रहे हैं, जबकि public health और public safety concerns को पर्याप्त महत्व नहीं मिल रहा।
संगठन ने यह भी कहा कि कम लागत वाली packaging के कारण शराब ज्यादा सस्ती और ज्यादा accessible हो रही है।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने मौखिक रूप से कहा कि fruit juice जैसे दिखने वाले alcohol packs और इस तरह की अन्य पैकेजिंग पहली नजर में भ्रामक लगती है। अदालत ने माना कि ऐसी packaging बच्चों और आम लोगों को भ्रमित कर सकती है और इससे underage drinking, public consumption और drunk driving जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।
कोर्ट ने भी माना कि tetra packs और sachets की वजह से शराब को सार्वजनिक जगहों पर आसानी से छिपाकर ले जाया जा सकता है।
अदालत ने संकेत दिए कि वह इस मुद्दे को केवल packaging dispute नहीं बल्कि public safety और youth protection से जुड़े गंभीर विषय के रूप में देख रही है।
अब केंद्र और राज्यों को देना होगा जवाब
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और सभी राज्यों के Excise Departments को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
अब सरकारों को अदालत को बताना होगा कि:
- ऐसी packaging को अनुमति क्यों दी जा रही है।
- public safety के लिए क्या safeguards मौजूद हैं।
- underage drinking रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।
अब यदि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में व्यापक दिशा-निर्देश जारी करता है, तो देशभर की alcohol packaging policy और excise rules में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
पहले भी इस मुद्दे पर चिंता जता चुका है सुप्रीम कोर्ट
यह पहला मौका नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट ने tetra pack liquor sales को लेकर चिंता जताई हो। इससे पहले भी मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की बेंच इस विषय पर सवाल उठा चुकी है।
एक अन्य मामले में अदालत ने याचिकाकर्ता को उत्तर प्रदेश Excise Commissioner के सामने अपनी शिकायत रखने की अनुमति दी थी। अब ताजा PIL में अदालत ने सीधे केंद्र सरकार और सभी राज्यों से जवाब मांग लिया है।
क्योंकि सुप्रीम कोर्ट इस मामले को केवल packaging dispute के रूप में नहीं बल्कि public health और youth safety issue के तौर पर देख रहा है।
देशभर की Excise Policy पर पड़ सकता है असर
यदि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में व्यापक दिशानिर्देश जारी करता है, तो इसका असर देशभर की liquor packaging policies पर पड़ सकता है।
संभव है कि आने वाले समय में tetra pack liquor, alcohol sachets, fruit-style branding और juice-like alcohol packaging पर नई पाबंदियां भी लगाई जाएं।
यह मामला public health बनाम excise revenue debate को भी फिर से तेज कर सकता है। कई राज्यों के लिए शराब बिक्री बड़ा revenue source है, लेकिन याचिकाकर्ता का कहना है कि revenue के लिए public safety से समझौता नहीं किया जा सकता।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और सभी राज्यों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अब सरकारों को यह बताना होगा कि ऐसी packaging की अनुमति क्यों दी जा रही है और underage drinking रोकने के लिए क्या safeguards मौजूद हैं।