टॉप स्टोरी

चर्चित खबरें

8 साल से लापता बेटे की तलाश में भटकते पिता को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ी राहत, CBI जांच के आदेश

Rajasthan High Court Orders CBI Probe Into 8-Year-Old Missing Youth Case, Suggests AI-Generated Age Progression Image

सगाई से 5 दिन पूर्व नरेश बंजारा के रहस्यमयी ढंग से गायब होने के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट का अहम आदेश, AI से उम्र बढ़ी हुई तस्वीर तैयार कर देशभर में प्रचारित करने का भी सुझाव

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने करीब आठ वर्षों से लापता जोधपुर के युवक नरेश बंजारा के मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए अब इस मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपने का आदेश दिया है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में माना कि राज्य पुलिस, विशेष जांच दल (SIT) और अन्य एजेंसियों द्वारा वर्षों तक जांच किए जाने के बावजूद कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया है तथा निष्पक्ष और प्रभावी जांच सुनिश्चित करने के लिए अब स्वतंत्र एजेंसी द्वारा जांच आवश्यक है।

जस्टिस अनिल कुमार उपमन की विशेष एकलपीठ ने लापता बेटे के पिता केतन बंजारा की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई कर यह अहम फैसला सुनाया है।

एकलपीठ ने अपने फैसले में कहा कि आठ वर्षों से अधिक समय बीत जाने के बावजूद युवक का कोई पता नहीं चल सका है, जिससे जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगे हैं और पीड़ित परिवार का विश्वास भी प्रभावित हुआ है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सीबीआई को एआई का प्रयोग करते हुए वर्तमान संभावित उम्र के अनुसार लापता युवक की तस्वीर तैयार कर देश की तमाम मीडिया में प्रसारित करने का सुझाव दिया है।

2017 में अचानक लापता हुआ था नरेश

याचिकाकर्ता और लापता बेटे के पिता केतन बंजारा ने हाईकोर्ट को बताया कि 12वीं कक्षा में अध्ययनरत उसके पुत्र नरेश बंजारा 25 नवंबर 2017 को शाम करीब 6 बजे घर से निकला था और फिर वापस नहीं लौटा।

अगले दिन 26 नवंबर 2017 को जोधपुर के प्रतापनगर थाने में गुमशुदगी रिपोर्ट संख्या 86/2017 दर्ज कराई गई।

परिवार और रिश्तेदारों ने अपने स्तर पर भी व्यापक खोजबीन की, लेकिन नरेश का कोई सुराग नहीं मिला।

सगाई से पहले गायब होने पर गहराया शक

याचिकाकर्ता पिता ने अपनी याचिका में आरोप लगाया कि नरेश की सगाई 30 नवंबर 2017 को रीना नामक युवती से होने वाली थी।

लेकिन सगाई से महज पांच दिन पहले उसका अचानक गायब हो जाना संदेह पैदा करता है।

शिकायत में कहा गया कि रीना और सतीश उर्फ शैतान बंजारा के बीच कथित रूप से संबंध थे और सतीश नरेश से रंजिश रखता था।

आरोप लगाया गया कि सतीश, उसकी बहन डिंपल तथा रीना ने मिलकर नरेश के खिलाफ साजिश रची।

याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि आरोपी पक्ष ने नरेश की तस्वीर हासिल करने की कोशिश की थी और उसके आने-जाने की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही थी।

कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) में भी कुछ संदिग्ध संपर्क सामने आने की बात कही गई।

कोर्ट के आदेश पर दर्ज हुई थी FIR

परिवार की शिकायत के बाद मामले को अदालत के समक्ष उठाया गया।

अदालत के निर्देश पर 3 मई 2018 को देवनगर थाने में एफआईआर संख्या 28/2018 दर्ज की गई, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 364 (अपहरण), 302 (हत्या) और 120-बी (आपराधिक षड्यंत्र) के आरोप शामिल किए गए।

कई बार हाईकोर्ट पहुंचा परिवार

नरेश का पता नहीं चलने पर उसके पिता ने पिछले 8 सालों से लगातार विभिन्न मंचों पर न्याय की गुहार लगाते रहे।

सबसे पहले उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर जांच में लापरवाही का आरोप लगाया।

हालांकि उस समय कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए जांच अधिकारी को निष्पक्ष और त्वरित जांच करने के निर्देश दिए।

इसके बाद परिवार ने हेबियस कॉर्पस याचिका दायर की, जिस पर हाईकोर्ट की खंडपीठ ने समय-समय पर पुलिस को युवक को खोजने के कई आदेश दिए।

SOG का इनकार और SIT भी नहीं खोज सकी नरेश को

राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश पर सितंबर 2019 में मामले की जांच स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (SOG) को सौंपी गई, लेकिन संसाधनों की कमी का हवाला देते हुए एसओजी ने जांच से इनकार कर दिया, जिसके बाद एक विशेष जांच दल (SIT) गठित किया गया।

हाईकोर्ट ने जांच एजेंसी को आईटी और तकनीकी विशेषज्ञों की सहायता लेने के निर्देश भी दिए थे, ताकि वैज्ञानिक तरीके से जांच हो सके। इसके बावजूद नरेश का कोई पता नहीं चल पाया।

122 दिन तक चला आंदोलन, CBI ने दर्ज नहीं की FIR

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि वर्षों तक कोई ठोस प्रगति नहीं होने के कारण परिवार को न्याय की मांग लेकर जयपुर में 122 दिनों तक आंदोलन करना पड़ा।

लगातार दबाव और मांग के बाद राज्य सरकार ने 20 सितंबर 2023 को मामले की जांच सीबीआई को सौंपने का आदेश जारी किया।

हालांकि याचिकाकर्ता का आरोप था कि इसके बाद भी सीबीआई ने कोई नई एफआईआर दर्ज नहीं की और न ही जांच की प्रगति के बारे में परिवार को जानकारी दी।

पुलिस ने लगा दी थी क्लोजर रिपोर्ट

मामले में राज्य पुलिस ने नवंबर 2024 में एक फाइनल रिपोर्ट/क्लोजर रिपोर्ट अदालत में प्रस्तुत कर दी थी।

सीबीआई की ओर से अदालत में यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता को क्लोजर रिपोर्ट के खिलाफ मजिस्ट्रेट के समक्ष विरोध याचिका (प्रोटेस्ट पिटीशन) दायर करनी चाहिए।

लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

कोर्ट ने कहा कि प्रस्तुत रिपोर्ट वास्तव में अंतिम निष्कर्ष पर आधारित नहीं थी।

रिपोर्ट में स्वयं उल्लेख था कि युवक की तलाश अभी भी जारी है। ऐसे में याचिकाकर्ता को प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

पिता ने CBI जांच के लिए दाखिल की याचिका

वर्ष 2017 से लगातार करीब 8 साल से अपने बेटे की तलाश कर रहे याचिकाकर्ता पिता ने वर्ष 2025 में एक बार फिर से याचिका दायर कर राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

याचिकाकर्ता पिता ने राज्य पुलिस, एसओजी के इनकार, एसआईटी द्वारा बिना किसी परिणाम के जांच बंद करने और सीबीआई द्वारा मामले में एफआईआर दर्ज नहीं करने के सभी बिंदुओं को लेकर याचिका दायर की।

पिता ने याचिका में राजस्थान हाईकोर्ट से इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपे जाने का अनुरोध किया।

CBI ने किया सख्त विरोध

राजस्थान हाईकोर्ट में पिता की ओर से सीबीआई जांच की मांग को लेकर दायर याचिका का सीबीआई ने कड़ा विरोध किया।

सीबीआई की ओर से विशेष लोक अभियोजक पी.सी. सोलंकी ने अदालत में जोरदार विरोध दर्ज कराते हुए कहा कि यह मामला किसी बड़े घोटाले, राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद, अंतरराज्यीय अपराध या सार्वजनिक महत्व के ऐसे विषय से संबंधित नहीं है, जिसमें सीबीआई जांच की आवश्यकता हो।

सीबीआई ने यह भी कहा कि राज्य पुलिस पहले ही क्लोजर रिपोर्ट पेश कर चुकी है और याचिकाकर्ता के पास उसके खिलाफ प्रोटेस्ट पिटीशन दायर करने का वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध है।

सीबीआई की ओर से पी.सी. सोलंकी ने दलील दी कि मामला मुख्य रूप से पारिवारिक विवाद से जुड़ा है और इसमें ऐसा कोई राष्ट्रीय या अंतरराज्यीय पहलू नहीं है, जिसके लिए सीबीआई जांच आवश्यक हो।

हाईकोर्ट ने खारिज की CBI की दलील

हाईकोर्ट ने सीबीआई की दलीलों को स्वीकार नहीं करते हुए कहा कि क्लोजर रिपोर्ट स्वयं यह दर्शाती है कि जांच किसी अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुंची थी और युवक की तलाश अभी भी जारी थी।

ऐसे में याचिकाकर्ता को केवल प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल करने के लिए कहना न्यायोचित नहीं होगा।

कोर्ट ने कहा कि बार-बार न्यायिक निर्देश, SIT का गठन, तकनीकी विशेषज्ञों की मदद और वर्षों की जांच के बावजूद युवक का कोई पता नहीं चलना जांच की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी युवक का अपनी सगाई से ठीक पहले अचानक गायब हो जाना, पूर्व शत्रुता के आरोप, कॉल रिकॉर्ड और लगातार असफल जांच ऐसे कारक हैं जिनकी गहन और वैज्ञानिक जांच आवश्यक थी।

सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख किया, जिनमें K.V. Rajendran, Pooja Pal, Committee for Protection of Democratic Rights और Awungshi Chirmayo मामले शामिल हैं।

इन फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि राज्य पुलिस की जांच लोगों का विश्वास नहीं जगा पाती या निष्पक्ष जांच के लिए स्वतंत्र एजेंसी की जरूरत महसूस होती है, तो अदालतें सीबीआई जांच का आदेश दे सकती हैं।

सामाजिक पृष्ठभूमि का भी लिया संज्ञान

जस्टिस अनिल उपमन की एकलपीठ ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग से आता है और पिछले आठ वर्षों से अपने बेटे की तलाश में लगातार संघर्ष कर रहा है।

कोर्ट ने माना कि इतनी लंबी अवधि तक परिणाम न मिलने से स्वाभाविक रूप से परिवार का जांच एजेंसियों पर भरोसा कमजोर हुआ है।

CBI को सौंपा पूरा मामला

जस्टिस अनिल कुमार उपमन की एकलपीठ ने अब इस मामले में याचिकाकर्ता पिता की सीबीआई जांच को लेकर दायर याचिका को स्वीकार करते हुए संपूर्ण जांच सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने जोधपुर के देवनगर पुलिस थाने में दर्ज एफआईआर संख्या 28/2018 और प्रतापनगर थाने में दर्ज गुमशुदगी रिपोर्ट संख्या 86/2017 दोनों मामलों की आगे की जांच सीबीआई को सौंपने के आदेश दिए हैं।

कोर्ट ने इस मामले में संबंधित अधीनस्थ अदालत को भी आदेश दिया है कि वह मामले का पूरा रिकॉर्ड सीबीआई को उपलब्ध कराए।

साथ ही संबंधित थाना प्रभारी को केस डायरी, गवाहों के बयान, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और अन्य सभी दस्तावेज सीबीआई को सौंपने के निर्देश दिए गए।

AI तकनीक के उपयोग का अनोखा सुझाव

मामले में एक अभिनव सुझाव देते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि चूंकि नरेश आठ वर्षों से लापता है, इसलिए उसके चेहरे-मोहरे में समय के साथ काफी बदलाव आ चुका होगा।

ऐसे में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की सहायता से उसकी वर्तमान संभावित उम्र के अनुसार तस्वीर तैयार की जाए और उसे राष्ट्रीय समाचार चैनलों, प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म पर 7 से 10 दिनों तक देशव्यापी स्तर पर प्रसारित किया जाए।

कोर्ट का मानना है कि इससे युवक का पता लगाने में सहायता मिल सकती है।

सबसे अधिक लोकप्रिय