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हर गलत आदेश कदाचार नहीं होता, गलत न्यायिक आदेश के आधार पर अधिकारी को नहीं दी जा सकती सजा, RAS अधिकारी की 100% पेंशन रोकने का आदेश हाईकोर्ट ने किया रद्द

Rajasthan High Court Cancels 100% Pension Withholding of RAS Officer Over Erroneous Quasi-Judicial Order

15 साल बाद आरोप-पत्र, 23 साल बाद सजा; हाईकोर्ट ने कहा-सिर्फ न्यायिक भूल पर अफसर की पूरी पेंशन नहीं छीनी जा सकती, दुर्भावना, भ्रष्टाचार या बेईमानी साबित नहीं तो न्यायिक भूल को नहीं माना जा सकता कदाचार

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी अधिकारी द्वारा न्यायिक या अर्ध-न्यायिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए दिया गया आदेश बाद में गलत या कानून की गलत व्याख्या वाला पाया जाए, तो केवल इसी आधार पर उसे विभागीय कार्यवाही का सामना नहीं कराया जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक आदेश के पीछे दुर्भावना, भ्रष्ट उद्देश्य, बेईमानी, पक्षपात, गंभीर लापरवाही या किसी अनुचित उद्देश्य का ठोस आधार न हो, महज न्यायिक भूल को कदाचार नहीं माना जा सकता।

जस्टिस मुकेश राजपुरोहित की एकलपीठ ने सेवानिवृत्त राजस्थान प्रशासनिक सेवा अधिकारी फतेह राय सोनी की याचिका स्वीकार करते हुए रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए यह फैसला दिया है।

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता आरएएस अधिकारी फतेह राय सोनी की 100 प्रतिशत पेंशन स्थायी रूप से रोकने के आदेश को रद्द करते हुए यह फैसला दिया है।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को पेंशन बहाल करने और सभी बकाया राशि का भुगतान दो महीने के भीतर करने का भी आदेश दिया है।

हर गलत आदेश कदाचार नहीं होता

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत दोहराते हुए कहा है कि न्यायिक या अर्ध-न्यायिक अधिकारी द्वारा पारित हर गलत आदेश कदाचार नहीं होता।

किसी आदेश की कानूनी शुद्धता पर सवाल है तो उसके लिए कानून में उपलब्ध अपील और पुनरीक्षण की व्यवस्था का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

केवल बाद में अलग कानूनी राय बन जाने के आधार पर अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई कर उसकी पेंशन तक रोक देना उचित नहीं होगा, जब तक आदेश के पीछे अनुचित मंशा या गंभीर कदाचार का ठोस आधार मौजूद न हो।

2002 का आदेश, 2017 में कार्रवाई

फतेह राय सोनी वर्ष 1984 में राजस्थान प्रशासनिक सेवा के कनिष्ठ स्तर पर नियुक्त हुए थे।

वर्ष 1993 में वरिष्ठ स्तर और वर्ष 2000 में चयन स्तर पर पदोन्नत हुए। वे 30 अगस्त 2017 को बीकानेर में बंदोबस्त अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हुए।

उनकी सेवानिवृत्ति के दिन ही उन्हें राजस्थान सिविल सेवा नियमों के तहत आरोप-पत्र दिया गया।

आरोप वर्ष 2001-02 में चूरू में प्रशासन गांवों के संग अभियान के दौरान उनके द्वारा पारित एक आदेश से जुड़ा था।

सोनी ने 10 जनवरी 2002 को राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 की धारा 88 के तहत एक वाद में फैसला दिया था।

विभाग का आरोप था कि उन्होंने गोचर भूमि के संबंध में खातेदारी अधिकार प्रदान कर अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आदेश पारित किया।

हालांकि, इस मामले में उन पर भ्रष्टाचार, दुर्भावना, बेईमानी, अवैध लाभ, रिश्वत या व्यक्तिगत लाभ का कोई आरोप नहीं लगाया गया था।

जिस आदेश पर कार्रवाई हुई, उसके खिलाफ अपील या पुनरीक्षण भी नहीं हुआ

याचिकाकर्ता फतेह राय सोनी का पक्ष

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता नरपत सिंह चारण ने दलील दी कि 30 अप्रैल 2025 को पारित वह आदेश पूरी तरह मनमाना, अवैध और कानून के विपरीत है, जिसके जरिए उनकी 100 प्रतिशत पेंशन स्थायी रूप से रोक दी गई।

अधिवक्ता ने कहा कि जिस मामले को आधार बनाकर उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की गई, वह उनके द्वारा अर्ध-न्यायिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए पारित आदेश से संबंधित था।

उन्होंने यह भी कहा कि आदेश पारित करने से पहले संबंधित पक्षों की दलीलों, राजस्व रिकॉर्ड, पटवारी की रिपोर्ट, नियमितीकरण समिति की सिफारिश, ग्राम पंचायत के प्रस्ताव और तहसीलदार के लिखित जवाब पर विचार किया गया था।

याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क था कि इस पूरे मामले में उनके खिलाफ भ्रष्टाचार, दुर्भावना, बेईमानी, पक्षपात, रिश्वत, अवैध लाभ या व्यक्तिगत लाभ का कोई आरोप नहीं लगाया गया। विभाग की पूरी कार्रवाई केवल इस आधार पर थी कि उन्होंने कानून की गलत व्याख्या करते हुए अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर गोचर भूमि के संबंध में खातेदारी अधिकार प्रदान कर दिए।

अधिवक्ता ने कहा कि यदि राज्य सरकार को 10 जनवरी 2002 के आदेश में कोई कानूनी या तथ्यात्मक गलती नजर आती थी, तो राजस्थान काश्तकारी अधिनियम में उपलब्ध अपील और पुनरीक्षण के उपाय मौजूद थे।

लेकिन राज्य सरकार ने न तो अपील की और न ही पुनरीक्षण। इस कारण वह आदेश अंतिम हो गया। ऐसे में करीब 15 साल बाद उसी आदेश की शुद्धता को विभागीय जांच के जरिए दोबारा खोलना उचित नहीं है।

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के Ramesh Chander Singh बनाम High Court of Allahabad और राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ के State of Rajasthan बनाम Jagmal Singh के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि केवल न्यायिक भूल या कानून की गलत व्याख्या को कदाचार नहीं माना जा सकता।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि वर्ष 2017 से 2022 के बीच कई बार आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने की मांग की। सूचना का अधिकार कानून के तहत भी आवेदन किए गए, लेकिन उन्हें बचाव तैयार करने के लिए आवश्यक सभी दस्तावेज नहीं दिए गए।

चार विभागीय गवाहों में से केवल एक गवाह ओमप्रकाश वर्मा की जांच की गई। उस समय के तहसीलदार जे.पी. टाक, जिनका लिखित बयान मूल आदेश का महत्वपूर्ण आधार था, को न तो बुलाया गया और न ही उनकी जांच की गई।

याचिकाकर्ता ने विभागीय कार्रवाई में हुई देरी को भी गंभीर आधार बनाया। कथित घटना 10 जनवरी 2002 की थी, लेकिन आरोप-पत्र करीब 15 साल बाद 30 अगस्त 2017 को उनकी सेवानिवृत्ति के दिन दिया गया।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी दलील दी गई कि भले ही विभाग की ओर से लगाए गए आरोपों को सही मान लिया जाए, फिर भी 100 प्रतिशत पेंशन स्थायी रूप से रोकना अत्यधिक कठोर और असंगत सजा है।

उन्होंने कहा कि उनकी उम्र अधिक है और पेंशन उनके जीवन-यापन का महत्वपूर्ण साधन है। पूरी पेंशन रोकना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार को भी प्रभावित करता है।

राज्य सरकार का पूरा पक्ष

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त राजकीय अधिवक्ता नितेश माथुर के साथ रवि शंकर ने याचिका का विरोध किया।

राज्य सरकार ने सबसे पहले याचिका की पोषणीयता पर सवाल उठाते हुए कहा कि विभागीय जांच कानून के अनुसार की गई थी और राजस्थान सिविल सेवा नियमों के तहत कार्यवाही पूरी होने के बाद सजा का आदेश पारित किया गया है।

राज्य के अनुसार, विभागीय कार्रवाई उस समय शुरू हुई थी जब याचिकाकर्ता सेवा में थे। इसलिए उनकी सेवानिवृत्ति के बाद भी राजस्थान सिविल सेवा पेंशन नियम, 1996 के नियम 7(2)(a) के तहत कार्यवाही जारी रखी जा सकती थी।

राज्य सरकार का मुख्य तर्क था कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कार्रवाई केवल इसलिए नहीं हुई कि उन्होंने कोई गलत न्यायिक आदेश पारित किया, बल्कि उन्होंने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर ऐसी भूमि के संबंध में खातेदारी अधिकार प्रदान किए, जो राजस्व रिकॉर्ड में गोचर भूमि के रूप में दर्ज थी।

राज्य सरकार ने राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 की धारा 16(1) में मौजूद प्रतिबंध का हवाला देते हुए कहा कि गोचर भूमि पर खातेदारी अधिकार प्रदान नहीं किए जा सकते थे।

इसलिए राज्य के अनुसार मामला केवल कानून की अलग व्याख्या का नहीं था, बल्कि गंभीर लापरवाही और अधिकार क्षेत्र के अनुचित इस्तेमाल का था।

राज्य सरकार ने याचिकाकर्ता की इस दलील का भी विरोध किया कि उनके खिलाफ भ्रष्टाचार या व्यक्तिगत लाभ का कोई आरोप नहीं है। राज्य का कहना था कि गंभीर लापरवाही या वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन भी कदाचार का आधार बन सकता है।

राज्य सरकार ने प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन के आरोपों को भी खारिज करते हुए कहा कि केवल इसलिए कि याचिकाकर्ता का व्यक्तिगत बयान दर्ज नहीं हुआ, पूरी जांच को अवैध नहीं माना जा सकता, विशेषकर जब उन्हें अपना पक्ष रखने के पर्याप्त अवसर दिए गए थे।

राज्य सरकार ने 15 साल की देरी के तर्क का भी विरोध करते हुए कहा कि विभागीय कार्यवाही याचिकाकर्ता की सेवा अवधि में शुरू की गई थी और बाद में नियमों के अनुसार सेवानिवृत्ति के बाद भी जारी रही।

राज्य के अनुसार, केवल समय बीत जाने से विभागीय कार्यवाही अपने आप समाप्त नहीं हो जाती। जब तक यह साबित न हो कि देरी के कारण कर्मचारी को वास्तविक और गंभीर नुकसान हुआ है, केवल देरी के आधार पर कार्यवाही को रद्द नहीं किया जा सकता।

इस संबंध में राज्य ने सुप्रीम कोर्ट के Additional Supdt. of Police बनाम T. Natarajan के फैसले पर भरोसा किया।

राज्य सरकार ने 100 प्रतिशत पेंशन रोकने की सजा को भी उचित बताते हुए कहा कि सजा की मात्रा तय करना मुख्य रूप से विभागीय प्राधिकारी के अधिकार क्षेत्र में आता है। अदालत तभी हस्तक्षेप कर सकती है जब सजा साबित कदाचार की तुलना में इतनी अधिक हो कि वह स्पष्ट रूप से असंगत या चौंकाने वाली लगे।

राज्य ने कहा कि याचिकाकर्ता ने वैधानिक प्रतिबंध के बावजूद अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर गोचर भूमि के संबंध में खातेदारी अधिकार प्रदान किए थे। इसलिए राज्य ने कहा कि 100 प्रतिशत पेंशन स्थायी रूप से रोकने की सजा को मनमाना या अत्यधिक असंगत नहीं कहा जा सकता।

राज्य ने अपनी दलीलों के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के S. Govinda Menon बनाम Union of India, Additional Supdt. of Police बनाम T. Natarajan और State of Uttar Pradesh बनाम Rajit Singh के फैसलों पर भरोसा किया।

हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों पर क्या कहा?

दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि विभागीय कार्रवाई की पूरी नींव 10 जनवरी 2002 के अर्ध-न्यायिक आदेश पर थी।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड में यह भी पाया कि आरोप-पत्र, जांच रिपोर्ट या सजा आदेश में याचिकाकर्ता के खिलाफ भ्रष्टाचार, दुर्भावना, बेईमानी, पक्षपात या किसी अनुचित उद्देश्य का आरोप नहीं था।

हाईकोर्ट ने माना कि अधिक से अधिक यह कहा जा सकता है कि याचिकाकर्ता का कानूनी निष्कर्ष गलत था। लेकिन केवल गलत अर्ध-न्यायिक निर्णय को कदाचार मानकर विभागीय सजा नहीं दी जा सकती।

हाईकोर्ट ने पाया कि 10 जनवरी 2002 का आदेश एक कारणयुक्त अर्ध-न्यायिक आदेश था। आदेश पारित करते समय संबंधित अधिकारी ने पक्षकारों की दलीलों, राजस्व रिकॉर्ड, पटवारी की रिपोर्ट, नियमितीकरण समिति की सिफारिश, ग्राम पंचायत के प्रस्ताव और तहसीलदार के लिखित जवाब पर विचार किया था।

महत्वपूर्ण बात यह थी कि राज्य सरकार ने इस आदेश के खिलाफ कानून में उपलब्ध अपील या पुनरीक्षण के उपाय का इस्तेमाल नहीं किया। परिणामस्वरूप वह आदेश अंतिम हो गया।

हाईकोर्ट ने कहा कि बाद में उसी आदेश की वैधता और सही-गलत की जांच विभागीय कार्यवाही के जरिए करना, जबकि उसके खिलाफ उपलब्ध वैधानिक उपायों का इस्तेमाल नहीं किया गया था, कानूनन स्वीकार्य नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Ramesh Chander Singh बनाम High Court of Allahabad के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायिक अधिकारी द्वारा पारित आदेश केवल इसलिए विभागीय कार्रवाई का आधार नहीं बन सकता कि किसी उच्च अधिकारी या अदालत की नजर में वह गलत था।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि न्यायिक और अर्ध-न्यायिक अधिकारियों को अपने अधिकारों का इस्तेमाल स्वतंत्र रूप से करने की स्थिति मिलनी चाहिए। हर न्यायिक भूल को गलत मंशा या कदाचार से जोड़ना न्याय व्यवस्था के लिए नुकसानदायक होगा।

इसी तरह Lunjarrao Bhikaji Nagarkar मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि अधिकार क्षेत्र के गलत इस्तेमाल, कानून की गलती या कानून की गलत व्याख्या को अपने आप विभागीय कार्यवाही का आधार नहीं बनाया जा सकता। हालांकि, यदि अधिकारी की कार्रवाई में दुर्भावना, भ्रष्ट उद्देश्य, गंभीर लापरवाही, अनुचित लाभ पहुंचाने की मंशा या अन्य कदाचार का प्रथमदृष्टया आधार हो, तो विभागीय कार्रवाई की जा सकती है।

विभागीय जांच में गंभीर कमियां

हाईकोर्ट ने विभागीय जांच की प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठाए। अदालत के अनुसार, अधिकारी को मांगे गए सभी जरूरी दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए।

चार गवाहों में से केवल एक गवाह की जांच की गई। वहीं, उस समय के तहसीलदार, जिनका लिखित बयान मूल अर्ध-न्यायिक आदेश का महत्वपूर्ण आधार था, को न तो बुलाया गया और न ही उनकी जांच की गई। अधिकारी का अपना बयान भी दर्ज नहीं किया गया।

अदालत ने माना कि इन कमियों से याचिकाकर्ता के बचाव पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और जांच की निष्पक्षता प्रभावित हुई।

15 साल बाद आरोप-पत्र, 23 साल बाद सजा

हाईकोर्ट ने विभागीय कार्रवाई में हुई देरी को भी महत्वपूर्ण माना। संबंधित आदेश 10 जनवरी 2002 को पारित हुआ था, जबकि आरोप-पत्र 30 अगस्त 2017, यानी करीब 15 साल बाद, उनकी सेवानिवृत्ति के दिन दिया गया।

इसके बाद विभागीय कार्यवाही का परिणाम 30 अप्रैल 2025 को सामने आया, यानी कथित घटना के 23 साल से अधिक समय बाद।

अदालत ने कहा कि इस असाधारण और बिना संतोषजनक स्पष्टीकरण वाली देरी से याचिकाकर्ता को गंभीर नुकसान हुआ और इससे पूरी कार्यवाही की वैधता पर भी असर पड़ता है।

पूरी पेंशन रोकना अत्यधिक कठोर सजा

हाईकोर्ट ने पेंशन को कर्मचारी की सेवा के बदले अर्जित महत्वपूर्ण वैधानिक अधिकार बताया। अदालत ने कहा कि नियमों के तहत गंभीर कदाचार या गंभीर लापरवाही के मामलों में पेंशन रोकने या वापस लेने की शक्ति उपलब्ध है, लेकिन इस शक्ति का इस्तेमाल तभी किया जा सकता है जब उसके लिए आवश्यक कानूनी शर्तें पूरी हों।

इस मामले में भ्रष्टाचार, बेईमानी, नैतिक अधमता या किसी अन्य गंभीर कदाचार का कोई निष्कर्ष नहीं था। ऐसे में केवल कथित गलत अर्ध-न्यायिक आदेश के आधार पर 100 प्रतिशत पेंशन स्थायी रूप से रोकना स्पष्ट रूप से मनमाना और अत्यधिक असंगत है।

हाईकोर्ट ने क्या आदेश दिया?

जस्टिस मुकेश राजपुरोहित ने 30 अप्रैल 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके जरिए फतेह राय सोनी की 100 प्रतिशत पेंशन स्थायी रूप से रोक दी गई थी।

हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार यह साबित करने में विफल रही कि याचिकाकर्ता ने राजस्थान सिविल सेवा पेंशन नियम, 1996 के नियम 7 के अर्थ में “गंभीर कदाचार या गंभीर लापरवाही” की थी।

अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता की पेंशन बहाल की जाए और सभी परिणामी बकाया राशि का भुगतान प्रमाणित आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से दो महीने के भीतर किया जाए।

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