जयपुर। पारिवारिक विवादों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण फैसले में जयपुर फैमिली कोर्ट ने पति को तलाक की मंजूरी देते हुए कहा कि यदि पत्नी वैवाहिक जीवन साथ-साथ जारी रखते हुए भी पति पर गंभीर आरोपों के मुकदमे चलाती रहे और तथ्यों को छुपाए, तो यह मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।
इस मामले में खास बात यह रही कि पति-पत्नी दोनों ही आयुर्वेद के डॉक्टर हैं और लंबे समय तक साथ रहने के बावजूद उनके बीच विवाद न्यायालय तक पहुंच गया।
मामला क्या था?
कोर्ट में प्रस्तुत दस्तावेजों और रिकॉर्ड के अनुसार, पति और पत्नी दोनों आयुर्वेद चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े प्रोफेशनल हैं।
शादी के बाद दोनों कुछ समय तक साथ रहे, लेकिन वैवाहिक जीवन में विवाद शुरू हो गए।
पत्नी ने पति और उसके परिवार के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का मुकदमा दर्ज कराया और महिला आयोग में भी शिकायत की।
मामले में राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा मध्यस्थता के लिए भेजे जाने पर पत्नी ने मुकदमे वापस लेने की बात कही थी।
लेकिन पत्नी की ओर से ये मुकदमे और शिकायत वापस नहीं ली गई।
हालांकि, इस पूरे समय के दौरान पत्नी पति के साथ ही रह रही थी और उसने बाद में पति के साथ रहने के लिए आवेदन भी किया।
दूसरी ओर, पति ने लगातार अलग रहने और अंततः तलाक की याचिका दायर की।
याचिकाकर्ता पति का पक्ष
याचिकाकर्ता पति की ओर से, जो पेशे से आयुर्वेद चिकित्सक हैं, कोर्ट के समक्ष तलाक की याचिका दायर करते हुए अपनी पत्नी के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए।
पति की ओर से एडवोकेट डी.एस. शेखावत ने पैरवी करते हुए दलीलें पेश कीं।
पति की ओर से मुख्य तर्क था कि पत्नी का व्यवहार न केवल विरोधाभासी रहा, बल्कि इससे उनके मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक प्रतिष्ठा को भी गहरा आघात पहुंचा।
पति ने कोर्ट में कहा कि विवाह के शुरुआती समय में संबंध सामान्य थे, लेकिन धीरे-धीरे पत्नी ने उनके खिलाफ दहेज प्रताड़ना और अन्य गंभीर आरोप लगाना शुरू कर दिया। इन आरोपों के आधार पर पत्नी ने पुलिस में मामला दर्ज कराया और महिला आयोग में भी शिकायत दी।
पति का सबसे बड़ा आरोप यह था कि पत्नी ने एक ओर तो उनके साथ वैवाहिक जीवन जारी रखा, वहीं दूसरी ओर उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमे चलाती रही।
पति के अनुसार, यह व्यवहार पूरी तरह से विरोधाभासी और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने वाला था।
पति ने यह भी कहा कि पत्नी द्वारा लगाए गए आरोप झूठे और बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए थे।
इन आरोपों के कारण उन्हें समाज में अपमान का सामना करना पड़ा और उनके पेशेवर जीवन पर भी नकारात्मक असर पड़ा।
पति ने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी ने कई महत्वपूर्ण तथ्यों को कोर्ट से छुपाया और अपने पक्ष को मजबूत दिखाने के लिए चयनित जानकारी ही प्रस्तुत की।
पति ने यह भी कहा कि पत्नी का व्यवहार उनके प्रति अपमानजनक था और वैवाहिक जीवन में विश्वास पूरी तरह खत्म हो चुका था।
पति के अनुसार, इस प्रकार के आरोपों और लगातार कानूनी दबाव के कारण उनके लिए इस रिश्ते को जारी रखना असंभव हो गया था।
इसी आधार पर उन्होंने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत मानसिक क्रूरता (Mental Cruelty) को तलाक का आधार बताते हुए विवाह विच्छेद की मांग की।
प्रतिवादी पत्नी का पक्ष
प्रतिवादी पत्नी, जो स्वयं भी आयुर्वेद चिकित्सक हैं, ने पति के आरोपों का खंडन करते हुए अपना पक्ष कोर्ट के सामने रखा।
उन्होंने कहा कि उन्होंने जो भी कानूनी कार्रवाई की, वह अपनी सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा के लिए की गई थी।
पत्नी का मुख्य आरोप था कि शादी के बाद उन्हें दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया और मानसिक रूप से परेशान किया गया।
उन्होंने यह भी कहा कि पति का व्यवहार उनके प्रति अपमानजनक था और वह उन्हें “चुड़ैल” जैसे शब्दों से संबोधित करता था, जिससे उन्हें गहरा मानसिक आघात पहुंचा।
पत्नी ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने महिला आयोग और पुलिस में शिकायत इसलिए दर्ज कराई क्योंकि उनके पास अन्य कोई विकल्प नहीं था।
उनके अनुसार, यह कदम उन्होंने मजबूरी में उठाया।
हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह अपने वैवाहिक जीवन को बचाना चाहती थीं।
इसी कारण उन्होंने पति के साथ रहने के लिए आवेदन भी किया। उनका कहना था कि साथ रहने की इच्छा इस बात का प्रमाण है कि वह विवाह को समाप्त नहीं करना चाहती थीं।
फाइल के रिकॉर्ड के अनुसार, पत्नी ने यह भी कहा कि उनके द्वारा दर्ज कराए गए मुकदमे वास्तविक घटनाओं पर आधारित थे और उन्हें झूठा बताना गलत है।
पत्नी ने यह भी तर्क दिया कि पति द्वारा तलाक की मांग करना जल्दबाजी और अनुचित है, क्योंकि उन्होंने रिश्ते को सुधारने के प्रयास किए थे।
फैमिली कोर्ट का फैसला
फैमिली कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी ने वैवाहिक विवाद के बावजूद साथ रहना जारी रखा और समानांतर रूप से दहेज प्रताड़ना के मामले को आगे बढ़ाया।
कोर्ट ने कहा कि—
“यदि पत्नी वैवाहिक जीवन जारी रखते हुए भी पति के खिलाफ गंभीर आपराधिक मुकदमे चलाती रहती है और तथ्यों को छुपाती है, तो यह मानसिक क्रूरता का प्रमाण है।”
फैमिली कोर्ट ने पति के तलाक के आवेदन को मंजूर करते हुए कहा कि दांपत्य संबंध विश्वास पर आधारित होते हैं। बार-बार आरोप और मुकदमे रिश्ते को तोड़ देते हैं। मानसिक शांति का अभाव भी क्रूरता का आधार है।
“मानसिक क्रूरता” की व्याख्या
कोर्ट ने अपने फैसले में विस्तार से बताया कि मानसिक क्रूरता केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है। इसमें झूठे आरोप लगाना, सार्वजनिक रूप से अपमान करना, बार-बार मुकदमेबाजी करना और साथी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना शामिल है।
कोर्ट ने कहा कि मानसिक क्रूरता समय, परिस्थितियों और व्यवहार के पैटर्न पर निर्भर करती है।
कोर्ट का अंतिम फैसला
सभी तथ्यों और साक्ष्यों को देखते हुए कोर्ट ने पति की तलाक याचिका को स्वीकार कर लिया।
कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत विवाह विच्छेद की डिक्री जारी करने के आदेश दिए हैं।
वहीं, पत्नी की ओर से दायर साथ रहने के आवेदन को कोर्ट ने खारिज कर दिया।
