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ब्रेकिंग न्यूज़ |लोकसभा जांच के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा ने दिया इस्तीफा

Justice Yashwant Varma Resigns as Allahabad High Court Judge Amid Ongoing Lok Sabha Inquiry


नई दिल्ली/प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पद से तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दे दिया है।

यह फैसला उस समय आया है जब उनके खिलाफ लोकसभा में चल रही जांच प्रक्रिया अपने महत्वपूर्ण चरण में है।

जस्टिस वर्मा पर उनके सरकारी आवास से कथित तौर पर भारी मात्रा में नकदी मिलने के मामले को लेकर गंभीर आरोप लगे थे, जिसने देशभर में व्यापक राजनीतिक और न्यायिक बहस को जन्म दिया।

जस्टिस वर्मा ने अपना इस्तीफा राष्ट्रपति को भेजा है, जिसकी प्रति भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत को भी प्रेषित की गई है।

अपने इस्तीफे में उन्होंने लिखा, “गहरे दुख और व्यथा के साथ मैं इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश पद से तत्काल प्रभाव से अपना इस्तीफा दे रहा हूं।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह अपने इस्तीफे के कारणों का विस्तार से उल्लेख कर राष्ट्रपति पद की गरिमा को बोझिल नहीं बनाना चाहते।

लोकसभा जांच के बीच इस्तीफा

जस्टिस वर्मा का यह इस्तीफा ऐसे समय में आया है जब उनके खिलाफ लोकसभा में महाभियोग (इम्पीचमेंट) प्रस्ताव के तहत जांच जारी है।

लोकसभा के 146 सांसदों द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव के आधार पर स्पीकर ओम बिरला ने जजेस (इंक्वायरी) एक्ट, 1968 के तहत एक तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया था।

इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अरविंद कुमार, बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस श्री चंद्रशेखर और कर्नाटक हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता वासुदेव आचार्य शामिल है.

क्या है पूरा मामला?

यह पूरा विवाद 14 मार्च 2025 को सामने आया था, जब दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के आधिकारिक आवास के एक आउटहाउस में आग लगने की घटना के दौरान अग्निशमन दल को भारी मात्रा में नकदी मिली थी।

इस घटना के बाद पूरे देश में हड़कंप मच गया और न्यायपालिका की पारदर्शिता व जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठे।

सुप्रीम कोर्ट की इन-हाउस जांच

विवाद के बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना ने तीन सदस्यीय इन-हाउस जांच समिति का गठन किया था, जिसमें जस्टिस शील नागू, जस्टिस जीएस संधावालिया
और जस्टिस अनु सिवारमन शामिल थे.

इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में प्रथम दृष्टया (prima facie) जस्टिस वर्मा की संलिप्तता पाई थी।

इसके बाद रिपोर्ट को राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजा गया। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने पारदर्शिता की दिशा में कदम उठाते हुए इस मामले से जुड़े दस्तावेज, फोटो और वीडियो भी सार्वजनिक किए थे।

पहले नहीं मानी थी इस्तीफे की सलाह

बताया जाता है कि तत्कालीन CJI ने जस्टिस वर्मा को इस्तीफा देने की सलाह दी थी, लेकिन उन्होंने उस समय इसे स्वीकार नहीं किया।

इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में इन-हाउस जांच और हटाने की सिफारिश को चुनौती दी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया था।

बाद में लोकसभा स्पीकर द्वारा गठित जांच समिति को भी उन्होंने अदालत में चुनौती दी, लेकिन वह याचिका भी इस वर्ष की शुरुआत में खारिज हो गई।

न्यायिक कार्य पहले ही वापस लिया गया था

जांच लंबित रहने के दौरान जस्टिस वर्मा से न्यायिक कार्य भी वापस ले लिया गया था और उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया था।

अब आगे क्या?

जस्टिस वर्मा के इस्तीफे के बाद महाभियोग की प्रक्रिया पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। हालांकि, यह मामला न्यायपालिका में जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर एक मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।

इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि उच्च न्यायपालिका में नैतिक मानकों को और सख्ती से लागू करने की आवश्यकता है।

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