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दादा की जमीन में पोते ने मांगा हिस्सा, राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा- पहले राजस्व कोर्ट से साबित करो खातेदारी हक; बेचान रद्द कराने की अपील खारिज

Rajasthan HC Rejects Grandson’s Plea Seeking Share in Grandfather’s Agricultural Land

जोधपुर। कृषि भूमि पर खातेदारी अधिकार को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है।

दादा की जमीन में अपना हिस्सा बताते हुए बेचान रद्द कराने पहुंचे एक व्यक्ति का दावा कोर्ट ने खारिज कर दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि बिना खातेदारी अधिकार की घोषणा के सीधे सिविल कोर्ट में जाकर जमीन का बेचान रद्द कराने का दावा नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने साफ किया कि अगर किसी व्यक्ति का जमीन पर हिस्सा खातेदारी हक के दावे पर आधारित है, तो पहले उसे सक्षम राजस्व कोर्ट से अपना हक घोषित कराना होगा।

मामला जैसलमेर के पोकरण में 75 बीघा कृषि भूमि का है। याचिकाकर्ता देवाराम ने यह जमीन अपने दादा चूतरा राम की बताते हुए उसमें अपना एक-नौवां हिस्सा होने का दावा किया था।

उसने अपने पिता और चाचाओं की ओर से किए गए जमीन के बेचान को रद्द कराने के लिए सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया था।

लेकिन हाईकोर्ट ने इस दावे को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि देवाराम यह साबित नहीं कर पाए कि जमीन संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति थी और उन्हें उसमें जन्म से सह-दायिकी हक मिला था।

जस्टिस फरजंद अली ने पोकरण के अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें देवाराम का मूल मुकदमा खारिज कर दिया गया था।

राजस्थान हाईकोर्ट ने उनकी अपील भी खारिज कर दी।

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75 बीघा जमीन में पोते ने मांगा हिस्सा

विवाद जैसलमेर जिले की पोकरण तहसील के जैमला गांव की 75 बीघा असिंचित कृषि जमीन का है।

यह जमीन खसरा नंबर 294/506 में दर्ज है। इसे चुतरा राम को भूमिहीन होने के कारण कृषि के लिए आवंटित किया गया था।

चुतरा राम की 24 अप्रैल 2004 को मौत हो गई। इसके बाद उनके तीन बेटे खेताराम, रामाराम और लच्छूराम जमीन के वारिस बने।

राजस्व रिकॉर्ड में भी तीनों के नाम एक-एक तिहाई हिस्से के रूप में दर्ज हुए।

याचिकाकर्ता देवाराम, खेताराम का बेटा है। उसका दावा था कि दादा की जमीन में उसका भी जन्म से हिस्सा था और उसका हिस्सा एक-नौवां बनता है।

17 अप्रैल 2025 को जमीन की रजिस्ट्री कर दी गई।

देवाराम ने कहा कि यह सौदा उनके हिस्से के खिलाफ है और सिविल कोर्ट में इसे रद्द कराने की मांग की।

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दादा की जमीन पर हाईकोर्ट ने नहीं माना जन्म से हक

राजस्थान हाईकोर्ट ने देवाराम के दावे की बुनियाद पर ही सवाल उठाया।

हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई ठोस आधार सामने नहीं आया, जिससे यह साबित हो कि जमीन संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति थी।

सिर्फ जमीन दादा के नाम होने और खुद को पोता बताने से उसमें जन्म से हिस्सा नहीं मिल जाता।

हाईकोर्ट ने कहा कि सह-दायिकी हक का दावा करने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि जमीन संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति थी।

देवाराम ऐसा कोई आधार साबित नहीं कर पाए। इसलिए जमीन में जन्म से एक-नौवां हिस्सा होने का उनका दावा स्वीकार नहीं किया गया।

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दादा की मौत के बाद तीन बेटों को मिला हिस्सा

हाईकोर्ट ने चुतरा राम की मौत के बाद संपत्ति के बंटवारे को भी देखा।

चुतरा राम बिना वसीयत के मरे थे। इसलिए हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-8 के तहत उनके तीन बेटे उनके प्रथम श्रेणी के वारिस बने।

तीनों को जमीन में बराबर हिस्सा मिला और प्रत्येक के नाम एक-तिहाई हिस्सा दर्ज हुआ।

हाईकोर्ट ने कहा कि देवाराम अपने पिता के जरिए दादा की संपत्ति में हिस्सेदार होने का दावा कर रहे थे, लेकिन पिता को मिला एक-तिहाई हिस्सा उत्तराधिकार के जरिए उनके नाम आया था।

सिर्फ इस वजह से पिता को मिली संपत्ति में बेटे को जन्म से सह-दायिकी अधिकार नहीं मिल जाता।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उत्तम बनाम सौभाग सिंह के फैसले का भी हवाला दिया और इसी कानूनी स्थिति को लागू किया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि दादा की मौत के समय देवाराम नाबालिग थे, लेकिन इससे उत्तराधिकार की कानूनी स्थिति नहीं बदलती।

बेचान रद्द कराने से पहले खातेदारी हक जरूरी

मामले में हाईकोर्ट के सामने यह भी सवाल था कि देवाराम सीधे सिविल कोर्ट में जाकर जमीन का बेचान रद्द कराने की मांग कर सकते थे या नहीं।

हाईकोर्ट ने कहा कि देवाराम का बेचान रद्द कराने का दावा उनके कथित खातेदारी और जमीन में हिस्से के हक पर आधारित था।

जब यही मूल हक अभी साबित नहीं हुआ था, तो उसके आधार पर बेचान रद्द कराने की मांग भी सिविल कोर्ट में नहीं चल सकती।

राजस्थान काश्तकारी अधिनियम की धारा 88 के तहत खातेदारी हक की घोषणा सक्षम राजस्व कोर्ट से करानी होती है।

वहीं धारा 207 कुछ ऐसे मामलों में सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को बाहर करती है, जिन्हें अधिनियम के तहत राजस्व कोर्ट द्वारा तय किया जाना है।

इसलिए सिविल कोर्ट खुद खातेदारी हक तय करके उसके आधार पर जमीन का बेचान रद्द नहीं कर सकता।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी सहारा

हाईकोर्ट ने प्यारे लाल बनाम शुभेंद्र पिलानिया के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी जिक्र किया।

हाईकोर्ट ने कहा कि अगर कृषि जमीन में खातेदारी हक ही विवाद का मुख्य मुद्दा है, तो पहले इसी हक का फैसला सक्षम राजस्व कोर्ट से होना चाहिए।

इसके बाद ही उस हक के आधार पर बेचान रद्द कराने या दूसरी राहत की मांग की जा सकती है।

हाईकोर्ट ने साफ किया कि सिविल कोर्ट में जमीन का हक घोषित करने, बेचान रद्द करने और रोक लगाने जैसी मांगें एक साथ कर देने से उसका अधिकार क्षेत्र नहीं बन जाता।

अगर मूल खातेदारी हक का फैसला राजस्व कोर्ट को करना है, तो सिविल कोर्ट उस सवाल का फैसला करके आगे की राहत नहीं दे सकता।

निचली अदालत ने भी खारिज किया था मुकदमा

मामले में एस्टेट्स एलएलपी के अधिकृत प्रतिनिधि संजीव त्रिवेदी की ओर से आवेदन दाखिल कर देवाराम का मुकदमा खारिज करने की मांग की गई थी।

दलील दी गई कि देवाराम ने अपने कथित खातेदारी हक को लेकर सक्षम राजस्व कोर्ट से कोई घोषणा नहीं कराई है। ऐसे में सिविल कोर्ट में बेचान रद्द कराने का मुकदमा नहीं चल सकता।

पोकरण के अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ने 10 फरवरी 2026 को यह दलील स्वीकार करते हुए देवाराम का मूल मुकदमा खारिज कर दिया।

इसके बाद देवाराम ने इस फैसले के खिलाफ राजस्थान हाईकोर्ट में प्रथम अपील दायर की।

अब हाईकोर्ट ने अपील खारिज की

हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के फैसले में कोई कानूनी गलती नहीं पाई।

हाईकोर्ट ने कहा कि मामला दो स्तरों पर देवाराम के खिलाफ जाता है।

पहला, वह जमीन को संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति साबित नहीं कर पाए और दूसरा, उन्होंने अपने कथित खातेदारी हक की घोषणा के लिए सक्षम राजस्व कोर्ट का रास्ता नहीं अपनाया

इसी के तहत जस्टिस फरजंद अली ने 20 अगस्त 2026 को फैसला सुनाते हुए पोकरण के अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के 10 फरवरी 2026 के फैसले को बरकरार रखा।

हाईकोर्ट ने देवाराम की प्रथम अपील खारिज कर दी। साथ ही, लंबित स्थगन आवेदन और दूसरी अर्जियों का भी निपटारा कर दिया गया।

रिकॉर्ड निचली अदालत को वापस भेजने का निर्देश दिया गया।

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