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अलिमनी का उद्देश्य संपत्ति बढ़ाना नहीं, आर्थिक सुरक्षा देना है : हाईकोर्ट ने पत्नी की गुजारा भत्ता राशि को 25 लाख से बढ़ाकर किया 40 लाख, 2 करोड़ की मांग ठुकराई

Rajasthan High Court Enhances Alimony to ₹40 Lakh, Rejects ₹2 Crore Claim; Says Purpose Is Financial Security, Not Wealth Creation

जोधपुर। Rajasthan High Court ने वैवाहिक विवाद के एक लंबे मामले में फैसला सुनाते हुए डॉक्टर पति को अपनी तलाकशुदा पत्नी को 40 लाख रुपये स्थायी गुजारा भत्ता (Permanent Alimony) देने का आदेश दिया है।

कोर्ट ने साफ कहा कि अलिमनी का उद्देश्य सिर्फ जीविका नहीं, बल्कि महिला को सम्मानजनक जीवन और आर्थिक सुरक्षा देना है।

फैमिली कोर्ट के फैसले में बड़ा बदलाव

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा तय 25 लाख रुपये की राशि को कम मानते हुए इसे बढ़ाकर 40 लाख रुपये कर दिया।

साथ ही यह भी निर्देश दिया कि जब तक पूरी राशि का भुगतान नहीं होता, तब तक ₹45,000 मासिक भरण-पोषण जारी रहेगा।

जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने पत्नी शोभा कंवर की अपील स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया है।

16 साल का अलगाव, अकेले बच्चों की परवरिश

डॉक्टर पति-पत्नी के बीच 23 अप्रैल 1994 को पाली के मारवाड़ जंक्शन में हिंदू रीति-रिवाज से विवाह हुआ था।

दंपती के दो बेटे अब वयस्क हो चुके हैं। लेकिन पति-पत्नी के बीच 2009 से अलगाव शुरू हो गया।

पत्नी शोभा कंवर ने 2 मार्च 2015 को हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत तलाक की याचिका दायर की।

फैमिली कोर्ट का फैसला

पत्नी ने क्रूरता और परित्याग का आरोप लगाया। पत्नी का दावा था कि पति और उनके परिवार ने दहेज की मांग की, मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न किया। 1 मई 2009 को पति ने उन्हें घर से निकाल दिया। इसके बाद से वे बच्चों के साथ अकेले संघर्ष कर रही हैं।

फैमिली कोर्ट, जोधपुर ने 29 अगस्त 2025 को पत्नी की याचिका पर विवाह विच्छेद का आदेश दिया और पति को पत्नी को 25 लाख रुपये का एकमुश्त स्थायी गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया।

इसके साथ ही मासिक 45,000 रुपये भरण-पोषण भी तय किया (जो बाद में स्थायी भत्ते की राशि जमा होने तक सीमित कर दिया गया)। पत्नी ने इस राशि को “अपर्याप्त” बताते हुए हाईकोर्ट में अपील दायर की और इसे कम से कम 2 करोड़ रुपये करने की मांग की।

पत्नी की इस मांग को पति ने “अत्यधिक” बताते हुए क्रॉस-अपील दायर की।

दोनों अपीलें एक साथ सुनवाई के लिए स्वीकार की गईं।

पत्नी का दावा था कि उन्हें घर से निकाल दिया गया और तब से वे दोनों बच्चों की जिम्मेदारी अकेले उठा रही हैं।

हाईकोर्ट का फैसला

दोनों पक्षों की दलीलें और बहस सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि पति एक सरकारी अस्पताल में ENT विशेषज्ञ हैं, जिनकी स्थिर सरकारी नौकरी है।

कोर्ट ने पति की आय लगभग ₹2 लाख प्रति माह मानी, लेकिन पत्नी की आय को लेकर ठोस सबूत नहीं मिलने की बात कही।

कोर्ट ने कहा कि पत्नी के पास कोई स्थायी घर या आय का स्रोत नहीं है।

कोर्ट ने किन आधारों पर बढ़ाई राशि?

हाईकोर्ट ने कहा कि दोनों का विवाह लगभग 15 साल चला और 16 साल से अलगाव है। पत्नी के पास आवास और स्थिर आय का अभाव है और पति के पास संपत्ति और स्थिर आय है।

इन सभी तथ्यों को देखते हुए ₹40 लाख को “उचित और संतुलित” बताया गया।

2 करोड़ की मांग क्यों हुई खारिज?

पत्नी ने अलिमनी को ₹2 करोड़ तक बढ़ाने की मांग की थी, लेकिन कोर्ट ने कहा कि
पति की ₹8–10 लाख प्रतिमाह आय के दावे साबित नहीं हुए और अलिमनी का उद्देश्य संपत्ति बढ़ाना नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा देना है।

इसलिए मांग को “अतिशयोक्तिपूर्ण” मानते हुए खारिज कर दिया गया।

अंतिम फैसला

हाईकोर्ट ने इस मामले में पत्नी की अपील स्वीकार करते हुए पति की अपील को खारिज करने का आदेश दिया।

इसके साथ ही अलिमनी को बढ़ाकर ₹25 लाख से ₹40 लाख करते हुए 6 माह में भुगतान करने का आदेश दिया।

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