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फैमिली कोर्ट आपस में केस ट्रांसफर नहीं कर सकते, फैमिली कोर्ट को ट्रांसफर का अधिकार नहीं, सिर्फ हाईकोर्ट कर सकता है केस ट्रांसफर : राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Rajasthan High Court Rules Family Courts Cannot Transfer Cases, Declares Such Orders Invalid

भरतपुर फैमिली कोर्ट मामले में ऐतिहासिक निर्णय, 2017 के आदेश को बताया पर इनक्यूरियम; फैमिली कोर्ट द्वारा किया गया ट्रांसफर आदेश अवैध घोषित

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि राज्य में फैमिली कोर्ट को एक कोर्ट से दूसरे फैमिली कोर्ट में मामलों के ट्रांसफर (स्थानांतरण) का कोई अधिकार नहीं है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने इस रिपोर्टेबल जजमेंट में स्पष्ट किया है कि फैमिली कोर्ट एक-दूसरे के अधीन (subordinate) नहीं होते, इसलिए वे आपस में ट्रांसफर नहीं कर सकते।

कोर्ट ने कहा कि ट्रांसफर एक स्वतंत्र और विशेष शक्ति है, जिसे केवल उच्च न्यायालय ही प्रयोग कर सकता है। प्रशासनिक कार्य (जैसे केस आवंटन) और न्यायिक ट्रांसफर में स्पष्ट अंतर है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसा अधिकार केवल हाईकोर्ट के पास ही निहित है और इसे किसी न्यायिक आदेश के माध्यम से फैमिली कोर्ट को नहीं दिया जा सकता।

जस्टिस सुदेश बंसल और जस्टिस अनिल कुमार उपमन की खंडपीठ ने यह फैसला भरतपुर के एक मामले में दिया है, जहां फैमिली कोर्ट नंबर-1 ने चार वैवाहिक मामलों को फैमिली कोर्ट नंबर-2 में ट्रांसफर कर दिया था।

इस आदेश को चुनौती मिलने के बाद मामला सिविल रेफरेंस के रूप में हाईकोर्ट पहुंचा।

मामला क्या था?

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब भरतपुर की फैमिली कोर्ट नंबर-1 ने 6 दिसंबर 2025 को अपने समक्ष लंबित चार वैवाहिक मामलों को फैमिली कोर्ट नंबर-2 में ट्रांसफर कर दिया।

फैमिली कोर्ट ने यह निर्णय एक पूर्व न्यायिक आदेश (24 अप्रैल 2017) के आधार पर लिया, जिसमें यह सुझाव दिया गया था कि एक ही शहर में स्थित फैमिली कोर्ट आपस में मामलों का स्थानांतरण कर सकते हैं।

लेकिन जब यह मामला फैमिली कोर्ट नंबर-2 के समक्ष पहुंचा, तो वहां के न्यायाधीश ने इस पर आपत्ति जताई और कहा कि ऐसा ट्रांसफर संभवतः सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 24 के विपरीत है।

फैमिली कोर्ट संख्या 2 ने एक रेफरेंस के जरिए इस मुद्दे पर मार्गदर्शन के लिए राजस्थान हाईकोर्ट से राय मांगी।

हाईकोर्ट ने इस मामले को D.B. Civil Reference संख्या 1/2026, Hema Versus Mohit Bhardwaj नाम से सूचीबद्ध करते हुए दोनों पक्षकारों को भी अपना पक्ष रखने का मौका दिया।

हाईकोर्ट के समक्ष उठे अहम सवाल

यह मामला केवल एक ट्रांसफर आदेश का नहीं था, बल्कि इसने एक बड़े कानूनी सवाल को जन्म दिया— क्या फैमिली कोर्ट अपनी सीमाओं से बाहर जाकर शक्तियाँ ग्रहण कर सकता है?

हाईकोर्ट को भेजे गए रेफरेंस को याचिका के रूप में सूचीबद्ध करते हुए हाईकोर्ट ने इस मामले में तीन महत्वपूर्ण प्रश्न तय किए:

  1. क्या फैमिली कोर्ट को CPC की धारा 24 के तहत मामलों के ट्रांसफर का अधिकार है?
  2. क्या हाईकोर्ट का कोई एकल न्यायाधीश अपने आदेश से फैमिली कोर्ट को ऐसा अधिकार दे सकता है?
  3. क्या 2017 का आदेश बाध्यकारी न्यायिक उदाहरण (precedent) है?

फैमिली कोर्ट को अधिकार होना चाहिए-याचिकाकर्ता का पक्ष

याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने मुख्य रूप से यह तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट को मामलों के प्रभावी और त्वरित निपटारे के लिए आवश्यक शक्तियाँ मिलनी चाहिए, जिनमें मामलों के ट्रांसफर (स्थानांतरण) का अधिकार भी शामिल है।

याचिकाकर्ता पक्ष ने कहा कि फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984 की धारा 7 के तहत फैमिली कोर्ट को वही अधिकार प्राप्त हैं जो एक जिला न्यायालय को होते हैं।

जब फैमिली कोर्ट वैवाहिक मामलों की सुनवाई करता है, तो वह “डिस्ट्रिक्ट कोर्ट” के समान कार्य करता है। इसलिए, जब जिला न्यायालय को CPC की धारा 24 के तहत ट्रांसफर का अधिकार है, तो वही अधिकार फैमिली कोर्ट को भी मिलना चाहिए।

अधिवक्ता ने कहा कि एक ही परिवार से जुड़े कई केस अलग-अलग फैमिली कोर्ट में लंबित रहते हैं। इससे समय, संसाधन और न्यायिक प्रक्रिया पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। यदि फैमिली कोर्ट को स्वयं ट्रांसफर का अधिकार दिया जाए, तो मामलों का एक साथ निपटारा संभव होगा।

याचिकाकर्ता ने 24 अप्रैल 2017 के उस आदेश का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि फैमिली कोर्ट स्वयं (suo motu) या पक्षकारों के आवेदन पर केस ट्रांसफर कर सकता है, इससे हाईकोर्ट पर अनावश्यक बोझ कम होगा।

याचिकाकर्ता पक्ष ने कहा कि भले ही एक्ट में स्पष्ट रूप से ट्रांसफर का प्रावधान न हो, लेकिन व्यापक न्यायिक अधिकारों की व्याख्या करते हुए यह शक्ति निहित (implied) मानी जानी चाहिए। फैमिली कोर्ट को सीमित करना न्याय के उद्देश्य के विपरीत होगा।

ट्रांसफर का अधिकार केवल हाईकोर्ट को-प्रतिवादी पक्ष की दलीलें

प्रतिवादी पक्ष ने याचिकाकर्ता के सभी तर्कों का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट को ट्रांसफर का कोई अधिकार नहीं है और ऐसा करना पूरी तरह अवैध है।

अधिवक्ता ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 24 स्पष्ट रूप से कहती है कि केवल हाईकोर्ट या जिला न्यायालय ही मामलों का ट्रांसफर कर सकते हैं। इसमें कहीं भी फैमिली कोर्ट को यह शक्ति नहीं दी गई है।

इसलिए, फैमिली कोर्ट द्वारा किया गया कोई भी ट्रांसफर आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर (without jurisdiction) है।

अधिवक्ता ने कहा कि फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984 एक विशेष कानून (Special Law) है। इसमें ट्रांसफर का कोई प्रावधान नहीं है। जब विशेष कानून में कोई शक्ति नहीं दी गई है, तो उसे सामान्य कानून (CPC) से नहीं लिया जा सकता।

अधिवक्ता ने कहा कि एक ही जिले में स्थित दो फैमिली कोर्ट एक-दूसरे के अधीन (subordinate) नहीं होते। CPC की धारा 24 केवल अधीनस्थ अदालतों (subordinate courts) पर लागू होती है। इसलिए, एक फैमिली कोर्ट दूसरे को केस ट्रांसफर नहीं कर सकता।

अधिवक्ता ने कहा कि केसों का आवंटन (allocation) एक प्रशासनिक कार्य है, जो हाईकोर्ट करता है। लेकिन ट्रांसफर एक न्यायिक शक्ति है, जिसे केवल हाईकोर्ट ही प्रयोग कर सकता है। फैमिली कोर्ट इन दोनों भूमिकाओं को नहीं निभा सकता।

अधिवक्ता ने 2017 के आदेश को चुनौती देते हुए कहा कि उस आदेश में संबंधित कानूनों पर समुचित विचार नहीं किया गया। इसलिए वह आदेश कानून की दृष्टि में त्रुटिपूर्ण (legally flawed) है। उसे बाध्यकारी उदाहरण (binding precedent) नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट का फैसला

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस सुदेश बंसल और जस्टिस अनिल कुमार उपमन की खंडपीठ ने कहा कि फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984 की धारा 7 केवल न्यायिक अधिकार देती है, न कि ट्रांसफर का अधिकार।

कोर्ट ने कहा कि CPC की धारा 24 स्पष्ट रूप से कहती है कि ट्रांसफर का अधिकार केवल हाईकोर्ट या जिला न्यायालय को है।

कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट एक विशेष कानून (Special Statute) के तहत कार्य करता है, इसलिए सामान्य कानून (CPC) की तुलना में विशेष कानून को प्राथमिकता दी जाएगी।

कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि फैमिली कोर्ट को ट्रांसफर का अधिकार दिया जाए, तो यह कानून बनाने जैसा होगा, जो न्यायपालिका का कार्य नहीं है।

2017 के आदेश पर बड़ी टिप्पणी

हाईकोर्ट ने 24 अप्रैल 2017 के उस आदेश की भी समीक्षा की, जिसमें यह कहा गया था कि फैमिली कोर्ट आपस में मामलों का ट्रांसफर कर सकते हैं।

कोर्ट ने कहा कि इस आदेश में संबंधित कानूनों (विशेषकर धारा 7, फैमिली कोर्ट्स एक्ट) पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया। इसलिए वह आदेश ‘पर इनक्यूरियम’ (per incuriam) है, यानी कानून की अनदेखी में दिया गया निर्णय। इसे बाध्यकारी उदाहरण (binding precedent) नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट का अंतिम फैसला

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि फैमिली कोर्ट को मामलों के ट्रांसफर का कोई अधिकार नहीं है। यह अधिकार केवल हाईकोर्ट के पास है।

किसी एकल न्यायाधीश के आदेश से भी फैमिली कोर्ट को यह शक्ति नहीं दी जा सकती।

भरतपुर फैमिली कोर्ट नंबर-1 द्वारा 6 दिसंबर 2025 को दिया गया ट्रांसफर आदेश अवैध (non-est) घोषित किया गया।

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