जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने मोटर दुर्घटना मुआवजा मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि बीमा पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन हुआ हो, तब भी परिस्थितियों के अनुसार बीमा कंपनी को पहले पीड़ित को मुआवजा दिलाया जा सकता है और बाद में उसे वाहन मालिक व चालक से वसूलने की अनुमति दी जा सकती है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने विशेष रूप से इस तथ्य को महत्व दिया कि दुर्घटना के समय घायल बच्चा करीब 10 वर्ष का था।
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने यार मोहम्मद की अपील को सीमित स्तर तक स्वीकार करते हुए मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, जैसलमेर के उस आदेश में संशोधन किया, जिसमें बीमा कंपनी को पूरी तरह दायित्व से मुक्त कर दिया गया था।
हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि बीमा कंपनी पीड़ित को पहले 4,81,000 रुपये की मुआवजा राशि पर 13 नवंबर 2017 से 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित भुगतान करेगी।
इसके बाद बीमा कंपनी को यह राशि वाहन मालिक और चालक से कानून के अनुसार वसूलने का अधिकार रहेगा।
क्या था पूरा मामला?
अपीलकर्ता यार मोहम्मद दुर्घटनाग्रस्त वाहन का मालिक था।
मामले में खुदाबख्श घायल दावेदार था, जबकि अमीन खान वाहन चालक और श्रीराम जनरल इंश्योरेंस कंपनी बीमाकर्ता थी।
घटना 11 मई 2017 की हैं जब घायल खुदाबख्श उस समय करीब 10 वर्ष का था और अपने रिश्तेदारों व परिचितों के साथ Bolero Camper में मधाला शरीफ दरगाह से लौट रहा था।
12 मई 2017 को करीब सुबह 9 बजे देविकोट गांव की सीमा के पास वाहन कथित रूप से तेज और लापरवाही से चलाए जाने के कारण अनियंत्रित होकर पलट गया।
हादसे में बच्चे के पेट सहित शरीर के अन्य हिस्सों में चोटें आईं।
पुलिस जांच के बाद चालक के खिलाफ IPC की धाराओं के तहत चार्जशीट दाखिल की गई।
ट्रिब्यूनल ने 4.81 लाख रुपये का मुआवजा दिया
घायल के दावे पर मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, जैसलमेर ने 16 फरवरी 2024 को फैसला सुनाते हुए मुआवजे का फैसला दिया।
ट्रिब्यूनल ने दुर्घटना को चालक की लापरवाही से हुआ माना और मालिक तथा चालक पर मुआवजे की जिम्मेदारी तय की।
कुल 4.81 लाख रुपये का मुआवजा 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ 13 नवंबर 2017 से देने के आदेश दिए. हालांकि बीमा कंपनी को जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया था।
ट्रिब्यूनल के अनुसार वाहन एक गुड्स व्हीकल था और दुर्घटना के समय उसमें यात्री सवार थे।
ट्रिब्यूनल ने यह भी माना कि चालक के पास ट्रांसपोर्ट वाहन चलाने का अलग लाइसेंस नहीं था और इसे बीमा पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन माना गया।
इसी आधार पर बीमा कंपनी को मुआवजा देने से मुक्त कर दिया गया था।
वाहन मालिक ने क्या दलील दी?
वाहन मालिक की ओर से हाईकोर्ट में तर्क दिया गया कि दुर्घटना के समय वाहन बीमित था और चालक के पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस था।
बीमा कंपनी ने प्रीमियम स्वीकार कर पॉलिसी जारी की थी, इसलिए केवल कथित पॉलिसी उल्लंघन के आधार पर घायल तीसरे पक्ष को मुआवजे से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
वैकल्पिक रूप से यह भी कहा गया कि यदि पॉलिसी की कोई शर्त टूटी भी हो तो बीमा कंपनी को पहले मुआवजा अदा करने का निर्देश दिया जा सकता है और उसके बाद वह मालिक व चालक से रकम वसूल सकती है।
अपीलकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के Shyam Lal v. Shriram General Insurance Co. Ltd. और Haris Marine Products v. ECGC Ltd. के फैसलों का हवाला दिया गया।
बीमा कंपनी ने क्या कहा?
बीमा कंपनी ने ट्रिब्यूनल के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि वाहन गुड्स व्हीकल था और घायल बच्चा उसमें अनधिकृत यात्री के रूप में यात्रा कर रहा था।
यात्रियों को कवर करने के लिए कोई अलग प्रीमियम नहीं दिया गया था। साथ ही वाहन में यात्रियों को ले जाने के लिए आवश्यक परमिट भी नहीं था।
बीमा कंपनी की ओर से यह भी कहा गया कि वाहन मालिक ने स्वयं स्वीकार किया था कि यात्रियों को ले जाने के लिए कोई परमिट प्राप्त नहीं किया गया था। इसलिए बीमा कंपनी को मुआवजे की जिम्मेदारी से मुक्त रखना उचित था।
हाईकोर्ट ने ड्राइविंग लाइसेंस पर क्या कहा?
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने पाया कि ट्रिब्यूनल ने चालक के लाइसेंस के संबंध में यह निष्कर्ष निकाला था कि उसमें ट्रांसपोर्ट वाहन चलाने का अलग अधिकार नहीं था।
लेकिन रिकॉर्ड पर मौजूद लाइसेंस में “MCW with Gear LMV” चलाने का अधिकार दर्ज था और वाहन का gross vehicle weight 2750 किलोग्राम था, जो Light Motor Vehicle की श्रेणी में आता है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Mukund Dewangan और संविधान पीठ के Bajaj Allianz General Insurance Co. Ltd. v. Rambha Devi के फैसलो का हवाला देते हुए कहा कि केवल अलग ट्रांसपोर्ट-व्हीकल एंडोर्समेंट नहीं होने के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि चालक वाहन चलाने के लिए अधिकृत नहीं था।
इसलिए इस आधार पर बीमा कंपनी को जिम्मेदारी से मुक्त करने का ट्रिब्यूनल का का फैसला कायम नहीं रखा जा सकता।
लेकिन यात्रियों को बिना परमिट ले जाना उल्लंघन माना
हाईकोर्ट ने साथ ही स्पष्ट किया कि वाहन में यात्रियों को ले जाने के लिए आवश्यक परमिट नहीं था।
वाहन मालिक ने अपनी जिरह में स्वीकार किया था कि वाहन यात्री वाहन नहीं था और यात्रियों को ले जाने के लिए उसके पास कोई परमिट नहीं था।
कोर्ट ने माना कि गुड्स व्हीकल का यात्रियों को बिना आवश्यक परमिट ले जाने में इस्तेमाल करना पॉलिसी शर्तों का उल्लंघन था।
इसलिए वाहन मालिक बीमा कंपनी से पूर्ण मुआवजे का दावा नहीं कर सकता।
नाबालिग बच्चे के हित में ‘Pay and Recover’ सिद्धांत
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल यह तथ्य कि पॉलिसी का उल्लंघन हुआ है, अपने आप में यह तय नहीं करता कि बीमा कंपनी को घायल तीसरे पक्ष को मुआवजा देने से पूरी तरह मुक्त कर दिया जाए।
यहां दावेदार दुर्घटना के समय करीब 10 वर्ष का नाबालिग बच्चा था और उसके पक्ष में पहले ही मुआवजे का अवार्ड हो चुका था।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए “pay and recover” सिद्धांत लागू किया।
इसके तहत बीमा कंपनी पहले मुआवजे की राशि का भुगतान करेगी और बाद में कानून के अनुसार मालिक व चालक से इसकी वसूली कर सकेगी।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए ट्रिब्यूनल के उस हिस्से को संशोधित कर दिया, जिसमें बीमा कंपनी को मुआवजा देने की जिम्मेदारी से पूरी तरह मुक्त कर दिया गया था।
अब श्रीराम जनरल इंश्योरेंस कंपनी को पहले 4,81,000 रुपये और 13 नवंबर 2017 से 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ मुआवजा दावेदार को अदा करना होगा।
इसके बाद बीमा कंपनी को यह रकम वाहन मालिक यार मोहम्मद और चालक अमीन खान से कानून के अनुसार वसूलने की स्वतंत्रता रहेगी।
इसके लिए बीमा कंपनी को अलग से सिविल मुकदमा दायर करना आवश्यक नहीं होगा और वह संबंधित ट्रिब्यूनल/एक्जीक्यूटिंग कोर्ट के समक्ष कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकती है।
कोर्ट ने मुआवजे की राशि, ब्याज की दर और ब्याज की अवधि से संबंधित ट्रिब्यूनल के अन्य निष्कर्षों को बरकरार रखा।