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प्रथम दृष्टया मामला बनता है’ कहना पर्याप्त नहीं, प्रत्येक अपराध के आवश्यक तत्वों का अभिलेख पर मौजूद होना अनिवार्य

Rajasthan HC Issues New SOP for District Courts, Sets Timelines for Infrastructure and Facility Complaints

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिग से जुड़े एक महत्वपूर्ण आपराधिक मामले में निचली अदालत द्वारा तय किए गए सभी आरोपों को खारिज करते हुए आरोपी युवक को बड़ी राहत दी है।

जस्टिस फरजंद अली की अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ केवल आरोपपत्र दाखिल हो जाने या यह सामान्य टिप्पणी कर देने से कि उसके विरुद्ध प्रथम दृष्टया मामला बनता है, आपराधिक मुकदमा आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।

अदालत ने कहा कि आरोप तय करते समय अदालत का दायित्व है कि वह जांच के दौरान एकत्र सामग्री का सीमित लेकिन सार्थक परीक्षण करे और यह देखे कि जिस अपराध के लिए आरोप लगाया जा रहा है, उसके प्रत्येक आवश्यक कानूनी तत्व का प्रथम दृष्टया तथ्यात्मक आधार अभिलेख पर मौजूद है या नहीं।

मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि नाबालिग के पुलिस और न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए गए बयानों में ऐसे महत्वपूर्ण तथ्य थे, जिनसे अभियोजन द्वारा लगाए गए कई आरोपों की मूल आधारभूत बातें सामने नहीं आती थीं।

जैसलमेर के थाने में दर्ज हुआ था मामला

मामला जैसलमेर जिले के थाना क्षेत्र में दर्ज हुआ था शिकायत के अनुसार, शिकायतकर्ता की करीब 15 वर्षीय बेटी 16 और 17 अप्रैल 2026 की मध्यरात्रि में घर से चली गई थी और बाद में आरोपी सायब खान के साथ यात्रा करते हुए मिली।

जांच के बाद पुलिस ने आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 137(2), 74 और 78(2), पॉक्सों अधिनियम की धारा 7/8 तथा 11/12 और किशोर न्याय अधिनियम की धारा 84 के तहत आरोपपत्र प्रस्तुत किया।

जैसलमेर की सत्र अदालत ने 22 जून 2026 को इन धाराओं के तहत आरोपी के खिलाफ आरोप तय कर दिए थे।

इसी आदेश को चुनौती देते हुए आरोपी सायब खान ने राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

आरोपी की दलील-नाबालिग के बयानों पर नहीं दिया ध्यान

आरोपी की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि निचली अदालत ने आरोप तय करते समय जांच के दौरान सामने आई महत्वपूर्ण सामग्री पर उचित न्यायिक विचार नहीं किया।

विशेष रूप से नाबालिग के पुलिस और न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज बयानों की ओर अदालत का ध्यान आकर्षित किया गया।

बचाव पक्ष का कहना था कि इन बयानों में स्वयं नाबालिग ने ऐसे तथ्य बताए हैं जो उसके साथ जबरदस्ती, धमकी, गलत कार्य या यौन संबंध के आरोपों के आधार को कमजोर करते हैं।

मैं अपनी इच्छा से आरोपी के साथ गई

हाईकोर्ट ने नाबालिग के न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज बयान को विशेष महत्व दिया।

बयान में नाबालिग ने बताया कि उसके परिवार वाले उसकी शादी किसी अन्य युवक से करवाना चाहते थे, जिसे वह पसंद नहीं करती थी।

इसी कारण वह 16 अप्रैल 2026 को सायब खान के साथ उसकी गाड़ी में अपनी इच्छा से गई थी।

नाबालिग ने यह भी स्पष्ट रूप से कहा कि आरोपी ने उसे डराया या धमकाया नहीं और उसके साथ कोई गलत काम नहीं किया।

जांच के दौरान दर्ज उसके बयान में भी सामने आया कि उसने स्वयं आरोपी से शादी के लिए अजमेर चलने को कहा था। उसने यह भी कहा था कि उसके साथ कोई गलत काम नहीं हुआ और दोनों के बीच कोई संबंध नहीं बना था।

बच्चे की सहमति का कानूनी अर्थ अलग, लेकिन अपराध के तत्व भी जरूरी

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के आरोपों पर हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण संतुलित टिप्पणी की।

अदालत ने कहा कि 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे की सहमति को वयस्क की सहमति के समान नहीं माना जा सकता।

लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं है कि आरोप तय करते समय संबंधित अपराध के आवश्यक कृत्य या परिस्थितियों का तथ्यात्मक आधार देखना ही आवश्यक नहीं रहेगा।

अदालत ने रिकॉर्ड में मौजूद नाबालिग के बयानों पर गौर किया, जिनमें उसने किसी शारीरिक या यौन संबंध तथा किसी गलत कार्य से इनकार किया था।

वहीं निचली अदालत के आरोप तय करने वाले आदेश में ऐसा कोई स्वतंत्र तथ्यात्मक आधार स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया, जिससे संबंधित लैंगिक अपराधों के आवश्यक तत्व प्रथम दृष्टया स्थापित होते हों।

पीछा करने के आरोप पर भी हाईकोर्ट ने उठाया सवाल

भारतीय न्याय संहिता की धारा 78(2) के तहत पीछा करने के आरोप पर भी हाईकोर्ट ने कहा कि केवल किसी माध्यम से बातचीत होना अपने आप में इस अपराध को स्थापित नहीं करता।

अदालत के अनुसार इस अपराध के लिए ऐसी विशिष्ट परिस्थितियों का प्रथम दृष्टया आधार होना चाहिए, जिनसे यह पता चले कि स्पष्ट असहमति के बावजूद बार-बार संपर्क किया गया या महिला के इंटरनेट, संदेश अथवा अन्य इलेक्ट्रॉनिक संचार पर निगरानी रखी गई।

निचली अदालत के आदेश में ऐसी किसी विशिष्ट सामग्री की पहचान नहीं की गई थी।

मारपीट और आपराधिक बल के आरोप का भी आधार नहीं मिला

भारतीय न्याय संहिता की धारा 74 के तहत लगाए गए आरोप पर हाईकोर्ट ने कहा कि नाबालिग के बयानों में मारपीट, आपराधिक बल, धमकी या डराने की बात नहीं थी।

इसके विपरीत, नाबालिग ने अपने बयान में आरोपी द्वारा कोई गलत काम किए जाने से इनकार किया था।

ऐसे में निचली अदालत के आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि इस अपराध के आवश्यक तत्वों को प्रथम दृष्टया स्थापित करने वाली स्वतंत्र सामग्री आखिर कौन-सी थी।

केवल साथ मिलना अपहरण का पर्याप्त आधार नहीं

भारतीय न्याय संहिता की धारा 137(2) के संबंध में भी हाईकोर्ट ने कहा कि किसी नाबालिग का किसी वयस्क के साथ मिलना मात्र अपने आप में नाबालिग को ले जाने या बहला-फुसलाने के सभी कानूनी तत्वों को पूरा नहीं करता।

हाईकोर्ट के अनुसार निचली अदालत को यह देखना आवश्यक था कि आरोपी द्वारा नाबालिग को ले जाने, बहलाने या प्रेरित करने के संबंध में अभिलेख पर कोई स्वतंत्र प्रथम दृष्टया सामग्री मौजूद है या नहीं।

आरोप तय करने वाले आदेश में इस महत्वपूर्ण पहलू का पर्याप्त परीक्षण दिखाई नहीं दिया।

“प्रथम दृष्टया मामला” लिखना पर्याप्त नहीं

जस्टिस फरजंद अली ने आरोप तय करने की प्रक्रिया को लेकर कहा कि अदालत न तो इस चरण पर साक्ष्यों का अंतिम मूल्यांकन कर सकती है और न ही मुकदमे की तरह विस्तृत परीक्षण कर सकती है।

लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं है कि न्यायालय केवल पुलिस द्वारा प्रस्तुत आरोपपत्र को स्वीकार कर आरोप तय कर दे।

अदालत ने स्पष्ट किया कि “प्रथम दृष्टया” संतुष्टि केवल औपचारिक शब्द नहीं है। इसके पीछे अभिलेख पर कोई पहचान योग्य तथ्यात्मक आधार होना चाहिए।

न्यायालय को कम से कम यह स्पष्ट करना होगा कि कौन-सी सामग्री किस अपराध के आवश्यक तत्वों को प्रथम दृष्टया पूरा करती है।

कई अपराधों के आरोप हों तो हर अपराध का अलग आधार जरूरी

हाईकोर्ट ने कहा कि जब किसी आरोपी के खिलाफ एक साथ कई अलग-अलग अपराधों के आरोप लगाए जाते हैं और प्रत्येक अपराध के अलग-अलग कानूनी तत्व होते हैं, तब न्यायिक विवेक का प्रयोग और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

सिर्फ यह लिख देना कि “अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री से प्रथम दृष्टया मामला बनता है” पर्याप्त नहीं है। प्रत्येक अपराध के संबंध में उस सामग्री की पहचान होनी चाहिए, जो उसके आवश्यक तत्वों का आधार बनती है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोप तय करने के चरण में अभियोजन को अपना पूरा मामला संदेह से परे साबित करने की आवश्यकता नहीं होती।

लेकिन केवल आरोप लगाए जाने और आरोपपत्र दाखिल हो जाने के कारण किसी व्यक्ति को आपराधिक मुकदमे का सामना करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

22 जून का आदेश रद्द, आरोपी सभी आरोपों से मुक्त

सभी तथ्यों और अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने जैसलमेर की सत्र अदालत द्वारा 22 जून 2026 को पारित आरोप तय करने वाले आदेश को रद्द कर दिया।

अदालत ने आरोपी सायब खान को भारतीय न्याय संहिता की धारा 137(2), 74 और 78(2), लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 7/8 और 11/12 तथा किशोर न्याय अधिनियम की धारा 84 के तहत लगाए गए आरोपों से डिस्चार्ज कर दिया।

हाईकोर्ट ने अंतिम साक्ष्य पर नहीं दिया फैसला

अदालत ने यह भी साफ किया कि उसके आदेश को मामले के अंतिम गुण-दोष पर निर्णय नहीं माना जाएगा।

हाईकोर्ट ने केवल यह जांचा कि 22 जून 2026 को आरोप तय करते समय निचली अदालत के सामने उपलब्ध सामग्री से संबंधित अपराधों के लिए पर्याप्त प्रथम दृष्टया आधार मौजूद था या नहीं।

अदालत ने नाबालिग के बयानों की अंतिम सत्यता अथवा भविष्य में सामने आने वाली किसी अन्य विधिसम्मत सामग्री के साक्ष्य-मूल्य पर कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं की।

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