कोर्ट कमिश्नर की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा-पहाड़ों को बेरहमी से काटकर बने होटल-रिसॉर्ट, हिल पॉलिसी पर भी उठे गंभीर सवाल
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने उदयपुर की पहाड़ियों, झीलों और पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में हो रहे निर्माण को लेकर बेहद सख्त टिप्पणी की हैं.
राजस्थान हाईकोर्ट में जस्टिस समीर जैन की एकलपीठ ने एक होटल की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए बेहद गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा हैं कि उदयपुर की पहाड़ियां और पर्वत बेरहमी से काटे जा चुके हैं तथा उनकी जगह अब होटलों और रिसॉर्ट्स ने ले ली है।
एकलपीठ ने इसे केवल एक होटल का मामला न मानते हुए पूरे उदयपुर शहर के पारिस्थितिक भविष्य से जुड़ा गंभीर विषय बताया और संकेत दिए कि इस मामले में स्वतः संज्ञान (Suo Motu Public Interest Litigation) लेकर व्यापक जनहित याचिका दर्ज की जा सकती है।
मामला बसंत होटल्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है, जिसमें राज्य सरकार, नगर विकास विभाग, उदयपुर विकास प्राधिकरण (यूडीए) और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय सहित अन्य को पक्षकार बनाया गया है।
कोर्ट कमिश्नर की रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के आदेश पर अधिवक्ता कमिनी जोशी और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी राजेन्द्र भनावत ने मौका स्थल निरीक्षण कर अंतरिम रिपोर्ट पेश की।
रिपोर्ट में ड्रोन एवं हवाई फोटोग्राफी के आधार पर आसपास के क्षेत्र का निरीक्षण किया गया।
अदालत में पेश कि गयी रिपोर्ट के अनुसार उदयपुर की पहाड़ियों पर अनेक होटल पहले से संचालित हैं। याचिकाकर्ता की संपत्ति केवल अधिक ढलान वाले क्षेत्र में स्थित होने के कारण अलग दिखाई देती है।
निरीक्षण से स्पष्ट हुआ कि पहाड़ों और पर्वतों को बड़े पैमाने पर काटकर उन पर होटलों का निर्माण किया गया है और प्राकृतिक स्वरूप लगभग समाप्त होने की स्थिति में पहुंच गया है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि 2018 की हिल पॉलिसी निजी बाहरी एजेंसियों द्वारा तैयार की गई, जबकि पर्यावरण, वन्यजीव, जलवायु परिवर्तन एवं प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े किसी भी वैधानिक विभाग से कोई सलाह या परामर्श नहीं लिया गया।
रिपोर्ट में कहा गया कि निरीक्षण के दौरान यह भी पाया गया कि उदयपुर विकास प्राधिकरण (UDA) के अधिकारियों को स्वयं हिल पॉलिसी और पहाड़ी निर्माण से जुड़े कानूनों की पर्याप्त जानकारी नहीं थी।
“पिक एंड चूज” नीति का आरोप
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता होटल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एम.एस. सिंघवी ने पैरवी करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता का निर्माण पूर्व नीति के अनुरूप और सस्टेनेबल डेवलपमेंट की अवधारणा के तहत किया गया है।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि आसपास कृषि भूमि सहित कई स्थानों पर होटल बने हुए हैं, लेकिन केवल याचिकाकर्ता को निशाना बनाया जा रहा है।
याचिका में राज्य सरकार पर “पिक एंड चूज” नीति अपनाने और शत्रुतापूर्ण भेदभाव (Hostile Discrimination) का आरोप लगाया।
केंद्र और राज्य से भी मांगा जवाब
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से कहा गया कि पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तथा प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों को हिल पॉलिसी बनाते समय हितधारक नहीं बनाया गया था।
वहीं राज्य सरकार और यूडीए ने निरीक्षण रिपोर्ट का अध्ययन करने के लिए समय मांगा।
हाईकोर्ट ने कहा-उदयपुर की पहचान खतरे में
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि झीलों, पहाड़ियों और वन्यजीव अभयारण्यों के लिए प्रसिद्ध उदयपुर आज अत्यंत दयनीय स्थिति में पहुंच चुका है।
एकलपीठ ने कहा कि सस्टेनेबल डेवलपमेंट के नाम पर बनाई गई मनमानी नीतियों के कारण संवेदनशील क्षेत्रों, झीलों और पहाड़ियों पर सैकड़ों होटल, रिसॉर्ट और व्यावसायिक भवन खड़े कर दिए गए हैं।
कोर्ट ने कहा कि जिन संस्थाओं ने हिल पॉलिसी तैयार की, उनके पास इस विषय की विशेषज्ञता ही नहीं थी।
संविधान के अनुच्छेद 21, 14 और 19 का उल्लेख करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि व्यापार की स्वतंत्रता भी पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन के अधीन उचित प्रतिबंधों के अधीन रहती है।
पहले भी सरकार ने दिया था आश्वासन
हाईकोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि वर्ष 2019 में झील संरक्षण समिति बनाम राज्य सरकार जनहित याचिका का निस्तारण सरकार के इस आश्वासन पर किया गया था कि वह पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन के अनुरूप उचित नीति बनाएगी।
लेकिन वर्तमान स्थिति देखकर अदालत ने कहा कि सरकार ने विशेषज्ञता और शोध के बिना निजी एजेंसी के सहयोग से ऐसी नीति बना दी, जिसमें पर्यावरण एवं प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े विभागों की अनदेखी की गई।
स्वप्रेणा प्रसंज्ञान से PIL
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अगली सुनवाई पर केवल वर्तमान विवाद ही नहीं सुना जाएगा, बल्कि यह भी विचार किया जाएगा कि उदयपुर के नागरिकों के व्यापक हित में स्वप्रेणा प्रसंज्ञान से जनहित याचिका दर्ज की जाए या नहीं।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सभी संबंधित अधिकारियों को अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के आदेश दिए हैं.
इसके साथ ही होटल के निर्माण अनुमति से जुड़े सभी मूल रिकॉर्ड और सांख्यिकीय विवरण पेश करने और कोर्ट कमिश्नरों को भी अगली सुनवाई पर उपस्थित रहने के निर्देश दिए गए।
उनकी अंतरिम रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर लेते हुए सभी पक्षों को उसकी प्रति उपलब्ध कराने के आदेश दिए गए।
हिल पॉलिसी के लेखक का मांगा नाम
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को अगली सुनवाई तक याचिकाकर्ता के आसपास जारी सभी निर्माण एवं व्यावसायिक अनुमतियों का पूरा विवरण और अनुमति देने वाले अधिकारियों के नाम और पद की जानकारी मांगी हैं
2018 और 2024 की हिल पॉलिसी तैयार करने वाले लेखक/एजेंसी का नाम के साथ ही दोनों हिल पॉलिसियों के निर्माण से जुड़े मूल दस्तावेज, तर्क और निजी एजेंसी की रिपोर्ट तलब की हैं.
मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई 2026 को सूचीबद्ध की गई।