जोधपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने जोधपुर के कबीर नगर कमर्शियल स्कीम में प्लॉटों के आवंटन और कब्जे को लेकर चल रहे विवाद में नगर निगम के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है।
हाईकोर्ट ने कहा कि अतिक्रमण हटाने के नाम पर की गई निगम की जांच महज खानापूर्ति नजर आती है और संबंधित लोगों की आपत्तियों पर भी ठीक से विचार नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने जोधपुर नगर निगम को चार सप्ताह के अंदर एक कमेटी बनाने का निर्देश दिया है।
कमेटी प्रभावित लोगों के दावों और आपत्तियों की जांच करेगी और सभी पक्षों को अपनी बात रखने का मौका देगी।
हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी संस्था की कार्रवाई ऐसी होनी चाहिए जिससे लोगों में भरोसा पैदा हो।
उसकी लापरवाही या रिकॉर्ड की कमी के कारण लोगों को अपने अधिकार के लिए बार-बार कोर्ट का रुख न करना पड़े।
जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकलपीठ ने तीन जुड़ी हुई याचिकाओं पर साझा आदेश दिया।
हाईकोर्ट ने कमेटी बनाने के लिए चार सप्ताह और पूरी प्रक्रिया को तीन महीने में पूरा करने की समय सीमा तय की है।
हाईकोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि प्लॉट के वास्तविक कब्जे और मालिकाना हक को लेकर जो तथ्यात्मक विवाद है, उसका फैसला सीधे रिट याचिका में नहीं किया जा सकता।
लेकिन नगर निगम को अपनी जिम्मेदारी से बचने की भी अनुमति नहीं दी जा सकती।
हाईकोर्ट ने निगम को पूरे मामले को कानून के मुताबिक आगे बढ़ाकर तीन महीने के अंदर आदेश का पालन करने के निर्देश दिए हैं।
15 साल बाद भी नहीं मिला प्लॉट का कब्जा
कबीर नगर कमर्शियल स्कीम के प्लॉट नंबर 7, 8, 9 और 10 को लेकर विवाद हाईकोर्ट पहुंचा है।
मामले में तीन अलग-अलग याचिकाएं दायर की गई थीं, जिनमें किरण, संतोष सिंह और मोहम्मद असलम याचिकाकर्ता हैं।
याचिका में बताया गया कि इन प्लॉटों के आवंटियों को लंबे समय से कब्जा नहीं मिला, जबकि दूसरी ओर कुछ लोग इन पर अपना कब्जा और हक बता रहे हैं।
किरण और संतोष सिंह इन प्लॉटों के मूल आवंटी हैं। किरण को प्लॉट नंबर 8 और संतोष सिंह को प्लॉट नंबर 10 आवंटित हुआ था।
दोनों का कहना है कि उन्होंने साल 2011 में पूरी रकम जमा कर दी थी और उनके नाम पट्टा भी जारी हो चुका था।
इसके बावजूद 15 साल से ज्यादा समय बाद भी उन्हें कब्जा नहीं मिला।
वहीं मोहम्मद असलम प्लॉट नंबर 7 के खरीदार हैं। यह प्लॉट पहले उषा शारदा को आवंटित हुआ था।
बाद में उषा शारदा ने इसे असलम को बेच दिया और उनके पक्ष में ट्रांसफर सर्टिफिकेट भी जारी हुआ।
निगम ने बाद में असलम पर प्लॉट नंबर 10 पर कब्जे का आरोप लगाया।
दूसरी ओर, जगमल सिंह और उमराव खान ने भी इन प्लॉटों पर अपना हक बताया।
जगमल सिंह का कहना है कि सड़क निर्माण के कारण उनकी पुरानी जमीन से हटाने के बाद पुनर्वास योजना में उन्हें प्लॉट दिया गया था।
उमराव खान ने भी बताया कि सड़क निर्माण के कारण उन्हें दूसरी जगह से हटाकर 1996 में यहां बसाया गया था।
यही वजह है कि प्लॉटों के आवंटन, कब्जे और असली हकदार को लेकर विवाद खड़ा हुआ और मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
कब्जे को लेकर दो अलग दावे
मामला सिर्फ आवंटियों और नगर निगम के बीच नहीं था। जगमल सिंह और उमराव खान ने भी इन प्लॉटों पर अपना अधिकार बताया।
जगमल सिंह का कहना था कि उन्हें साल 1999 में कच्ची बस्ती में प्लॉट आवंटित किया गया था। बाद में वहां सड़क बनने के कारण पुनर्वास योजना के तहत उन्हें 20 गुणा 40 फीट का प्लॉट दिया गया।
उमराव खान ने भी बताया कि सड़क निर्माण के कारण उन्हें दूसरी जगह से हटाकर साल 1996 में यहां बसाया गया था।
उनका कहना था कि तब से वह वहां शांतिपूर्वक रह रहे हैं।
दोनों ने निगम की उस रिपोर्ट पर भी सवाल उठाया, जिसमें उन्हें अतिक्रमणकारी बताया गया था।
उनका कहना था कि उनके पास नगर निगम की ओर से दिए गए दस्तावेज मौजूद हैं।
निगम की जांच पर हाईकोर्ट नाराज
दरअसल मामले की स्थिति साफ करने के लिए नगर निगम ने प्लॉट नंबर 7 से 10 का सर्वे कराया था। इसके बाद संयुक्त कमेटी ने 10 जुलाई 2026 को अपनी रिपोर्ट दी।
नगर निगम के मुताबिक, उमराव खान को प्लॉट नंबर 7 और 8 पर अनधिकृत कब्जे में बताया गया, जबकि जगमल सिंह को प्लॉट नंबर 9 और मोहम्मद असलम को प्लॉट नंबर 10 पर कब्जेदार बताया गया।
इसके बाद निगम ने 15 जुलाई 2026 को कथित अतिक्रमण हटाने के लिए नोटिस जारी किए थे।
लेकिन जिन लोगों को निगम ने कब्जेदार या अतिक्रमणकारी बताया, उनका पक्ष अलग था।
लेकिन हाईकोर्ट ने इस पूरी जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए।
हाईकोर्ट ने कहा कि 10 जुलाई की संयुक्त कमेटी की रिपोर्ट और उसके आधार पर 15 जुलाई को जारी किए गए नोटिस महज खानापूर्ति जैसे नजर आते हैं।
हाईकोर्ट ने पाया कि उमराव खान, जगमल सिंह और मोहम्मद असलम की ओर से दिए गए जवाब और आपत्तियों पर ठीक से विचार नहीं किया गया।
इतना ही नहीं, कोर्ट ने कहा कि नगर निगम ने अपने ही रिकॉर्ड को भी आदेश जारी करने से पहले ठीक तरीके से नहीं देखा।
हाईकोर्ट ने दिया कमेटी बनाने का निर्देश
हाईकोर्ट ने अब इस विवाद को नए सिरे से देखने के लिए कमेटी बनाने का निर्देश दिया है।
कमेटी में स्थानीय स्वशासन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, जोधपुर के जिला कलेक्टर और जोधपुर नगर निगम के आयुक्त शामिल होंगे।
कमेटी बनने के बाद याचिकाकर्ताओं और अन्य संबंधित लोगों को अपने अधिकार और प्लॉट पर दावे से जुड़े दस्तावेज और आपत्तियां देने के लिए 15 दिन का समय मिलेगा।
इसके बाद कमेटी सभी पक्षों को सुनवाई का मौका देगी और हर मामले में अलग-अलग कारण बताते हुए आदेश जारी करेगी।
हक साबित हुआ तो मुआवजा या दूसरा प्लॉट
अगर कमेटी के सामने किसी व्यक्ति का वैध हक दस्तावेजों से साबित होता है और उसकी जमीन संबंधित आवंटी को देना जरूरी पाया जाता है तो उसे मौजूदा डीएलसी दरों के मुताबिक उचित मुआवजा देना होगा।
वहीं अगर किसी वजह से मूल प्लॉट का कब्जा आवंटी को नहीं दिया जा सकता तो उसी योजना में समान आकार का दूसरा प्लॉट देने का विकल्प रखा गया है।
अगर किसी संबंधित व्यक्ति की ओर से कोई आपत्ति नहीं आती है तो नगर निगम कानून के मुताबिक आगे की कार्रवाई कर सकेगा।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि कमेटी या नगर निगम के फैसले से कोई व्यक्ति संतुष्ट नहीं है तो वह कानून के मुताबिक उचित मंच पर अपनी शिकायत रख सकता है।
सरकारी रिकॉर्ड की कमी पर हाईकोर्ट शख्त
हाईकोर्ट ने कहा कि नगर निगम सरकारी संस्था है और उसे अपने कामकाज में निष्पक्षता और जिम्मेदारी दिखानी चाहिए।
हाईकोर्ट के मुताबिक, सरकारी संस्था की कार्रवाई से लोगों में भरोसा और सुरक्षा की भावना पैदा होनी चाहिए।
ऐसा नहीं होना चाहिए कि सरकारी रिकॉर्ड ठीक से नहीं रखा गया और उसकी लापरवाही का नुकसान आम लोगों को उठाना पड़े।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले उसे उचित नोटिस और अपनी बात रखने का मौका देना जरूरी है।
बिना कानूनी प्रक्रिया पूरी किए किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से हटाया नहीं जा सकता।
हाईकोर्ट ने संपत्ति के अधिकार के संदर्भ में संविधान के अनुच्छेद 300-ए का भी जिक्र किया।
इसके तहत किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से कानून में तय प्रक्रिया के बिना वंचित नहीं किया जा सकता।
साथ ही हाईकोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक जमीन से अतिक्रमण हटाना कानून के मुताबिक जरूरी हो सकता है, लेकिन इसके लिए भी नोटिस और सुनवाई जैसी प्रक्रिया का पालन करना होगा।
तीन महीने में पूरी करनी होगी प्रक्रिया
हाईकोर्ट ने साफ कहा कि कबीर नगर के प्लॉटों का विवाद अब अनिश्चित समय तक लंबित नहीं रखा जा सकता।
नगर निगम को कमेटी बनाने से लेकर लोगों के दावों और आपत्तियों पर फैसला करने तक की पूरी प्रक्रिया तीन महीने के अंदर पूरी करनी होगी।
इसके बाद ही साफ होगा कि किसका दावा सही है, किसे मूल प्लॉट का कब्जा मिलेगा और किस मामले में मुआवजा या वैकल्पिक प्लॉट देना होगा।
साथ ही, अगर किसी जमीन पर वास्तव में अवैध कब्जा है तो उसे हटाया जा सकता है, लेकिन पहले दावेदार की बात सुननी होगी, उसके दस्तावेज देखने होंगे और कानून के मुताबिक फैसला लेना होगा।
यही वजह है कि हाईकोर्ट ने सीधे किसी एक पक्ष को सही या गलत घोषित करने के बजाय अब पूरी जांच एक उच्चस्तरीय कमेटी के जरिए कराने का रास्ता चुना है।