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“20 साल बाद नहीं मिलेगी नौकरी” राजस्थान हाईकोर्ट ने लोक जंबिश परियोजना से जुड़े 748 कर्मचारियों की उम्मीदों पर लगाया पूर्ण विराम

“No Jobs After 20 Years: Rajasthan High Court Dismisses Contempt Pleas of 748 Lok Jumbish Employees”
अवमानना याचिकाएं खारिज, कोर्ट ने कहा-अब नौकरी देना असंभव; नीतिगत बदलाव और पद समाप्त होने का दिया हवाला

जोधपुर। 20 साल से नौकरी का इंतजार कर रहे लोक जंबिश परियोजना से जुड़े 748 कर्मचारियों को राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा झटका लगा है।

राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद इन कर्मचारियों को 20 साल तक नौकरी नहीं मिली, लेकिन इन कर्मचारियों की लंबे समय से चल रही कानूनी लड़ाई पर भी हाईकोर्ट ने विराम लगा दिया है।

हाईकोर्ट के आदेशों की पालना नहीं करने पर इन सभी कर्मचारियों ने अवमानना याचिकाएं दायर की थीं।

अब नौकरी देना असंभव

राजस्थान हाईकोर्ट ने अवमानना याचिकाओं को खारिज करते हुए साफ कर दिया है कि इन कर्मचारियों को अब नौकरी नहीं दी जा सकती।

कर्मचारियों के आरोप को भी राजस्थान हाईकोर्ट ने मानने से इनकार कर दिया कि सरकार ने जानबूझकर कोर्ट के आदेशों की अवहेलना करते हुए नौकरी नहीं दी है।

हाईकोर्ट ने साफ कहा कि सरकार द्वारा आदेश की जानबूझकर अवहेलना (wilful disobedience) नहीं की गई है, बल्कि बाद में हुए नीतिगत बदलाव और पदों के समाप्त होने के कारण आदेश लागू करना संभव नहीं रहा।

जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए यह फैसला अरुण जैन व अन्य 748 कर्मचारियों की ओर से दायर अवमानना याचिकाओं पर दिया है।

लोक जंबिश प्रोजेक्ट की समाप्ति और विवाद की शुरुआत

देश में लोक जंबिश प्रोजेक्ट की शुरुआत 1980 के दशक में की गई थी। राजस्थान में यह परियोजना स्वीडिश अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेंसी (एसआईडीए) की सहायता से प्रारंभ की गई, जिसका उद्देश्य सबको शिक्षा के अवसर उपलब्ध करवाना था। लोक जंबिश को बेहद सफल और नवाचारी प्रोजेक्ट के रूप में जाना जाता है।

राजस्थान में कर्मचारियों की नियुक्ति

इस परियोजना में वर्ष 1992–1998 के दौरान 948 कर्मचारियों को सीधे नियुक्त किया गया।

परियोजना के विस्तार के लिए वर्ष 2001 में 748 कर्मचारियों की भर्ती इंटरव्यू के जरिए हुई।

परमाणु परीक्षण के बाद बदले हालात

देश में पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद से स्वीडन से मिलने वाला फंड बंद हो गया, जिसके साथ परियोजना ने भी समाप्ति की राह पकड़ ली।

वर्ष 2004 में लोक जंबिश परियोजना को पूर्ण रूप से बंद कर दिया गया और सर्व शिक्षा अभियान लागू किया गया।

सरकार ने इसके साथ राजस्थान में इस योजना में वर्ष 1992 से 1998 के बीच नियुक्त 948 कर्मचारियों को बाद में सर्व शिक्षा अभियान (SSA) में समाहित कर लिया।

लेकिन वर्ष 2001 में इंटरव्यू से नियुक्त हुए 748 कर्मचारियों को बाहर कर दिया गया और समायोजन नहीं किया गया।

इस भेदभाव के खिलाफ कर्मचारियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

2007 में हाईकोर्ट का आदेश

लोक जंबिश परियोजना में 2001 में नियुक्त हुए 748 कर्मचारियों ने सरकार के फैसले के खिलाफ राजस्थान हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर कीं।

राजस्थान हाईकोर्ट की एकलपीठ ने लंबी सुनवाई के बाद वर्ष 2007 में 748 कर्मचारियों के पक्ष में फैसला देते हुए कहा कि सरकार 948 कर्मचारियों के समान इन्हें भी नियुक्ति दे।

आदेश के खिलाफ चुनौती और शर्त

राजस्थान हाईकोर्ट की एकलपीठ के नौकरी देने के फैसले के खिलाफ राजस्थान सरकार ने वर्ष 2008 में खंडपीठ के समक्ष अपील दायर कर दी।

करीब 10 साल तक चली सुनवाई के बाद राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने वर्ष 2018 में अपना फैसला सुनाया।

खंडपीठ ने अपने फैसले में एकलपीठ के फैसले को बरकरार रखते हुए सरकार को आदेश दिया कि वह इन कर्मचारियों को भी नौकरी दे।

लेकिन खंडपीठ ने अपने फैसले में एक महत्वपूर्ण शर्त जोड़ दी कि कर्मचारियों को इस आदेश का लाभ “पद उपलब्ध होने पर ही” मिलेगा।

सुप्रीम कोर्ट में अपील और फैसला

राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ राजस्थान सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2025 में इस फैसले को अंतिम रूप देते हुए खंडपीठ के फैसले पर मुहर लगा दी।

यानी सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की खंडपीठ द्वारा अपीलकर्ता कर्मचारियों के पक्ष में दिए गए नौकरी देने के आदेश को बरकरार रखा।

पालना नहीं इसलिए अवमानना याचिका

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद याचिकाकर्ता कर्मचारियों ने हाईकोर्ट के खंडपीठ के फैसले की पालना को लेकर सरकार को कई बार लिखा।

लेकिन सरकार ने इन कर्मचारियों का समायोजन करने से इनकार कर दिया।

जिसके बाद इन याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर की।

याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि कोर्ट के आदेश के बावजूद उन्हें नौकरी में समायोजित नहीं किया गया, इसलिए अवमानना कार्रवाई की जाए।

याचिका में कर्मचारियों ने दलील दी कि हाईकोर्ट के फैसले के अनुसार उन्हें भी 948 कर्मचारियों के बराबर अधिकार दिया जाए, क्योंकि अब भी कई पद खाली हैं।

याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट में कहा कि सरकार उन पदों पर अन्य लोगों को लगा रही है।

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि वे बिना बैक वेज के भी काम करने को तैयार हैं।

सरकार का जवाब

अवमानना याचिका के जवाब में राज्य सरकार ने कोर्ट में दलील दी कि 2018 में शिक्षा विभाग का पुनर्गठन किया गया और अधिकांश संविदात्मक पद समाप्त कर दिए गए।

सरकार ने हाईकोर्ट में कहा कि अब नियुक्तियां केवल नियमित भर्ती या प्रतिनियुक्ति से ही होती हैं।

सरकार ने यह भी कहा कि जिन पदों पर कर्मचारी काम करते थे, वे अब अस्तित्व में ही नहीं हैं।

हाईकोर्ट का फैसला

दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद हाईकोर्ट ने सरकार की दलीलों से सहमत होते हुए कहा कि “पद उपलब्ध होना” सिर्फ औपचारिक शर्त नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि “पद का मतलब सिर्फ खाली पद नहीं, बल्कि ऐसा पद जो कानूनी रूप से मौजूद हो और भरा जा सके।”

20 साल बाद नियुक्ति देना अव्यवहारिक— कोर्ट ने कहा कि “दो दशक बाद नियुक्ति देना न सिर्फ अव्यवहारिक है, बल्कि सेवा नियमों के भी खिलाफ होगा।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि संविदा नौकरी से स्थायी अधिकार नहीं बनता। कुछ महीनों या सीमित अवधि की संविदात्मक सेवा से स्थायी नियुक्ति का अधिकार नहीं बनता।

हाईकोर्ट ने कहा कि 948 कर्मचारियों को बनाए रखना एक विशेष नीतिगत निर्णय था, इसे स्थायी समानता का आधार नहीं बनाया जा सकता।

हाईकोर्ट ने सरकार की इस दलील को भी मंजूर कर लिया कि “2018 की नीति के बाद संविदात्मक पद लगभग समाप्त हो गए, ऐसे में पुराने आदेश लागू नहीं किए जा सकते।” कोर्ट ने कहा यह एक नीतिगत मामला है।

हाईकोर्ट ने इन सभी तथ्यों के आधार पर कहा कि यह अवमानना का मामला नहीं बनता।

कोर्ट ने कहा, “रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि सरकार ने जानबूझकर आदेश का उल्लंघन नहीं किया।”

अंतिम फैसला

राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में 748 कर्मचारियों की ओर से दायर अवमानना याचिकाओं को खारिज करते हुए पूर्व में जारी सभी नोटिस समाप्त करने का फैसला सुनाया।

इसके साथ ही सरकारी अधिकारियों की माफी को स्वीकार किया और सभी अधिकारियों को अवमानना से मुक्त कर दिया।

लेकिन इस मामले में हाईकोर्ट ने कर्मचारियों को यह छूट दी कि वे वर्ष 2018 की नीति को चुनौती दे सकते हैं और नए सिरे से कानूनी लड़ाई लड़ सकते हैं।

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