हाईकोर्ट की दो टूक-केवल बाद में हस्ताक्षर से इनकार या गलतफहमी के आधार पर दावा पर्याप्त नहीं, राजस्व अधिकारियों की जांच में धोखाधड़ी, दबाव या प्रक्रिया संबंधी अवैधता पाया जाना आवश्यक
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने कृषि भूमि से जुड़े एक अहम विवाद में रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि किसी पक्षकार ने मुकदमा वापस लेने के आवेदन पर हस्ताक्षर किए हैं और सक्षम राजस्व अधिकारियों ने रिकॉर्ड की जांच के बाद वापसी को स्वैच्छिक माना है, तो बाद में केवल विवादित तथ्यों के आधार पर उस वापसी को चुनौती नहीं दी जा सकती।
जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस प्रवीर भटनागर की खंडपीठ ने नरबदा बाई के वारिसों की ओर से दायर डीबी स्पेशल अपील को खारिज करते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर धोखाधड़ी, दबाव अथवा किसी प्रक्रियात्मक अवैधता का प्रमाण नहीं है, ऐसे में निचली राजस्व अदालतों और एकलपीठ के आदेशों में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मुकदमा वापस लेने की कार्रवाई को बाद में चुनौती देने के लिए महज यह कहना कि हस्ताक्षर गलत जानकारी देकर करवाए गए थे या वापसी स्वेच्छा से नहीं की गई, अपने आप में पर्याप्त नहीं है।
पैतृक कृषि भूमि में हिस्से को लेकर शुरू हुआ था विवाद
मामला चित्तौड़गढ़ जिले के निम्बाहेड़ा क्षेत्र की खाता संख्या 472 तथा आराजी संख्या 1422 और 1431 की कृषि भूमि से संबंधित है।
अपीलकर्ताओं का कहना था कि विवादित भूमि मूल रूप से हीरालाल की थी।
हीरालाल की मृत्यु के बाद उनके तीन पुत्रों-बालूराम, नारायण लाल और घीसूलाल—के साथ पुत्री नरबदा बाई का भी भूमि में अधिकार था।
आरोप था कि राजस्व रिकॉर्ड में केवल पुत्रों के नाम म्यूटेशन किया गया और नरबदा बाई को कथित वैधानिक हिस्सा नहीं मिला।
अपने अधिकारों के लिए नरबदा बाई ने राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 की धाराओं 53, 88 और 188 के तहत Revenue Suit No.102/2019 दायर किया था।
इसमें अपने अधिकार की घोषणा, भूमि के बंटवारे और स्थायी निषेधाज्ञा की मांग की गई थी।
इसी भूमि को लेकर Revenue Suit No.128/2010 भी पहले से लंबित था।
इस मुकदमे में विवादित भूमि खरीदने का दावा करने वाले पक्षकारों के पक्ष में 18 अक्टूबर 2016 को फैसला हुआ था। बाद में इस निर्णय को राजस्व अपीलीय प्राधिकरण के समक्ष चुनौती दी गई।
दोनों मुकदमों को किया गया था कंसोलिडेट
20 दिसंबर 2023 को राजस्व अपीलीय प्राधिकरण, चित्तौड़गढ़ ने दोनों मुकदमों को समेकित कर एक साथ सुनवाई के लिए भेजा और सभी पक्षों को सुनने के बाद मामले को नए सिरे से तय करने के लिए रिमांड कर दिया।
इस आदेश को बोर्ड ऑफ रेवेन्यू, अजमेर के समक्ष चुनौती दी गई, लेकिन 17 मार्च 2025 को दूसरी अपील खारिज कर दी गई और रिमांड का आदेश बरकरार रहा।
इसी बीच 22 नवंबर 2023 को नरबदा बाई का निधन हो गया। इसके बाद उनके कानूनी प्रतिनिधियों को रिकॉर्ड पर लिया गया।
यहीं से विवाद ने लिया नया मोड़
नरबदा बाई के वारिसों की ओर से आरोप लगाया गया कि मां की मृत्यु के बाद पारिवारिक मामलों को सुलझाने के नाम पर उनके हस्ताक्षर लिए गए।
बाद में उन्हें पता चला कि उन्हीं हस्ताक्षरों के आधार पर Revenue Suit No.102/2019 वापस लेने का आवेदन पेश कर दिया गया था।
अपीलकर्ताओं का दावा था कि उन्होंने स्वेच्छा से मुकदमा वापस लेने की सहमति नहीं दी थी और उनके हस्ताक्षर कथित तौर पर गलत जानकारी देकर हासिल किए गए।
हालांकि Assistant Collector, Nimbahera ने 18 दिसंबर 2023 को मुकदमा वापस लेने का आवेदन स्वीकार कर लिया और Revenue Suit No.102/2019 को withdrawn मानते हुए समाप्त कर दिया।
इस आदेश को राजस्व अपीलीय प्राधिकरण और फिर बोर्ड ऑफ रेवेन्यू के समक्ष चुनौती दी गई, लेकिन दोनों स्तरों पर राहत नहीं मिली।
इसके बाद मामला राजस्थान हाईकोर्ट की एकलपीठ के सामने पहुंचा। 6 जुलाई 2026 को एकलपीठ ने भी राजस्व अधिकारियों के आदेशों को बरकरार रखा। इसी फैसले के खिलाफ वर्तमान डीबी स्पेशल अपील दायर की गई।
अपीलकर्ताओं ने उठाया प्राकृतिक न्याय का सवाल
अपीलकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि मुकदमा वापस लेने से पहले राजस्व अधिकारी को यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि वापसी वास्तव में स्वतंत्र और स्वैच्छिक इच्छा से की जा रही है।
यह भी तर्क दिया गया कि संबंधित पक्षकार का बयान दर्ज नहीं किया गया और न ही यह जांच की गई कि आवेदन पर हस्ताक्षर किन परिस्थितियों में किए गए थे।
अपीलकर्ताओं ने कहा कि जब किसी व्यक्ति के महत्वपूर्ण संपत्ति अधिकार प्रभावित हो रहे हों, तो केवल हस्ताक्षर के आधार पर मुकदमा वापस लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
दूसरी ओर, प्रतिवादी पक्ष ने अदालत को बताया कि अपीलकर्ता ने स्वयं समझौते और मुकदमा वापस लेने के आवेदन पर हस्ताक्षर किए थे। बाद में गलतफहमी के कारण इस कार्रवाई को चुनौती दी गई।
प्रतिवादियों ने अपने पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के Kartar Singh v. B.O.R. & Ors. के फैसले का भी हवाला दिया।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड खंगाला, आरोपों को नहीं माना पर्याप्त
खंडपीठ ने रिकॉर्ड का विस्तृत परीक्षण करने के बाद अपीलकर्ताओं के आरोपों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने पाया कि मुकदमा वापस लेने से जुड़े आरोप मुख्य रूप से विवादित तथ्यों पर आधारित हैं और इन तथ्यों की जांच संबंधित राजस्व अधिकारियों द्वारा पहले ही की जा चुकी है।
हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस material सामने नहीं आया, जिससे धोखाधड़ी, दबाव या प्रक्रिया संबंधी अवैधता साबित हो सके। राजस्व अधिकारियों ने उपलब्ध सामग्री के आधार पर मुकदमा वापस लेने की कार्रवाई को स्वैच्छिक माना था।
“बाद में हस्ताक्षर से इनकार पर्याप्त नहीं”
खंडपीठ ने इस बात को भी महत्वपूर्ण माना कि कानूनी प्रतिनिधि के रूप में रिकॉर्ड पर आने के बाद अपीलकर्ता ने तत्काल अपने हस्ताक्षरों अथवा संबंधित कार्रवाई को उस आधार पर चुनौती नहीं दी, जिस आधार पर बाद में विवाद खड़ा किया गया।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि S.B. Civil Writ Petition No.20763/2025 को भी चुनौती नहीं दी गई थी, जिसे प्रतिवादियों के साथ समझौते के आधार पर खारिज किया गया था।
हाईकोर्ट के अनुसार यह परिस्थिति इस ओर संकेत करती है कि अपीलकर्ता विवादित संपत्ति से संबंधित समझौते से अवगत था और मुकदमा वापस लेने की कार्रवाई से भी परिचित था।
सुप्रीम कोर्ट के Kartar Singh फैसला
खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के Kartar Singh v. B.O.R. & Ors में निर्धारित सिद्धांत को आधार बनाते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के उस निर्णय में यह सिद्धांत सामने आया था कि यदि रिकॉर्ड की परिस्थितियां यह दर्शाती हैं कि वादी ने मुकदमा वापस लेने के लिए सचेत रूप से आवेदन किया था और आवेदन पर उसके हस्ताक्षर थे तथा वह विधिवत प्रस्तुत किया गया था, तो बाद में इसके विपरीत कोई अलग कहानी पेश कर मुकदमा वापस लेने की कार्रवाई को चुनौती देना स्वीकार्य नहीं हो सकता।
राजस्थान हाईकोर्ट ने माना कि वर्तमान मामले में भी अपीलकर्ताओं द्वारा मुकदमा वापसी की स्वैच्छिकता पर उठाए गए सवाल रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से प्रमाणित नहीं होते।
समझौता डिक्री में भी नहीं हस्तक्षेप का आधार
मामले में 28 अगस्त 2025 को पारित compromise decree को भी चुनौती दी गई थी। अपीलकर्ताओं का कहना था कि समझौते में उनकी सहमति नहीं थी और इससे उनके संपत्ति अधिकार प्रभावित हुए।
लेकिन हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की समीक्षा के बाद कहा कि compromise decree में ऐसा कोई jurisdictional error, perversity या principles of natural justice का violation सामने नहीं आया, जिसके आधार पर संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट हस्तक्षेप कर सके।
“हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं”-अपील खारिज
खंडपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि मुकदमा वापस लेने की कार्रवाई को बरकरार रखने वाले राजस्व अधिकारियों के आदेशों तथा 28 अगस्त 2025 की compromise decree में ऐसा कोई कानूनी दोष नहीं है, जो हाईकोर्ट के हस्तक्षेप को उचित ठहराए।
इसी आधार पर जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस प्रवीर भटनागर की खंडपीठ ने डीबी स्पेशल अपील को मेरिट से रहित मानते हुए खारिज कर दिया।