सोलर पॉलिसी 2019 पर राज्य सरकार को हाईकोर्ट से झटका, बिजली शुल्क छूट मामले में कंपनियों को मिली बड़ी राहत
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य की सोलर नीति से जुड़े एक मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि सरकार अपने द्वारा किए गए वादों से पीछे नहीं हट सकती, खासकर तब जब उन वादों के आधार पर उद्योगों ने करोड़ों रुपये का निवेश किया हो।
राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य में निवेश करने वाले निवेशकों के पक्ष में फैसला देते हुए स्पष्ट कहा है कि सरकारें निवेश आकर्षित करने के लिए किए गए वादों से पीछे नहीं हट सकतीं।
हाईकोर्ट ने कहा कि जिन नीतियों पर निवेश लिया जाता है, वे नीतियां केवल कागज़ी नहीं, बल्कि कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी होती हैं। कोर्ट ने साफ कहा कि निवेशकों का भरोसा सर्वोपरि है।
हाईकोर्ट का यह फैसला न केवल ऊर्जा क्षेत्र बल्कि राज्य में उद्यमियों द्वारा किए जाने वाले निवेश के वातावरण के लिए सकारात्मक माना जा रहा है, बल्कि आने वाले समय में न केवल राजस्थान बल्कि पूरे देश में निवेश और नीति निर्माण के तरीके को प्रभावित कर सकता है।
मामला M/s UltraTech Cement Ltd. से जुड़ा है। याचिका में कंपनी ने सोलर पॉलिसी 2019 के तहत बिजली शुल्क (Electricity Duty) में मिली छूट के वादे से सरकार द्वारा मुकरने पर अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
क्या था पूरा मामला?
राजस्थान सरकार ने वर्ष 2019 में सोलर एनर्जी को बढ़ावा देने के लिए Solar Policy 2019 लागू की थी।
इस नीति के तहत यह स्पष्ट वादा किया गया था कि सोलर पावर प्लांट स्थापित करने वाले उद्योगों को 7 वर्षों तक बिजली शुल्क से छूट (Electricity Duty Exemption) दी जाएगी।
इस नीति पर भरोसा करते हुए UltraTech Cement ने राजस्थान में अपने दो प्लांट्स के लिए करीब ₹89 करोड़ का निवेश कर सोलर पावर प्रोजेक्ट स्थापित किए।
लेकिन बाद में राज्य सरकार ने 10 मई 2022 को नीति में संशोधन कर इस छूट को वापस ले लिया और कंपनियों पर बिजली शुल्क लगाना शुरू कर दिया।
कंपनी की दलील: “सरकार ने वादा तोड़ा”
UltraTech Cement की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने कोर्ट में तर्क दिया कि सरकार ने स्पष्ट रूप से 7 साल तक छूट देने का वादा किया था और कंपनी ने उसी भरोसे पर भारी निवेश किया।
निवेश करने के बाद छूट वापस लेना Promissory Estoppel (वादे से बंधन) के सिद्धांत का उल्लंघन है और यह कदम निवेशकों के साथ अन्याय और मनमाना है।
कंपनी ने यह भी कहा कि यह मामला केवल टैक्स या छूट का नहीं, बल्कि सरकारी विश्वसनीयता (credibility) का है।
सरकार का पक्ष: “नीति बदली जा सकती है”
राज्य सरकार ने अपने बचाव में कहा कि सोलर पॉलिसी केवल एक एक्जीक्यूटिव पॉलिसी (नीतिगत निर्णय) है, कानून नहीं।
सरकार ने कहा कि बिजली शुल्क (Electricity Duty) केवल राजस्थान बिजली शुल्क अधिनियम, 1962 के तहत ही तय होता है और सरकार को आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार नीति बदलने का अधिकार है।
सरकार ने कहा कि वित्तीय बोझ के कारण छूट वापस लेना जरूरी था।
हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।
सरकार अपने वादों से बंधी है
हाईकोर्ट ने कहा कि जब सरकार कोई स्पष्ट और ठोस आश्वासन देती है और उस पर निवेशक भरोसा कर निवेश करता है, तो सरकार उस वादे से पीछे नहीं हट सकती।
Promissory Estoppel लागू होगा
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला Promissory Estoppel का है—यानी सरकार अपने किए गए वादे से मुकर नहीं सकती, जब उससे किसी को नुकसान हो।
नीति केवल कागज़ी नहीं, भरोसे का आधार
कोर्ट ने कहा कि सोलर पॉलिसी 2019 कोई सामान्य दिशा-निर्देश नहीं था, बल्कि यह एक स्पष्ट और ठोस वित्तीय आश्वासन था, जिसका उद्देश्य निवेश आकर्षित करना था।
निवेशकों के भरोसे से खिलवाड़ नहीं
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यदि सरकार निवेश आकर्षित करने के लिए वादे करे और बाद में उन्हें तोड़ दे, तो इससे निवेश का माहौल खराब होगा और यह Rule of Law के खिलाफ है।
कोर्ट ने क्या कहा कानून पर?
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि Promissory Estoppel और Legitimate Expectation जैसे सिद्धांत न्याय और निष्पक्षता के मूल तत्व हैं और सरकार इन सिद्धांतों से बच नहीं सकती। केवल “वित्तीय संकट” का हवाला देकर वादा तोड़ना पर्याप्त कारण नहीं है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार अपनी ही गलती (जैसे नोटिफिकेशन जारी न करना) का फायदा उठाकर वादे से पीछे नहीं हट सकती।
सरकार ऐसा नहीं कर सकती
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य का यह तर्क कि छूट केवल वैधानिक अधिसूचना के माध्यम से ही दी जा सकती है, इस मामले के विशेष तथ्यों में याचिकाकर्ताओं के दावे को खारिज नहीं करता।
कोर्ट ने कहा कि राजस्थान विद्युत शुल्क अधिनियम, 1962 निस्संदेह छूट देने की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है; परंतु यह अधिनियम ऐसी छूट देने की अनुमति भी देता है।
कोर्ट ने कहा कि नीति (Policy) ने प्रभावी रूप से यह दर्शाया कि यह वैधानिक शक्ति पात्र परियोजनाओं के पक्ष में उपयोग की जाएगी। अब राज्य को यह अनुमति नहीं दी जा सकती कि वह अधिसूचना जारी न करने की अपनी ही विफलता का सहारा लेकर अपने वादे से मुकर जाए।
कोर्ट ने कहा कि यदि ऐसा स्वीकार किया जाए, तो सभी नीति आश्वासन (policy assurances) निरर्थक हो जाएंगे, और राज्य निवेश आकर्षित करने के लिए वादे करेगा लेकिन बाद में उन्हें पूरा करने से बच जाएगा।
ऐसी स्थिति विधि के शासन (Rule of Law) के विपरीत होगी और “प्रॉमिसरी एसटॉपल” (Promissory Estoppel) के सिद्धांत को निष्प्रभावी बना देगी।
हाईकोर्ट ने कहा कि
यह स्थापित सिद्धांत है कि सरकार द्वारा किए गए वादे, भले ही वे कानून द्वारा समर्थित न हों, यदि उन पर भरोसा करके किसी पक्ष ने नुकसान उठाया हो, तो उन्हें लागू किया जा सकता है – जब तक कि कोई अत्यधिक सार्वजनिक हित (overriding public interest) उनके वापस लेने को उचित न ठहराए।
हाईकोर्ट ने कहा
केवल यह कहना कि वित्तीय भार है या आर्थिक नीति के कारण यह निर्णय लिया गया है, बिना किसी ठोस सामग्री (substantive material) के, याचिकाकर्ताओं के अधिकारों और उनकी वैध अपेक्षाओं (legitimate expectations) को समाप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को छूट दी हैं कि वे हाईकोर्ट के फैसले के संबंध में सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अपना व्यक्तिगत प्रतिवेदन (representations) पेश कर सकते हैं.
हाईकोर्ट ने सक्षम प्राधिकारी को आदेश दिया हैं कि वह प्रत्येक प्रतिवेदन का स्वतंत्र रूप से परीक्षण करेगा और यह सत्यापित करेगा कि प्रत्येक परियोजना के रूफटॉप पीवी सोलर प्लांट के संचालन (operational) होने की सटीक तिथि क्या है, तथा क्या वह तिथि नीति संशोधन (policy amendment) से पूर्व की है।
सत्यापन के बाद, प्रत्येक दावे पर कारणयुक्त (reasoned) एवं स्वतंत्र आदेश पारित करना होगा.
कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि बिजली शुल्क से छूट केवल उस तिथि से सात वर्ष की अवधि तक सीमित रहेगी, जिस दिन संबंधित रूफटॉप पीवी सोलर प्लांट संचालन में आया था।
