नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान एक अहम संवैधानिक सवाल उठाते हुए पूछा है कि क्या किसी भक्त को केवल उसके जन्म या वंश के आधार पर भगवान को छूने से रोका जा सकता है, और ऐसी स्थिति में क्या संविधान उसकी रक्षा के लिए आगे नहीं आएगा?
यह टिप्पणी उस समय आई जब कोर्ट महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक प्रथाओं में भेदभाव से जुड़े व्यापक मुद्दों पर सुनवाई कर रहा था।
संविधान बनाम परंपरा पर सीधा सवाल
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ-जजों की संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है। पीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में यह देखना होगा कि क्या संविधान उस व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करेगा जिसे भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने बेहद महत्वपूर्ण सवाल उठाया।
जस्टिस अमानुल्लाह ने टिप्पणी करते हुए कहा-
“जब मैं मंदिर जाता हूं, तो मेरा विश्वास होता है कि ईश्वर मेरा निर्माता है, लेकिन अगर मुझे मेरे जन्म या वंश के आधार पर देवता को छूने से रोका जाता है, तो क्या ऐसी स्थिति में संविधान मेरी रक्षा नहीं करेगा?”
उन्होंने आगे कहा-
“कानून की नजर में ‘निर्माता’ और ‘निर्माण’ (ईश्वर और भक्त) के बीच कोई भेद नहीं हो सकता।”
मंदिर परंपराओं का पक्ष क्या है?
मंदिर के मुख्य पुजारी (तंत्री) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता वी. गिरी ने दलील दी कि मंदिरों की परंपराएं और रीति-रिवाज उस धर्म का अभिन्न हिस्सा होते हैं।
उन्होंने Article 25 of Indian Constitution का हवाला देते हुए कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देवता की प्रकृति के अनुरूप ही लागू होता है।
सबरीमाला मंदिर के संदर्भ में उन्होंने कहा कि भगवान अयप्पा ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ माने जाते हैं, इसलिए वहां की परंपराएं उसी आधार पर तय की गई हैं।
पुजारी नियुक्ति और सुधार की गुंजाइश
बहस के दौरान यह भी कहा गया कि यदि किसी व्यक्ति को केवल जन्म के आधार पर पुजारी बनने या सेवा करने से पूरी तरह रोका जाता है, तो राज्य Article 25(2)(b) of Indian Constitution के तहत कानून बनाकर इसमें सुधार कर सकता है।
क्या है पूरा विवाद
सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लंबे समय से प्रतिबंध रहा है, जिसे चुनौती देते हुए याचिकाएं दाखिल की गई थीं। मामला इस बात पर केंद्रित है कि क्या ऐसी धार्मिक प्रथाएं मौलिक अधिकारों, विशेष रूप से समानता और गरिमा के अधिकार, का उल्लंघन करती हैं।
लैंडमार्क जजमेंट का हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के ऐतिहासिक Indian Young Lawyers Association vs State of Kerala फैसले का संदर्भ लिया, जिसमें 5-जजों की पीठ ने सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को असंवैधानिक करार दिया था। कोर्ट ने तब कहा था कि यह प्रथा महिलाओं के समानता और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करती है।
हालांकि, 2019 में तत्कालीन CJI रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस फैसले की समीक्षा के दौरान व्यापक संवैधानिक सवालों को देखते हुए मामले को 9-जजों की बड़ी संविधान पीठ को सौंप दिया। इसमें यह तय किया जाना है कि धार्मिक प्रथाओं की न्यायिक समीक्षा की सीमा क्या होगी और क्या “essential religious practices” के नाम पर मौलिक अधिकारों को सीमित किया जा सकता है।
न्यायिक कसौटी पर धार्मिक प्रथाएं
सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा सुनवाई ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि क्या धार्मिक परंपराएं मौलिक अधिकारों से ऊपर हो सकती हैं।
कोर्ट ने संकेत दिया है कि जजों को व्यक्तिगत आस्था से ऊपर उठकर संविधान और विवेक की स्वतंत्रता के आधार पर निर्णय लेना होगा।
यह मामला अब केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देशभर में धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के बीच संतुलन को लेकर एक बड़ा संवैधानिक विमर्श बन चुका है।