नई दिल्ली। मध्यस्थता कानून से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जोधपुर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (JVVNL) की याचिका पर नोटिस जारी किया है।
मामला राजस्थान में ई-मित्र केंद्रों के माध्यम से बिजली बिल जमा कराने में हुए घोटाले से जुड़ा हैं जिसमें अक्ष ऑप्टिफाइबर लिमिटेड कंपनी को सरकार ने जिम्मेदार माना था
सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह है कि यदि किसी विवाद को लेकर पहले मध्यस्थता की कार्यवाही हो चुकी हो, उस पर आदेश भी आ चुका हो और उसके खिलाफ दायर याचिका भी खारिज हो चुकी हो, तो क्या उसी विवाद को लेकर दोबारा मध्यस्थता शुरू की जा सकती है?
मामले की सुनवाई जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने करते हुए राज्य सरकार सहित अन्य पक्षकारों को नोटिस जारी किया हैं.
मामले को 21 सितंबर 2026 को सुनवाई के लिए रखा गया है। सुप्रीम कोर्ट में JVVNL की ओर से एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड डॉ. चारु माथुर ने पक्ष रखा।

क्या है पूरा मामला?
विवाद की शुरुआत राजस्थान में ई-मित्र केंद्रों के माध्यम से बिजली बिल जमा कराने में हुए घोटाले से हुई.
1 अप्रैल 2013 को राजस्थान सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी एवं संचार विभाग, जोधपुर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड और अक्ष ऑप्टिफाइबर लिमिटेड के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता एमओयू हुआ था। इसमें विवाद होने पर मध्यस्थता के जरिए समाधान का प्रावधान था।
याचिका के अनुसार, वर्ष 2017-18 में ई-मित्र केंद्रों के माध्यम से बिजली बिलों की वसूली में कथित गबन और धन के दुरुपयोग के मामले सामने आए।
इसके बाद JVVNL ने 24 सितंबर 2019 को अक्ष ऑप्टिफाइबर को नोटिस जारी कर कथित नुकसान की भरपाई की मांग की।
इसी विवाद को लेकर अक्ष ऑप्टिफाइबर ने पहली बार मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू की।
पहली मध्यस्थता में क्या हुआ?
पहली कार्यवाही में एक एकल मध्यस्थ नियुक्त किया गया।
लेकिन 4 जुलाई 2022 को मध्यस्थ ने अक्ष ऑप्टिफाइबर द्वारा शुरू की गई कार्यवाही को चलने योग्य नहीं मानते हुए खारिज कर दिया।
इसके बाद अक्ष ऑप्टिफाइबर ने मध्यस्थ के इस आदेश को मध्यस्थता और सुलह अधिनियम की धारा 34 के तहत चुनौती दी।
लेकिन 4 अक्टूबर 2023 को यह चुनौती भी खारिज हो गई।
यानी पहली मध्यस्थता की कार्यवाही समाप्त हो गई और उसके खिलाफ की गई कानूनी चुनौती भी सफल नहीं हुई।
फिर दोबारा मध्यस्थता की मांग
इसके बावजूद अक्ष ऑप्टिफाइबर ने 10 जून 2024 को फिर से मध्यस्थ नियुक्त करने की मांग करते हुए नोटिस जारी किया।
JVVNL ने 27 जून 2024 को इस मांग को अस्वीकार कर दिया।
इसके बाद अक्ष ऑप्टिफाइबर ने राजस्थान हाईकोर्ट का रुख किया। कंपनी ने मध्यस्थता अधिनियम की धारा 11(6) के तहत आवेदन दायर कर स्वतंत्र मध्यस्थ नियुक्त करने की मांग की।
राजस्थान हाईकोर्ट ने क्या कहा?
राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने 21 मई 2026 को अक्ष ऑप्टिफाइबर का आवेदन स्वीकार कर लिया।
हाईकोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मनोज कुमार गर्ग को एकल मध्यस्थ नियुक्त किया।
JVVNL ने आपत्ति उठाई थी कि इसी विवाद पर पहले मध्यस्थता हो चुकी है और दोबारा कार्यवाही नहीं की जा सकती।
लेकिन हाईकोर्ट ने इस आपत्ति को स्वीकार नहीं किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि पिछली मध्यस्थता में विवाद के मूल तथ्यों और अधिकारों पर फैसला नहीं हुआ था।
मध्यस्थ ने केवल कार्यवाही को चलने योग्य नहीं माना था। इसलिए पिछली कार्यवाही को ऐसा अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता, जिसके कारण दोबारा मध्यस्थता पूरी तरह रुक जाए।
समय-सीमा पर भी हाईकोर्ट ने दी अहम व्यवस्था
JVVNL ने यह भी कहा था कि अक्ष ऑप्टिफाइबर की मांग समय-सीमा के बाहर है।
हाईकोर्ट ने इस आपत्ति को भी स्वीकार नहीं किया।
हाईकोर्ट के अनुसार, वर्तमान मामले में कार्रवाई का कारण 27 जून 2024 को पैदा हुआ, जिस दिन JVVNL ने मध्यस्थ नियुक्त करने से इनकार किया था।
JVVNL ने सुप्रीम कोर्ट में क्या सवाल उठाए?
JVVNL की याचिका में कई महत्वपूर्ण कानूनी सवाल उठाए गए हैं।
सबसे बड़ा सवाल है कि क्या एक ही विवाद पर पहले मध्यस्थता की कार्यवाही हो जाने और उसके खिलाफ कानूनी चुनौती खारिज होने के बाद दोबारा मध्यस्थता शुरू की जा सकती है?
JVVNL ने यह भी सवाल उठाया है कि मामले की समय-सीमा 24 सितंबर 2019 के मूल नोटिस से तय होगी या 27 जून 2024 को दोबारा मध्यस्थ नियुक्त करने से इनकार किए जाने की तारीख से।
इसके अलावा JVVNL का कहना है कि जब कोई पक्ष पहले की मध्यस्थता में शामिल हो चुका हो, उसके खिलाफ फैसला आ चुका हो और उसने उस फैसले को कानून के तहत चुनौती भी दी हो, तो उसी विवाद को दोबारा उठाना विवाद की अंतिमता और न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग के सिद्धांतों के खिलाफ हो सकता है।
मध्यस्थ की एकतरफा नियुक्ति का मुद्दा क्यों महत्वपूर्ण है?
मामले में मध्यस्थ की नियुक्ति की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण है।
अक्ष ऑप्टिफाइबर की ओर से हाईकोर्ट में तर्क दिया गया कि समझौते में मध्यस्थ नियुक्त करने की जो व्यवस्था थी, उसमें एक पक्ष से जुड़े अधिकारी की भूमिका थी।
सुप्रीम कोर्ट पहले ही टीआरएफ और पर्किन्स ईस्टमैन जैसे मामलों में स्पष्ट कर चुका है कि मध्यस्थ की नियुक्ति में निष्पक्षता और स्वतंत्रता बेहद महत्वपूर्ण है। यदि किसी व्यक्ति की स्वयं मध्यस्थ बनने की पात्रता नहीं है, तो उसके द्वारा किसी दूसरे मध्यस्थ की नियुक्ति पर भी सवाल उठ सकता है।
लेकिन JVVNL का तर्क है कि मध्यस्थ की निष्पक्षता का सिद्धांत अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं हो सकता कि एक बार समाप्त हो चुके विवाद को उसी आधार पर दोबारा मध्यस्थता में ले जाया जाए।
सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना है कि दो महत्वपूर्ण सिद्धांतों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
एक तरफ है मध्यस्थ की निष्पक्षता और स्वतंत्रता।
दूसरी तरफ है एक ही विवाद की अंतिमता, समय-सीमा और न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग पर रोक।
सवाल सीधा है—
क्या मध्यस्थ की नियुक्ति की प्रक्रिया पर आपत्ति के आधार पर उसी विवाद पर दूसरी बार मध्यस्थता शुरू की जा सकती है?
या फिर—
एक बार मध्यस्थता शुरू करने, उसकी कार्यवाही का सामना करने और उसके आदेश को कानून के तहत चुनौती देने के बाद उसी विवाद को दोबारा उठाने पर रोक होगी?
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने JVVNL की याचिका पर नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 21 सितंबर 2026 को होगी।
आगे आने वाला सुप्रीम कोर्ट का फैसला मध्यस्थता से जुड़े मामलों में मध्यस्थ की निष्पक्षता, विवाद की अंतिमता और दोबारा मध्यस्थता शुरू करने की सीमा को लेकर महत्वपूर्ण दिशा तय कर सकता है।