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चेक बाउंस मामले में आरोपी को हस्ताक्षर जांच कराने का मौलिक अधिकार, ट्रायल कोर्ट नहीं कर सकता इनकार: राजस्थान हाईकोर्ट

Rajasthan High Court: Accused Has Fundamental Right to FSL Signature Examination in Cheque Bounce Cases

14 साल पुराने मामले में हाईकोर्ट सख्त-निष्पक्ष सुनवाई के लिए FSL जांच जरूरी, ट्रायल कोर्ट को दिए जल्द निपटारे के निर्देश

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने चेक बाउंस से जुड़े मामले में व्यवस्था देते हुए कहा कि किसी भी आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) का अधिकार सर्वोपरि है और इस अधिकार के तहत वह अपने बचाव में हर संभव साक्ष्य प्रस्तुत कर सकता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि विशेष रूप से चेक बाउंस मामलों (धारा 138, निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट) में यदि आरोपी हस्ताक्षर को लेकर विवाद उठाता है, तो उसे फॉरेंसिक जांच (FSL) कराने का अवसर दिया जाना चाहिए।

जस्टिस अनूप कुमार धंध की एकलपीठ ने यह रिपोर्टेबल फैसला महेश तिवारी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला वर्ष 2012 से संबंधित है, जिसमें आरोपी महेश तिवारी के खिलाफ चेक बाउंस का मामला दर्ज किया गया था।

शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत चेक बैंक में लगाया गया, लेकिन वह “फंड्स इनसफिशिएंट” (पर्याप्त राशि न होने) के कारण बाउंस हो गया।

इसके बाद शिकायतकर्ता ने कानूनी नोटिस भेजा, जिसके जवाब में आरोपी ने स्पष्ट रूप से कहा कि उसने कभी कोई चेक जारी नहीं किया और चेक पर उसके हस्ताक्षर नहीं हैं।

याचिकाकर्ता ने इस पूरे मामले को फर्जी बताया और यह बचाव आरोपी ने शुरू से लेकर पूरे ट्रायल के दौरान बनाए रखा।

ट्रायल कोर्ट में क्या हुआ?

जब मामला ट्रायल के अंतिम चरण में पहुंचा और आरोपी की गवाही दर्ज होने वाली थी, तब आरोपी ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 45 के तहत आवेदन प्रस्तुत किया।

इसमें उसने मांग की कि चेक पर किए गए हस्ताक्षरों की जांच फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) से करवाई जाए।

लेकिन ट्रायल कोर्ट ने यह आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया कि आरोपी बैंक अधिकारी को गवाह बना सकता है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि आवेदन ट्रायल के अंतिम चरण में दिया गया है और यह केवल देरी करने का प्रयास है।

याचिकाकर्ता की दलीलें और बचाव

याचिकाकर्ता महेश तिवारी ने हाईकोर्ट में दायर अपनी आपराधिक याचिका में ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी।

याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह था कि ट्रायल कोर्ट ने उनके साथ न्याय नहीं किया और उनके बचाव के महत्वपूर्ण अधिकार को छीन लिया।

चेक जारी करने से साफ इनकार

याचिकाकर्ता का सबसे प्रमुख और मूल आधार यह था कि उसने कभी भी शिकायतकर्ता को कोई चेक जारी नहीं किया और विवादित चेक पर किए गए हस्ताक्षर उसके नहीं हैं। यह पूरा मामला झूठा और मनगढ़ंत है।

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि जब उन्हें पहली बार कानूनी नोटिस मिला, उसी समय उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि चेक और हस्ताक्षर दोनों उसके नहीं हैं।

शुरुआत से एक समान बचाव (Consistent Defence)

याचिकाकर्ता ने यह दलील दी कि उसने ट्रायल की शुरुआत से लेकर अंत तक एक ही स्टैंड रखा और हर स्तर पर हस्ताक्षर को विवादित बताया। उसका बचाव कोई नया या बाद में बनाया गया तर्क नहीं है।

इससे यह साबित होता है कि उसका उद्देश्य केवल देरी करना नहीं बल्कि वास्तविक सच्चाई सामने लाना है।

FSL जांच की मांग क्यों की गई?

याचिकाकर्ता ने कहा कि जब मामला उसके बयान (defence evidence) के चरण में पहुंचा, तब उसने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 45 के तहत आवेदन दिया।

इस आवेदन में चेक पर किए गए हस्ताक्षरों की जांच FSL से कराने और हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की राय लेने की मांग की गई।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि हस्ताक्षर की वैज्ञानिक जांच ही सच्चाई सामने ला सकती है और बिना जांच के न्याय संभव नहीं है।

निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार

याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा कि निष्पक्ष सुनवाई उसका मौलिक अधिकार है और उसे अपने बचाव में साक्ष्य प्रस्तुत करने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।

उसने यह भी कहा कि यदि FSL जांच का अवसर नहीं दिया जाता, तो यह उसके अधिकारों का उल्लंघन होगा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध मामले Kalyani Baskar vs M.S. Sampoornam (2007) का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि आरोपी को दस्तावेज की हैंडराइटिंग जांच कराने का अवसर देना चाहिए और यह उसके बचाव का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

ट्रायल कोर्ट के आदेश पर आपत्ति

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट का आदेश तकनीकी आधार पर दिया गया और न्यायसंगत नहीं था। इससे उसे अपने बचाव का अवसर नहीं मिला।

प्रतिवादी (शिकायतकर्ता) की दलीलें

प्रतिवादी (शिकायतकर्ता) की ओर से याचिकाकर्ता की सभी दलीलों का विरोध किया गया और ट्रायल कोर्ट के आदेश को सही ठहराया गया।

शिकायतकर्ता का सबसे बड़ा तर्क यह था कि आरोपी ने FSL जांच का आवेदन ट्रायल के अंतिम चरण में दिया और यह केवल केस को लंबा खींचने का प्रयास है।

यह न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालने की रणनीति है।

प्रतिवादी ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने पूरी तरह कानून के अनुसार निर्णय लिया।

कोर्ट ने आरोपी को वैकल्पिक रास्ता दिया था (जैसे बैंक अधिकारी को बुलाना), इसलिए FSL जांच जरूरी नहीं थी।

प्रतिवादी ने यह भी तर्क दिया कि आरोपी का यह तर्क केवल बचाव का बहाना है।

हस्ताक्षर का विवाद बाद में उठाया गया और यह मुकदमे को कमजोर करने की रणनीति है।

प्रतिवादी ने हाईकोर्ट में कहा कि मामला पहले से ही काफी पुराना है और इस तरह के आवेदन से और देरी होगी।

न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के समान है।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को गलत ठहराते हुए स्पष्ट कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर व्यक्ति को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार है।

इसमें आरोपी को अपने बचाव में साक्ष्य प्रस्तुत करने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक अपराध सिद्ध न हो जाए, हर व्यक्ति निर्दोष माना जाता है।

धारा 139 NI Act – उल्टा बोझ (Reverse Burden):- हाईकोर्ट ने कहा कि चेक बाउंस मामलों में कानून यह मानकर चलता है कि चेक वैध है, जब तक आरोपी इसे गलत साबित न करे।

इसलिए आरोपी को मजबूत बचाव का अवसर देना और भी जरूरी हो जाता है।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले Kalyani Baskar vs M.S. Sampoornam (2007) का हवाला दिया।

इसमें कहा गया कि यदि दस्तावेज आरोपी के बचाव में मदद कर सकता है, तो उसे हैंडराइटिंग एक्सपर्ट से जांच कराने का मौका दिया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द (Quash) करते हुए चेक को FSL जांच के लिए भेजने और आरोपी के सैंपल हस्ताक्षर लेकर तुलना करने के आदेश दिए।

साथ ही FSL रिपोर्ट जल्द प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए।

मामला 14 साल पुराना होने के चलते हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को बिना अनावश्यक स्थगन के जल्द से जल्द मामले का निपटारा करने के निर्देश दिए।

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