अदालत ने कहा-ग्रेस मार्क्स नियमों का उल्लंघन, रिकॉर्ड में छेड़छाड़ के पर्याप्त सबूत; उच्च पद पर ईमानदारी और पारदर्शिता से समझौता अस्वीकार्य
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में केंद्रीय विद्यालय संगठन (KVS) के तहत जोधपुर K.V. No.2 की पूर्व प्रधानाचार्या सत्या गर्ग को बड़ा झटका देते हुए उनके खिलाफ विभागीय जांच को उचित ठहराया है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि
प्रधानाचार्या संस्थान की प्रमुख, उनसे उच्च स्तर की ईमानदारी, निष्पक्षता और पारदर्शिता अपेक्षित होती है। नियमों से समझौता कर छात्रों को अनुचित लाभ देना न केवल गलत है, बल्कि इसके गंभीर परिणाम भी हो सकते हैं।
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस सुनील बेनीवाल की खंडपीठ ने प्रधानाचार्या की याचिका को खारिज करते हुए साफ कहा कि विभागीय जांच प्रक्रिया में कोई गंभीर त्रुटि नहीं पाई गई और आरोपों के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं।
इस फैसले के साथ ही उनके खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई को भी बरकरार रखा गया है।
यह मामला लंबे समय से न्यायिक प्रक्रिया में था, जिसमें प्रधानाचार्या पर एक छात्र को अनुचित तरीके से पास कराने, अधिक अंक देने और परीक्षा रिकॉर्ड में छेड़छाड़ करने जैसे गंभीर आरोप लगे थे।
क्या है पूरा मामला
यह मामला वर्ष 2005-06 के दौरान का है, जब याचिकाकर्ता प्रधानाचार्या सत्या गर्ग केंद्रीय विद्यालय 2 में प्रधानाचार्या के पद पर कार्यरत थीं।
आरोप था कि उन्होंने कक्षा 7 के एक छात्र मास्टर रोहित को, जो तीन विषयों में फेल हुआ था, नियमों के विपरीत अतिरिक्त अंक देकर अगली कक्षा में प्रमोट कर दिया।
जांच में यह भी सामने आया कि छात्र को अंग्रेजी, गणित और विज्ञान में अतिरिक्त अंक दिए गए, जो निर्धारित सीमा से अधिक थे।
इसके अलावा, उत्तर पुस्तिकाओं में छेड़छाड़ और रिकॉर्ड में बदलाव के आरोप भी लगे।
विभागीय कार्रवाई और सजा
जांच के बाद विभागीय प्राधिकरण ने प्रधानाचार्या सत्या गर्ग को दोषी पाया और उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करते हुए उन्हें प्रधानाचार्या पद से वाइस प्रिंसिपल पद पर पदावनत किया गया।
इसके साथ ही प्रधानाचार्या के भविष्य में प्रमोशन पर रोक लगा दी गई।
इस फैसले के खिलाफ की गई अपील के बाद भी यह सजा बरकरार रही।
ट्रिब्यूनल में विवाद: दो सदस्यों की अलग-अलग राय
जब मामला केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) पहुंचा, तो वहां दो सदस्यों की राय अलग-अलग रही:
न्यायिक सदस्य ने जांच प्रक्रिया में खामियां बताते हुए सजा को रद्द कर दिया और
प्रशासनिक सदस्य ने जांच को सही ठहराते हुए याचिका खारिज करने की बात कही।
बाद में तीसरे सदस्य ने प्रशासनिक सदस्य की राय से सहमति जताई, जिससे बहुमत से याचिका खारिज हो गई।
याचिकाकर्ता की दलीलें
प्रधानाचार्या ने मामले की सुनवाई के दौरान स्वयं उपस्थित होकर विस्तार से अपनी दलीलें प्रस्तुत कीं।
विभागीय कार्रवाई और ट्रिब्यूनल के फैसले को चुनौती देते हुए कई महत्वपूर्ण दलीलें दीं कि संबंधित समय (2005-06) में ऐसी नीति लागू थी जिसके अनुसार किसी भी छात्र को प्राथमिक/मिडिल स्तर तक रोका नहीं जा सकता।
उन्होंने गजट ऑफ इंडिया के एक प्रावधान (Section 16) का हवाला देते हुए कहा कि: “कोई भी बच्चा प्राथमिक शिक्षा पूर्ण होने तक फेल नहीं किया जा सकता।”
इस आधार पर उन्होंने कहा कि छात्र को प्रमोट करना कोई अनियमितता नहीं थी।
व्यक्तिगत दुर्भावना का आरोप
उन्होंने यह भी कहा कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप दुर्भावनापूर्ण (mala fide) हैं और उनका उद्देश्य उनकी छवि खराब करना है।
उनके अनुसार, उनका पूरा सेवा रिकॉर्ड निर्दोष (unblemished) रहा है।
4000 से अधिक छात्रों वाले विद्यालय में किसी एक छात्र को विशेष लाभ देना तार्किक नहीं है।
ग्रेस मार्क्स देने का अधिकार
याचिकाकर्ता ने यह दलील दी कि प्रधानाचार्या होने के नाते उन्हें ग्रेस मार्क्स देने का अधिकार था। उन्होंने नियमों के तहत ही छात्र को लाभ दिया।
उत्तर पुस्तिकाओं की पुनः जांच
याचिकाकर्ता ने कहा कि उन्होंने केवल शिक्षकों को उत्तर पुस्तिकाओं को दोबारा जांचने के लिए कहा। यह कदम इसलिए उठाया गया क्योंकि कुछ प्रश्न जांचे नहीं गए थे।
उनके अनुसार, यह एक प्रशासनिक निर्णय था, न कि किसी प्रकार की अनियमितता।
ट्रिब्यूनल के न्यायिक सदस्य का समर्थन
याचिकाकर्ता ने विशेष रूप से ट्रिब्यूनल के न्यायिक सदस्य (Dr. K.B. Suresh) के फैसले का हवाला दिया, जिसमें अधिकांश आरोप (चार में से पांच) खारिज कर दिए गए थे।
जांच प्रक्रिया को त्रुटिपूर्ण बताया गया था और सजा को रद्द करने की सिफारिश की गई थी।
केंद्रीय विद्यालय संगठन का जवाब
राजस्थान हाईकोर्ट में दायर याचिका का विरोध करते हुए केंद्रीय संगठन ने दलील दी कि वर्ष 2005-06 में नो-डिटेंशन पॉलिसी लागू नहीं थी और यह नीति 2009 में RTE Act के तहत लागू हुई।
इसलिए याचिकाकर्ता द्वारा दिया गया तर्क तथ्यात्मक रूप से गलत है।
जवाब में कहा गया कि नियमों के अनुसार अधिकतम 10 ग्रेस मार्क्स ही दिए जा सकते हैं, लेकिन इस मामले में छात्र को तीन विषयों में अतिरिक्त अंक दिए गए।
यह स्पष्ट रूप से नियमों का उल्लंघन है।
गंभीर प्रशासनिक दुराचार
प्रतिवादी पक्ष ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने उत्तर पुस्तिकाओं में हस्तक्षेप (tampering) किया, परीक्षा विभाग की चाबियां लेकर स्वयं रिकॉर्ड में बदलाव किया गया, जो कि एक गंभीर प्रशासनिक दुराचार है।
जांच प्रक्रिया पूरी तरह वैध
साक्ष्य और गवाहों के बयान को लेकर संगठन की ओर से कहा गया कि कई शिक्षकों के बयान दर्ज किए गए और गवाहों ने पुष्टि की कि छात्र को बाद में प्रमोट किया गया और इसके लिए रिकॉर्ड में बदलाव और दस्तावेजों की अनुपस्थिति भी सामने आई।
केंद्रीय विद्यालय संगठन ने कहा कि इस मामले में जांच प्रक्रिया पूरी तरह वैध थी और विभागीय जांच नियमों के अनुसार की गई। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता को पूरा अवसर दिया गया।
ट्रिब्यूनल का बहुमत
केंद्रीय विद्यालय संगठन ने कहा कि ट्रिब्यूनल के प्रशासनिक सदस्य और तीसरे सदस्य दोनों ने जांच को सही माना और आरोपों को सिद्ध माना, इसलिए ट्रिब्यूनल का बहुमत निर्णय सही है।
अंत में कहा गया कि प्रधानाचार्या का पद अत्यंत जिम्मेदारी वाला होता है। उनसे उच्च स्तर की ईमानदारी और निष्पक्षता अपेक्षित होती है। ऐसे पद पर इस प्रकार की अनियमितता गंभीर है।
हाईकोर्ट का फैसला
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस सुनील बेनीवाल की खंडपीठ ने बिंदुवार अपने फैसले में महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।
नो-डिटेंशन पॉलिसी
राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता प्रधानाचार्या की इस दलील को खारिज कर दिया कि “नो-डिटेंशन पॉलिसी” लागू थी।
कोर्ट ने कहा कि जिस प्रावधान (Section 16) का हवाला दिया गया, वह Right to Education Act, 2009 का हिस्सा है और यह कानून वर्ष 2005-06 में लागू नहीं था। इसलिए याचिकाकर्ता का यह तर्क तथ्यात्मक रूप से गलत है।
कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि उस समय ऐसी कोई नीति लागू नहीं थी, जिससे छात्र को स्वतः प्रमोट किया जा सके।
ग्रेस मार्क्स नियमों का उल्लंघन सिद्ध
हाईकोर्ट ने ग्रेस मार्क्स नियमों को लेकर कहा कि शिक्षा संहिता के अनुसार अधिकतम 10 ग्रेस मार्क्स दिए जा सकते हैं और एक विषय में अधिकतम 5 अंक की सीमा होती है।
लेकिन इस मामले में छात्र को कई विषयों में अतिरिक्त अंक दिए गए और कुल अंक निर्धारित सीमा से अधिक थे।
कोर्ट ने इसे नियमों का स्पष्ट उल्लंघन माना और कहा कि यह “अनुचित लाभ” देने का मामला है।
विभागीय जांच प्रक्रिया वैध
कोर्ट ने विभागीय जांच की प्रक्रिया का गहराई से परीक्षण करते हुए कहा कि जांच पूरी तरह नियमों के अनुसार की गई, जिसमें याचिकाकर्ता को पूरा अवसर दिया गया। कोर्ट ने कहा कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किया गया है।
अदालत की सीमित भूमिका
कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में वह साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन (re-appreciation) नहीं करेगा।
कोर्ट ने महत्वपूर्ण सिद्धांत दोहराया कि विभागीय मामलों में अदालत की भूमिका सीमित होती है। यदि जांच प्रक्रिया सही है और निष्कर्ष साक्ष्यों पर आधारित हैं, तो अदालत हस्तक्षेप नहीं करती। यह प्रशासनिक कानून का एक स्थापित सिद्धांत है, जिसे कोर्ट ने दोहराया।
उच्च पद पर उच्च आचरण की अपेक्षा
हाईकोर्ट ने प्रधानाचार्या के पद को लेकर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रधानाचार्या संस्थान की प्रमुख होती हैं। उनसे उच्च स्तर की ईमानदारी, निष्पक्षता और पारदर्शिता अपेक्षित होती है।
कोर्ट ने कहा कि इस पद पर बैठे व्यक्ति से समाज आदर्श आचरण की अपेक्षा करता है, इसलिए ऐसी अनियमितता गंभीर मानी जाएगी।
याचिका खारिज
हाईकोर्ट ने इस मामले में दी गई सजा को उचित और वैध ठहराते हुए याचिका को खारिज करने का आदेश दिया।
प्रधानाचार्या संस्थान की प्रमुख, उनसे उच्च स्तर की ईमानदारी, निष्पक्षता और पारदर्शिता अपेक्षित होती है। नियमों से समझौता कर छात्रों को अनुचित लाभ देना न केवल गलत है, बल्कि इसके गंभीर परिणाम भी हो सकते हैं।