टॉप स्टोरी

चर्चित खबरें

IAS आरती डोगरा पर ACB जांच के आदेश: हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, कर्तव्यों में विफलता और भ्रष्टाचार की आशंका

Rajasthan High Court Orders ACB Probe Against IAS Aarti Dogra Over Alleged Irregularities

जयपुर। राजस्थान की प्रशासनिक और बिजली विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने डिस्कॉम की चेयरपर्सन और वरिष्ठ IAS अधिकारी आरती डोगरा के खिलाफ एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) से जांच कराने का आदेश दिया है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि प्रथम दृष्टया यह मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही का नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार की आशंका से भी जुड़ा हुआ प्रतीत होता है।

जस्टिस रवि चिरानिया की एकलपीठ ने सुपरिटेंडेंट इंजीनियर आरके मीना द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया।

हाईकोर्ट ने ACB को आदेश दिया हैं कि वह पूरे मामले की गहन जांच करे और तीन महीने के भीतर रिपोर्ट कोर्ट में पेश करें.

अदालत की टिप्पणी: “जानबूझकर रोकी गई जांच, गंभीर संकेत”

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने बेहद कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि डिस्कॉम की चेयरपर्सन ने याचिकाकर्ता के खिलाफ जांच पर निर्णय लेने में जानबूझकर देरी की।

हाईकोर्ट के अनुसार, यह देरी सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं लगती, बल्कि इसके पीछे किसी प्रकार की मंशा होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा—
“इन परिस्थितियों में भ्रष्टाचार की आशंका के पर्याप्त आधार मौजूद हैं। जब कोई वरिष्ठ अधिकारी अपने वैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन करने में विफल रहता है और निर्णय लेने से बचता है, तो यह स्थिति जांच की मांग करती है।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि एक उच्च पद पर बैठे अधिकारी से पारदर्शिता, निष्पक्षता और समयबद्ध निर्णय की अपेक्षा की जाती है, लेकिन इस मामले में ये सभी मानक संदिग्ध नजर आए।

प्रमोशन विवाद से शुरू हुआ मामला

यह पूरा मामला सुपरिटेंडेंट इंजीनियर आरके मीना की ओर से दायर याचिका से जुड़ा है।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं ने कोर्ट को बताया कि वर्ष 2022-23 की विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) में गंभीर अनियमितताएं हुईं।

याचिका के अनुसार, विभाग ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों और कार्मिक विभाग (DOP) के सर्कुलर के बावजूद रोस्टर प्रणाली का पालन नहीं किया।

रोस्टर मेंटेन नहीं होने के कारण आरक्षण नियमों का सही तरीके से पालन नहीं हुआ, जिससे याचिकाकर्ता को एक्सईएन से सुपरिटेंडेंट इंजीनियर के पद पर प्रमोशन नहीं मिल सका।

दिसंबर 2023 में इस संबंध में रिट याचिका दायर की गई, जिसके बाद मामला कोर्ट के समक्ष आया।

याचिका के बाद तीन चार्जशीट: प्रताड़ना का आरोप

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि जैसे ही उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया, उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी गई।

कोर्ट को बताया गया कि याचिका दायर करने के बाद अलग-अलग कारणों का हवाला देते हुए उन्हें तीन अलग-अलग चार्जशीट जारी की गईं।

याचिकाकर्ता ने इसे प्रतिशोधात्मक कार्रवाई बताते हुए कहा कि यह कदम उन्हें दबाव में लाने और न्यायिक प्रक्रिया से पीछे हटाने के लिए उठाया गया।

अदालत ने इस पहलू को भी गंभीरता से लिया और माना कि यदि किसी कर्मचारी के खिलाफ याचिका दायर करने के बाद लगातार कार्रवाई होती है, तो यह निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

रोस्टर रजिस्टर पर टालमटोल: कोर्ट ने जताई नाराजगी

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने डिस्कॉम चेयरपर्सन को निर्देश दिया था कि वे शपथपत्र के माध्यम से स्पष्ट करें कि क्या विभाग में रोस्टर रजिस्टर विधिवत संधारित किया जा रहा है या नहीं।

हालांकि, चेयरपर्सन की ओर से दाखिल हलफनामे में केवल सारणीबद्ध आंकड़े प्रस्तुत किए गए, जबकि वास्तविक रोस्टर रजिस्टर कोर्ट के सामने पेश नहीं किया गया।

इस पर अदालत ने कड़ी आपत्ति जताते हुए पुनः निर्देश दिया कि अगली सुनवाई में रोस्टर रजिस्टर सहित विस्तृत जानकारी दी जाए।

लेकिन इसके बावजूद अगली तारीख पर भी संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए। अदालत ने इसे गंभीर चूक मानते हुए कहा कि यह आचरण न्यायालय के आदेशों की अवहेलना जैसा प्रतीत होता है और इससे संदेह और गहरा हो जाता है।

“कर्तव्यों में विफलता”: कोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि उपलब्ध तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि चेयरपर्सन अपने कर्तव्यों के निर्वहन में विफल रही हैं।

कोर्ट ने कहा कि जब किसी अधिकारी को स्पष्ट निर्देश दिए जाते हैं और वह उन्हें पूरा नहीं करता, तो यह न केवल प्रशासनिक अक्षमता बल्कि जवाबदेही की कमी को भी दर्शाता है।

अदालत के अनुसार, इस तरह का व्यवहार सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता और विश्वास को कमजोर करता है, जो कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है।

ACB जांच के आदेश: तीन महीने में रिपोर्ट

इन सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) को मामले की जांच करने का आदेश दिया।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि ACB पूरे मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच करे तथा तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत करे।

यह आदेश इस बात का संकेत है कि अदालत इस मामले को बेहद गंभीरता से देख रही है और किसी भी प्रकार की अनियमितता या भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

सबसे अधिक लोकप्रिय