जोधपुर। आशापूर्णा प्लेटिनम पेंटहाउस विवाद मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने आशापूर्णा बिल्डकॉन लिमिटेड के प्रबंध निदेशक करण सिंह उचियाड़ा और कंपनी के अधिकारी जितेंद्र सिंह खीची को बड़ी अंतरिम राहत दी है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित संज्ञान (Cognizance) आदेश और उससे जुड़ी सभी आपराधिक कार्यवाही पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है।
साथ ही, राजस्थान हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच समझौते की संभावना को देखते हुए मामले को मध्यस्थता केंद्र (Mediation Centre) भेज दिया है।
जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू की एकलपीठ ने करण सिंह उचियाड़ा व अन्य की ओर से दायर आपराधिक विविध याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है।
याचिका में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, जोधपुर मेट्रो द्वारा 11 जून 2026 को पारित उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें ट्रायल कोर्ट के 16 अप्रैल 2025 के संज्ञान आदेश को बरकरार रखा गया था।
क्या है मामला?
मामला वर्ष 2014 में आशापूर्णा प्लेटिनम-ए परियोजना में स्थित फ्लैट संख्या 902 (पेंटहाउस) की बिक्री के लिए हुए Agreement to Sell से जुड़ा है।
शिकायतकर्ता का आरोप था कि उसने और उसकी पत्नी ने लगभग 43.05 लाख रुपये का भुगतान किया, लेकिन बाद में पता चला कि संबंधित पेंटहाउस अस्तित्व में ही नहीं था।
आरोप है कि झूठे आश्वासन देकर राशि प्राप्त की गई और न तो विक्रय विलेख (Sale Deed) निष्पादित किया गया और न ही राशि लौटाई गई, जिससे भारतीय दंड संहिता की धारा 406 और 420 के तहत अपराध बनता है।
याचिकाकर्ताओं का पक्ष
याचिकाकर्ताओं करण सिंह उचियाड़ा की ओर से अधिवक्ता डॉ. मोहित सिंघवी ने हाईकोर्ट को बताया कि यह विवाद पूरी तरह संविदात्मक (Contractual) है।
उन्होंने दलील दी कि पेंटहाउस का अतिरिक्त हिस्सा आवश्यक निर्माण स्वीकृति (JDA Approval) नहीं मिलने के कारण निर्मित नहीं हो सका।
इसके बाद खरीदार को वैकल्पिक फ्लैट उपलब्ध कराने अथवा क्षेत्रफल में कमी के अनुरूप राशि वापस करने का प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन शिकायतकर्ता ने दोनों विकल्प स्वीकार नहीं किए।
याचिका में यह भी कहा गया कि जांच के दौरान पुलिस ने विस्तृत विवेचना के बाद 28 दिसंबर 2018 को अंतिम रिपोर्ट (Final Report) प्रस्तुत करते हुए स्पष्ट निष्कर्ष निकाला था कि मामला आपराधिक नहीं, बल्कि दीवानी (Civil) एवं संविदात्मक विवाद है।
पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि फ्लैट का निर्माण हो चुका था और कंपनी ने कई बार रजिस्ट्री कराने के लिए नोटिस जारी किए, लेकिन शिकायतकर्ता ने स्वयं पंजीकरण नहीं कराया।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
सुनवाई के दौरान राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि विवाद मुख्यतः Agreement to Sell से उत्पन्न एक संविदात्मक विवाद प्रतीत होता है और इसमें समझौते की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जब जांच एजेंसी किसी मामले में नकारात्मक अंतिम रिपोर्ट (Negative Final Report) प्रस्तुत करती है और मजिस्ट्रेट उससे असहमति व्यक्त कर संज्ञान लेते हैं, तो आदेश में स्पष्ट, ठोस और पर्याप्त कारण दर्ज होना आवश्यक है।
कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया न्यायालय को ऐसा प्रतीत हुआ कि इस मामले में संज्ञान आदेश में आवश्यक कारणों का पर्याप्त उल्लेख नहीं किया गया।
संज्ञान आदेश पर रोक
राजस्थान हाईकोर्ट ने 16 अप्रैल 2025 को अतिरिक्त सिविल न्यायाधीश एवं न्यायिक मजिस्ट्रेट संख्या-8, जोधपुर महानगर द्वारा पारित संज्ञान आदेश तथा उससे संबंधित समस्त कार्यवाही पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी।
साथ ही हाईकोर्ट ने यह देखते हुए कि विवाद फ्लैट/पेंटहाउस की खरीद-बिक्री से संबंधित है और पक्षकारों के बीच समझौते की संभावना बनी हुई है, मामले को राजस्थान हाईकोर्ट मध्यस्थता केंद्र भेज दिया।
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को 4 अगस्त 2026 को मध्यस्थता केंद्र के समक्ष उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं।
मामले की अगली सुनवाई मध्यस्थता की कार्यवाही पूरी होने के बाद की जाएगी। यह आदेश बिल्डर-खरीदार विवादों में आपराधिक और दीवानी उपचार के बीच अंतर तथा आपराधिक कार्यवाही में संज्ञान लेते समय कारण दर्ज करने की आवश्यकता को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
