टॉप स्टोरी

चर्चित खबरें

मोटर एक्सीडेंट क्लेम पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सिर्फ तस्वीरों के आधार पर नहीं रोका जा सकता मुआवजा, इंश्योरेंस कंपनी को करना होगा भुगतान

Supreme Court Restores Compensation, Says Motor Accident Claims Don't Require Criminal Standard of Proof

नई दिल्ली: सड़क हादसों में मुआवजा पाने वालों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि मोटर एक्सीडेंट क्लेम के मामलों में सिर्फ बाद में ली गई तस्वीरों के आधार पर बीमा कंपनी मुआवजा नहीं रोक सकती। ऐसे मामलों में क्रिमिनल केस जैसी सख्त जांच जरूरी नहीं होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मोटर एक्सीडेंट क्लेम के मामलों में क्रिमिनल केस जैसा सख्त सबूत जरूरी नहीं है। ऐसे मामलों में यह देखा जाएगा कि उपलब्ध रिकॉर्ड, गवाहों और परिस्थितियों के आधार पर किस पक्ष की बात ज्यादा भरोसेमंद लगती है। अगर रिकॉर्ड से यह ज्यादा संभावित लगता है कि हादसा किसी वाहन चालक की लापरवाही से हुआ है, तो पीड़ित परिवारों को मुआवजा देने से इनकार नहीं किया जा सकता।

इसी टिप्पणी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट और मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल के फैसले पलटते हुए तीन मृत शिक्षकों के परिवारों को करोड़ों रुपये का कम्पेनसेशन देने का आदेश दिया। यह मामला वर्ष 2002 में उत्तर प्रदेश में हुए एक सड़क हादसे से जुड़ा है, जिसमें तीन शिक्षकों की मौत हो गई थी। मामले में मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल और बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह मानते हुए मुआवजा देने से इनकार कर दिया था।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने कहा कि मोटर एक्सीडेंट क्लेम का मकसद पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाना है। इसलिए ऐसे मामलों में उपलब्ध रिकॉर्ड, गवाहों और परिस्थितियों के आधार पर यह देखा जाएगा कि किस पक्ष की बात ज्यादा भरोसेमंद है। अगर रिकॉर्ड से यह ज्यादा संभावित लगता है कि हादसा वाहन चालक की लापरवाही से हुआ है, तो पीड़ित परिवारों को मुआवजा मिलना चाहिए।

यह भी पढ़ें: जमीन अधिग्रहण पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: जयपुर मेट्रो परियोजना के लिए सरकार की अधिग्रहण कार्रवाई वैध, कहा- ‘सुनवाई में शामिल नहीं हुए तो बाद में शिकायत नहीं कर सकते जमीन मालिक

मुआवजे का विवाद कैसे शुरू हुआ?

यह मामला 30 जनवरी 2002 की रात उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद-कानपुर मार्ग पर हुए एक सड़क हादसे से जुड़ा है। हादसे के समय एक मारुति कार इलाहाबाद से उरई जा रही थी। कार में चालक माता प्रसाद के साथ अजीत सिंह, रूप सिंह और डॉ. दिलीप कुमार कटियार सवार थे। रास्ते में कार की टक्कर एक टैंकर से हो गई।

इस हादसे में माता प्रसाद, अजीत सिंह और रूप सिंह की मौत हो गई, जबकि डॉ. दिलीप कुमार कटियार गंभीर रूप से घायल हो गए। तीनों मृतक शिक्षक थे और अपने-अपने परिवार के मुख्य कमाने वाले सदस्य थे।

हादसे के बाद तीनों मृतकों के परिवारों ने मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल में मुआवजे की मांग करते हुए अलग-अलग याचिकाएं दायर कीं। उनका कहना था कि दुर्घटना टैंकर चालक की तेज और लापरवाही से की गई ड्राइविंग की वजह से हुई। दूसरी ओर टैंकर चालक और मालिक ने दावा किया कि टैंकर सड़क किनारे खड़ा था और मारुति कार गलत दिशा में आकर उससे टकरा गई।

ट्रिब्यूनल ने टैंकर पक्ष की दलील स्वीकार कर ली और माना कि हादसा मारुति कार चालक की लापरवाही से हुआ। इसी आधार पर धारा 166 के तहत मुआवजे की याचिकाएं खारिज कर दी गईं और मुआवजा देने से इनकार कर दिया। हालांकि, बिना गलती के आधार पर मिलने वाली तय राशि देने का आदेश दिया गया। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी ट्रिब्यूनल का फैसला बरकरार रखा।

इसके बाद मृतकों के परिवार सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, जहां दोनों फैसले पलट दिए गए।

यह भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम: न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु 62 वर्ष करने की मांग पर राजस्थान सहित सभी राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों और हाईकोर्ट को नोटिस

मोटर एक्सीडेंट क्लेम में रिकॉर्ड और गवाह दोनों अहम

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मोटर एक्सीडेंट क्लेम के मामलों को क्रिमिनल मुकदमों की तरह नहीं देखा जा सकता। यहां कोर्ट यह देखता है कि रिकॉर्ड, गवाहों और दूसरे सबूतों के आधार पर किस पक्ष की बात ज्यादा भरोसेमंद है। अगर रिकॉर्ड से यह लगता है कि हादसा वाहन चालक की लापरवाही से हुआ है, तो पीड़ित परिवार को मुआवजा मिलना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मोटर वाहन कानून पीड़ितों की मदद के लिए बनाया गया है। इसका मकसद सड़क हादसों में जान गंवाने वाले या घायल लोगों के परिवारों को जल्द और उचित मुआवजा दिलाना है। इसलिए ट्रिब्यूनल और कोर्ट को पूरे रिकॉर्ड और हालात को देखकर फैसला करना चाहिए, न कि क्रिमिनल मुकदमों जैसी सख्त कसौटी अपनानी चाहिए।

यह भी पढ़ें: खनन कंपनियों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका: ASP तय करने की सरकार की व्यवस्था पूरी तरह वैध, राजस्व की चोरी रोकने वाले नियम बरकरार; किर्लोस्कर की याचिका खारिज

घायल शिक्षक की गवाही को माना सबसे बड़ा सबूत

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में सबसे अहम गवाह डॉ. दिलीप कुमार कटियार थे, जो हादसे में घायल हुए थे और हादसे के समय कार में मौजूद थे। उन्होंने साफ बताया कि कार अपनी सही दिशा में सामान्य रफ्तार से चल रही थी और सामने से आ रहे टैंकर ने टक्कर मारी।

कोर्ट ने कहा कि एक घायल प्रत्यक्षदर्शी की गवाही का विशेष महत्व होता है और जब तक उसे गलत साबित करने के मजबूत कारण न हों, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि घायल शिक्षक की गवाही में ऐसी कोई बड़ी कमी या विरोधाभास नहीं मिला, जिससे उस पर शक किया जाए। इसके बावजूद मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उसकी गवाही पर भरोसा नहीं किया और टैंकर मालिक की ओर से पेश किए गए गवाहों को सही मान लिया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोनों ने सबूतों का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया।

सिर्फ तस्वीरों के आधार पर तय नहीं होगी लापरवाही: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रिब्यूनल और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बड़ी गलती की। दोनों ने अपने फैसले का सबसे बड़ा आधार उन तस्वीरों को बनाया, जो हादसे के करीब दस से बारह घंटे बाद खींची गई थीं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हादसे के करीब दस से बारह घंटे बाद ली गई तस्वीरों से यह नहीं पता चल सकता कि टक्कर के समय दोनों वाहन किस स्थिति में थे। इसलिए सिर्फ इन तस्वीरों के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि हादसा मारुति कार चालक की लापरवाही से हुआ था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये तस्वीरें पुलिस ने नहीं, बल्कि खुद टैंकर मालिक ने हादसे के अगले दिन मौके पर पहुंचकर खिंचवाई थीं। इसलिए इन्हें पूरी तरह भरोसेमंद सबूत नहीं माना जा सकता। बेंच ने कहा कि कई घंटे बीत जाने के बाद वाहनों की स्थिति बदल सकती है। ऐसे में सिर्फ इन तस्वीरों के आधार पर दुर्घटना की जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती।

टैंकर चालक का पक्ष क्यों कमजोर पड़ा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हादसे के बाद टैंकर चालक और मालिक का व्यवहार भी कई सवाल खड़े करता है। अगर टैंकर चालक की कोई गलती नहीं थी तो उसने पुलिस को तुरंत सूचना क्यों नहीं दी। उसने सिर्फ इतना कहा कि उसने थाने में मौखिक जानकारी दी थी, लेकिन इसका कोई रिकॉर्ड सामने नहीं आया।

दूसरी ओर टैंकर मालिक भी घटना के करीब दस घंटे बाद मौके पर पहुंचा और पुलिस को सूचना देने के बजाय सिर्फ अपनी बीमा कंपनी को जानकारी दी।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि टैंकर चालक और मालिक ने न तो घायलों को अस्पताल पहुंचाने की कोशिश की और न ही शुरुआती जांच में पुलिस की कोई मदद की। ऐसे हालात में उनके पूरे बचाव पर संदेह पैदा होता है।

कोर्ट ने कहा कि इन परिस्थितियों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ये बातें टैंकर चालक की ओर से पेश किए गए बचाव का समर्थन नहीं करतीं।

सबसे अहम गवाह नहीं होने से कमजोर पड़ा बचाव

सुनवाई के दौरान टैंकर मालिक ने कहा कि टैंकर इसलिए रुका था क्योंकि उसका परिचालक शौच के लिए नीचे उतरा था। कोर्ट ने कहा कि इस दलील को साबित करने के लिए परिचालक की गवाही सबसे जरूरी थी, लेकिन उसे गवाह के तौर पर पेश नहीं किया गया। उसके गवाही नहीं देने की कोई वजह भी रिकॉर्ड में नहीं बताई गई।

कोर्ट ने कहा कि अगर टैंकर रात में सड़क पर खड़ा भी था, तब भी यह साबित नहीं किया गया कि उस पर पार्किंग लाइट, चेतावनी संकेत या दूसरे सुरक्षा इंतजाम किए गए थे। रात के समय बिना किसी चेतावनी के भारी वाहन सड़क पर खड़ा छोड़ना अपने आप में लापरवाही माना जाएगा।

चार्जशीट ने भी मजबूत किया परिवारों का पक्ष

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस जांच के बाद टैंकर चालक के खिलाफ लापरवाही से वाहन चलाने और मौत का कारण बनने समेत कई आरोपों में चार्जशीट दाखिल की गई थी। कोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ चार्जशीट दाखिल होना किसी चालक की गलती का अंतिम सबूत नहीं होता। लेकिन यह एक अहम परिस्थिति जरूर है, जिसे दूसरे सबूतों के साथ नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने पूरे रिकॉर्ड, घायल प्रत्यक्षदर्शी की गवाही, तस्वीरों की विश्वसनीयता और दूसरे सबूतों का एक साथ मूल्यांकन करने के बाद माना कि हादसा टैंकर चालक की तेज और लापरवाही से की गई ड्राइविंग की वजह से हुई थी। इसलिए मृतकों के परिवार मोटर वाहन कानून की धारा 166 के तहत मुआवजा पाने के हकदार हैं।

अंतिम फैसला: हाईकोर्ट और ट्रिब्यूनल के फैसले रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट और मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल के फैसले रद्द करते हुए तीनों मृत शिक्षकों के परिवारों को मोटर वाहन कानून की धारा 166 के तहत मुआवजा देने का आदेश दिया।

कोर्ट ने खुद नए सिरे से मुआवजे की गणना की और बीमा कंपनी को आठ सप्ताह के भीतर पूरी राशि जमा करने का निर्देश दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि दावा याचिका दाखिल होने की तारीख से भुगतान होने तक छह फीसदी सालाना ब्याज दिया जाएगा। अगर पहले बिना गलती के आधार पर मिलने वाली 50 हजार रुपये की अंतरिम राशि दी जा चुकी है, तो उसे अंतिम मुआवजे में समायोजित किया जाएगा। साथ ही, पूरी राशि सीधे दावेदारों के बैंक खातों में जमा करने और पूरे मुआवजे का भुगतान बीमा कंपनी को ही करने का आदेश दिया गया

मोटर एक्सीडेंट क्लेम मामलों के लिए अहम फैसला

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से साफ हो गया है कि मोटर एक्सीडेंट क्लेम के मामलों में ट्रिब्यूनल और कोर्ट सिर्फ तकनीकी आधार पर मुआवजा खारिज नहीं कर सकते।

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में मोटर एक्सीडेंट क्लेम के मामलों के लिए एक अहम कानूनी सिद्धांत तय किया है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में ट्रिब्यूनल और कोर्ट क्रिमिनल मुकदमों जैसी सख्त कसौटी नहीं अपना सकते। रिकॉर्ड, गवाहों और पूरे घटनाक्रम को साथ देखकर यह तय करना होगा कि हादसा किसकी लापरवाही से हुआ। सिर्फ किसी एक सबूत के आधार पर मुआवजा खारिज नहीं किया जा सकता।

साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि दुर्घटना के कई घंटे बाद ली गई तस्वीरों को अकेले निर्णायक सबूत नहीं माना जा सकता। मोटर एक्सीडेंट क्लेम के मामलों में ट्रिब्यूनल और कोर्ट को पूरे रिकॉर्ड, गवाहों और सभी परिस्थितियों का एक साथ मूल्यांकन करना होगा। यही सिद्धांत अब ऐसे मामलों की सुनवाई में मार्गदर्शक रहेगा।

सबसे अधिक लोकप्रिय