नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने जमीन अधिग्रहण से जुड़े मामलों को लेकर बड़ा फैसला सुनाते हुए साफ कहा है कि जमीन अधिग्रहण के खिलाफ आपत्ति दर्ज कराने का अधिकार हर जमीन मालिक को है, लेकिन अगर वह खुद सुनवाई में हिस्सा नहीं लेता और बाद में भी कोई कोशिश नहीं करता तो बाद में यह नहीं कह सकता कि उसे सुनवाई का मौका नहीं मिला।
इसी टिप्पणी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने जयपुर मेट्रो के दूसरे चरण के लिए 27 हेक्टेयर जमीन के अधिग्रहण को सही ठहराते हुए जमीन मालिकों की अपील खारिज कर दी।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने कहा कि सुनवाई का अधिकार कानून में एक अहम सुरक्षा है, लेकिन इसके साथ जमीन मालिक की भी जिम्मेदारी है कि वह उस अधिकार का इस्तेमाल करे। अगर कोई व्यक्ति खुद सुनवाई में शामिल नहीं होता और बाद में भी कोई कदम नहीं उठाता तो वह बाद में सुनवाई न मिलने का आरोप नहीं लगा सकता।
यह मामला जयपुर के सांगानेर इलाके में जयपुर मेट्रो के कार डिपो के लिए जमीन अधिग्रहण से जुड़ा था। जमीन मालिकों ने दावा किया था कि उनकी आपत्तियों पर ठीक से सुनवाई नहीं हुई और जमीन अधिग्रहण की पूरी प्रक्रिया कानून के मुताबिक नहीं अपनाई गई। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और कहा कि रिकॉर्ड से साफ है कि संबंधित अधिकारी ने कानून के तहत जरूरी प्रक्रिया का पर्याप्त पालन किया था।
जमीन मालिकों ने क्यों उठाई आपत्ति?
यह मामला जयपुर के श्योपुरा गांव की करीब 27 हेक्टेयर जमीन से जुड़ा है। राजस्थान सरकार ने वर्ष 2011 में जयपुर मेट्रो परियोजना के दूसरे चरण के तहत मेट्रो कार डिपो बनाने के लिए इस जमीन के अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की थी।
जमीन मालिकों ने इसका विरोध करते हुए कहा कि मेट्रो डिपो के लिए उनकी जमीन लेने की जरूरत नहीं है। सरकार चाहे तो दूसरी सरकारी जमीन का इस्तेमाल कर सकती है। उनका यह भी आरोप था कि अधिकारियों ने उनकी आपत्तियों पर ठीक से ध्यान नहीं दिया और कानून के मुताबिक पूरी सुनवाई भी नहीं की। इसके बाद जमीन मालिकों ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर जमीन अधिग्रहण को चुनौती दी।
राजस्थान हाईकोर्ट की एकल पीठ ने जमीन मालिकों की सही दलील मानते हुए अधिग्रहण की प्रक्रिया रद्द कर दी थी, लेकिन राज्य सरकार और जयपुर मेट्रो रेल कॉरपोरेशन की अपील पर डिवीजन बेंच ने यह फैसला पलट दिया और और अधिग्रहण को सही माना।
इसी फैसले को चुनौती देते हुए जमीन मालिक सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे।
सुनवाई के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जमीन अधिग्रहण कानून की धारा 5ए जमीन मालिकों को एक बेहद अहम अधिकार देती है। इस प्रावधान के तहत कोई भी जमीन मालिक अपनी आपत्ति दर्ज करा सकता है और उसे अपनी बात रखने का मौका मिलना चाहिए। लेकिन यह अधिकार केवल कागज पर मौजूद अधिकार नहीं है, बल्कि इसका इस्तेमाल भी जमीन मालिक को करना होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शुरुआत में जमीन मालिक कई बार अधिकारियों के सामने पेश हुए थे। मेट्रो निगम ने उनकी आपत्तियों का जवाब भी दिया और उसके बाद उन्हें अपनी बात रखने का एक और मौका मिला। लेकिन तय तारीख पर वे सुनवाई में नहीं पहुंचे और न ही कोई अतिरिक्त जवाब दिया। इतना ही नहीं, इसके बाद उन्होंने लंबे समय तक यह जानने की भी कोशिश नहीं की कि उनकी आपत्तियों पर क्या फैसला हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे हालात में यह नहीं कहा जा सकता कि अधिकारियों ने जानबूझकर जमीन मालिकों को सुनवाई का मौका नहीं दिया। रिकॉर्ड में भी ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे लगे कि उनका सुनवाई का अधिकार छीना गया।।
जमीन मालिकों ने खुद नहीं निभाई जिम्मेदारी: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ अधिकार होना ही काफी नहीं है, उसका इस्तेमाल भी करना पड़ता है। अगर किसी को लगता है कि उसकी आपत्तियों पर सुनवाई बाकी है, तो उसे समय रहते अधिकारियों के सामने अपनी बात रखनी चाहिए। लेकिन इस मामले में जमीन मालिक न तो तय तारीख पर पहुंचे और न ही बाद में दोबारा सुनवाई का मौका मांगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अधिकारी किसी व्यक्ति को बार-बार बुलाकर उसकी आपत्ति पर दलील देने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। अगर जमीन मालिक खुद सुनवाई में हिस्सा नहीं लेता, तो अधिकारी यह मान सकता है कि उसे अपनी लिखित आपत्तियों के अलावा और कुछ नहीं कहना है। ऐसे में बाद में यह कहना सही नहीं होगा कि उसे सुनवाई का मौका नहीं मिला।
वैकल्पिक जमीन की दलील भी नहीं मानी
सुनवाई के दौरान जमीन मालिकों ने यह भी कहा कि मेट्रो डिपो के लिए उनकी जमीन लेने की जरूरत नहीं थी। उनके मुताबिक सरकार के पास दूसरी जमीन उपलब्ध थी और उसी का इस्तेमाल किया जा सकता था। इसलिए उनकी जमीन का अधिग्रहण जरूरी नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट ने यह दलील भी स्वीकार नहीं की। कोर्ट ने कहा कि :
‘किसी सार्वजनिक परियोजना के लिए कौन-सी जमीन सबसे उपयुक्त रहेगी, इसका फैसला सरकार और संबंधित विभाग करते हैं। कोर्ट का काम यह तय करना नहीं है कि सरकार किसी दूसरी जमीन का इस्तेमाल करती या नहीं। जब तक यह साबित न हो कि फैसला पूरी तरह मनमाना है या कानून के खिलाफ है, तब तक कोर्ट ऐसे मामलों में दखल नहीं देगा।’
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे यह लगे कि सरकार ने किसी खास व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए जमीन चुनी या सार्वजनिक उद्देश्य के बजाय किसी दूसरे कारण से अधिग्रहण किया। इसलिए सिर्फ यह कह देने से कि दूसरी जमीन उपलब्ध थी, अधिग्रहण गैरकानूनी नहीं हो जाता।
‘मेट्रो परियोजना को सार्वजनिक हित का काम माना’
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जयपुर मेट्रो जैसी परियोजनाएं सीधे आम लोगों की जरूरत से जुड़ी होती हैं। ऐसे प्रोजेक्ट के लिए सरकार कानून के तहत जमीन का अधिग्रहण कर सकती है। अगर पूरी प्रक्रिया कानून के मुताबिक अपनाई गई है, तो सिर्फ इसलिए जमीन अधिग्रहण रद्द नहीं किया जा सकता कि कुछ जमीन मालिक उससे सहमत नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर किसी बड़े सरकारी प्रोजेक्ट में काफी समय बाद दखल दिया जाए, तो उसका असर पूरी परियोजना पर पड़ सकता है और परियोजना का काम प्रभावित हो सकता है। इसलिए ऐसे मामलों में कोर्ट यह भी देखता है कि उसके फैसले से आम लोगों के हित और प्रोजेक्ट पर कोई बुरा असर तो नहीं पड़ेगा।
राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर
सुप्रीम कोर्ट ने जयपुर मेट्रो के दूसरे चरण के लिए जमीन अधिग्रहण को सही ठहराते हुए राजस्थान हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले पर भी मुहर लगा दी।
कोर्ट ने कहा कि डिवीजन बेंच ने मामले के रिकॉर्ड, जमीन अधिग्रहण की पूरी प्रक्रिया और कानून के प्रावधानों का सही तरीके से मूल्यांकन किया था। इसलिए उसके फैसले में दखल देने की कोई जरूरत नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जयपुर मेट्रो परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में ऐसी कोई कमी सामने नहीं आई, जिसकी वजह से पूरे अधिग्रहण को रद्द किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला
इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने जमीन मालिकों की अपील खारिज कर दी और जयपुर मेट्रो के कार डिपो के लिए 27 हेक्टेयर जमीन के अधिग्रहण को बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में अधिकारियों की ऐसी कोई बड़ी गलती नहीं मिली, जिसके आधार पर जमीन अधिग्रहण को गैरकानूनी माना जाए। रिकॉर्ड से यह भी साबित नहीं होता कि जमीन मालिकों को अपनी बात रखने का उचित मौका नहीं दिया गया। इसलिए इस मामले में जमीन अधिग्रहण रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले को बरकरार रखते हुए जमीन मालिकों की सभी अपीलें खारिज कर दीं।
जमीन अधिग्रहण के मामलों के लिए अहम फैसला
यह फैसला सिर्फ जयपुर मेट्रो परियोजना तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि जमीन अधिग्रहण के मामलों में सुनवाई का अधिकार जरूर है, लेकिन जमीन मालिकों को भी उस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से हिस्सा लेना होगा।
अगर कोई व्यक्ति खुद सुनवाई में शामिल नहीं होता और बाद में भी कोई कदम नहीं उठाता, तो बाद में सिर्फ यह कहकर जमीन अधिग्रहण को चुनौती नहीं दी जा सकती कि उसे सुनवाई का मौका नहीं मिला।
साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी दोहराया कि किसी सार्वजनिक परियोजना के लिए कौन-सी जमीन चुनी जाएगी, यह सरकार का नीतिगत फैसला है। जब तक यह साबित नहीं होता कि निर्णय कानून के खिलाफ या पूरी तरह मनमाना है, तब तक कोर्ट ऐसे फैसलों में दखल नहीं देगा।