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खनन कंपनियों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका: ASP तय करने की सरकार की व्यवस्था पूरी तरह वैध, राजस्व की चोरी रोकने वाले नियम बरकरार; किर्लोस्कर की याचिका खारिज

Supreme Court Upholds Mineral ASP Calculation Rules, Rejects Kirloskar Ferrous Challenge

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने लौह अयस्क समेत दूसरे खनिजों की औसत बिक्री कीमत यानी एवरेज सेल प्राइस (एएसपी) तय करने के तरीके को लेकर अहम फैसला सुनाया है।

सुप्रीम कोर्ट ने खनन कंपनियों को बड़ा झटका देते हुए कहा है कि रॉयल्टी, डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन (डीएमएफ) और नेशनल मिनरल एक्सप्लोरेशन ट्रस्ट (एनएमईटी) में जमा की जाने वाली रकम को बिक्री मूल्य से अलग करके एएसपी तय करने की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार ने यह व्यवस्था राजस्व की चोरी रोकने के लिए बनाई है और इसमें कोई कानूनी खामी नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:

‘टैक्स और रॉयल्टी से जुड़े मामलों में सरकार को नियम बनाने का अधिकार है। अगर किसी नियम का मकसद राजस्व की सुरक्षा करना और गड़बड़ियों पर रोक लगाना है तो सिर्फ इस आधार पर उसे असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता कि उससे कंपनियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि आर्थिक नीतियों में तब तक दखल नहीं दिया जा सकता, जब तक वे स्पष्ट रूप से कानून या संविधान का उल्लंघन न करती हों।’

जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस जे.बी. पारदीवाला की बेंच ने यह फैसला किर्लोस्कर फेरस इंडस्ट्रीज लिमिटेड की याचिका खारिज करते हुए सुनाया। कंपनी ने वर्ष 2016 और 2017 के नियमों को चुनौती देते हुए कहा था कि एएसपी निकालते समय रॉयल्टी, डीएमएफ और एनएमईटी की रकम को बिक्री मूल्य में शामिल करने से कंपनियों को ‘रॉयल्टी पर रॉयल्टी’ जैसा अतिरिक्त भुगतान करना पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह दलील स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

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क्या था पूरा मामला?

पूरा विवाद लौह अयस्क की औसत बिक्री कीमत (एएसपी) तय करने के तरीके से जुड़ा था। एएसपी वही आधार है, जिसके हिसाब से खनन कंपनियों को रॉयल्टी देनी होती है। किर्लोस्कर फेरस इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2016 और 2017 के नियमों में एएसपी निकालने का जो तरीका तय किया है, वह कानून के खिलाफ है।

कंपनी की आपत्ति उन नियमों पर थी, जिनमें साफ कहा गया है कि बिक्री मूल्य तय करते समय रॉयल्टी, डीएमएफ और एनएमईटी में जमा की गई रकम को अलग नहीं किया जाएगा। कंपनी का कहना था कि इससे एएसपी बढ़ जाता है और उसी बढ़े हुए एएसपी के आधार पर फिर रॉयल्टी की गणना होती है। इससे कंपनियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है।

याचिका में यह भी कहा गया कि इस व्यवस्था से हर महीने रॉयल्टी की गणना बढ़ती जाती है और एक तरह से ‘रॉयल्टी पर रॉयल्टी’ देने जैसी स्थिति बन जाती है। कंपनी ने इसे कानून और संविधान दोनों के खिलाफ बताया था।

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कंपनी ने कोयले के नियमों का हवाला दिया

किर्लोस्कर फेरस इंडस्ट्रीज ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि केंद्र सरकार पहले ही कोयले के मामले में ऐसी व्यवस्था बदल चुकी है। वर्ष 2020 में नियमों में संशोधन कर यह तय किया गया कि कोयले की वास्तविक बिक्री कीमत निकालते समय रॉयल्टी, डीएमएफ और एनएमईटी जैसी वैधानिक देनदारियों को अलग रखा जाएगा।

कंपनी ने यह भी दलील दी कि खान मंत्रालय की ओर से गठित एक समिति ने भी इस व्यवस्था में बदलाव की सिफारिश की थी। समिति का मानना था कि मौजूदा तरीके से अतिरिक्त भुगतान का असर पड़ता है। इसके बाद सार्वजनिक सुझाव भी मांगे गए और नियम बदलने का प्रस्ताव भी सामने आया, लेकिन दूसरे खनिजों के लिए कोई संशोधन नहीं किया गया।

कंपनी का कहना था कि जब सरकार खुद इस समस्या को स्वीकार कर चुकी है तो लौह अयस्क और दूसरे खनिजों के लिए पुराने नियम लागू रखना उचित नहीं है।

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सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की दलील

केंद्र सरकार ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि कंपनियां जिस ‘रॉयल्टी पर रॉयल्टी’ की बात कर रही हैं, वह वास्तविक व्यवस्था में होती ही नहीं है।

सरकार ने बताया कि औसत बिक्री कीमत हर महीने उस महीने के वास्तविक बिक्री आंकड़ों के आधार पर तय होती है। पिछले महीने की कीमत अगले महीने में नहीं जुड़ती, इसलिए किसी तरह का लगातार बढ़ने वाला अतिरिक्त बोझ पैदा नहीं होता।

सरकार ने यह भी कहा कि अगर कंपनियों की मांग मान ली गई तो राज्यों को भारी राजस्व नुकसान होगा। आने वाले वर्षों में सिर्फ लौह अयस्क से ही हजारों करोड़ रुपये की कमी आ सकती है और यदि दूसरे खनिजों को भी जोड़ दिया जाए तो यह नुकसान लाखों करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।

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सुप्रीम कोर्ट ने क्यों नहीं मानी कंपनी की दलील?

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कंपनियों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है या नहीं?, बल्कि अहम सवाल यह है कि क्या सरकार को राजस्व की सुरक्षा के लिए ऐसा नियम बनाने का अधिकार है?

कोर्ट ने इस सवाल का जवाब “हां” में दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संसद और सरकार को टैक्स, रॉयल्टी और दूसरे वित्तीय मामलों में नीतियां बनाने का पूराअधिकार है। अगर कोई नियम इस उद्देश्य से बनाया गया है कि राजस्व की चोरी रोकी जा सके और कोई कंपनी हिसाब-किताब में हेरफेर करके कम भुगतान न कर सके, तो सिर्फ इस वजह से उसे असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता कि उससे कुछ कंपनियों को ज्यादा रकम चुकानी पड़ रही है।

कोर्ट ने कहा कि कानून बनाने वाली संस्था सिर्फ टैक्स या रॉयल्टी लगाने का ही अधिकार नहीं रखती, बल्कि वह ऐसे नियम भी बना सकती है जो टैक्स या रॉयल्टी की चोरी रोकने में मदद करें। अगर ऐसे नियम नहीं होंगे तो कई लोग अलग-अलग तरीके अपनाकर सरकार के राजस्व को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

‘रॉयल्टी पर रॉयल्टी’ का तर्क भी ठुकराया

किर्लोस्कर फेरस इंडस्ट्रीज का सबसे बड़ा दावा था कि मौजूदा व्यवस्था में कंपनियों को ‘रॉयल्टी पर रॉयल्टी’ देनी पड़ती है। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को भी स्वीकार नहीं किया।

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की उस दलील से सहमति जताई कि औसत बिक्री कीमत हर महीने नए सिरे से तय होती है। यह पिछले महीने के आंकड़ों पर आधारित नहीं होती। इसलिए कंपनियों की ओर से बताया गया लगातार बढ़ते अतिरिक्त भुगतान का गणित वास्तविक व्यवस्था से मेल नहीं खाता।

कोर्ट ने कहा कि हर महीने का एएसपी उस महीने की वास्तविक बिक्री और बाजार कीमत के आधार पर तय होता है। ऐसे में यह कहना सही नहीं है कि एक महीने का भुगतान अगले महीने की रॉयल्टी का हिस्सा बन जाता है।

हर खनिज के लिए एक जैसे नियम जरूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुनवाई के दौरान कंपनी ने यह भी कहा कि जब केंद्र सरकार ने कोयले के लिए नियम बदल दिए हैं तो दूसरे खनिजों के लिए भी वही व्यवस्था लागू होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह दलील भी खारिज कर दी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अलग-अलग खनिजों के लिए अलग व्यवस्था बनाना सरकार का नीतिगत फैसला है। सिर्फ इसलिए कि कोयले के लिए अलग नियम हैं, यह नहीं कहा जा सकता कि लौह अयस्क या दूसरे खनिजों के लिए मौजूदा नियम अपने आप गैरकानूनी हो जाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नीति बनाना सरकार का काम है और जब तक उसमें स्पष्ट मनमानी या कानून का उल्लंघन साबित नहीं होता, तब तक कोर्ट उसमें दखल नहीं देगा।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि वर्ष 2016 और 2017 के जिन नियमों को चुनौती दी गई थी, वे संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19(1)(ग) का उल्लंघन नहीं करते। साथ ही वे खान और खनिज (विकास एवं विनियमन) कानून की सीमा से बाहर भी नहीं हैं।

इसी आधार पर जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस जे.बी. पारदीवाला की बेंच ने किर्लोस्कर फेरस इंडस्ट्रीज लिमिटेड की याचिका खारिज कर दी और केंद्र सरकार के नियमों को बरकरार रखा।

कोर्ट ने साफ कर दिया कि औसत बिक्री कीमत तय करने के मौजूदा तरीके में किसी तरह की कानूनी खामी नहीं है और राजस्व की सुरक्षा के लिए बनाए गए ऐसे नियमों में न्यायिक हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है।

फैसले से राज्यों और माइनिंग सेक्टर पर असर

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देश के पूरे माइनिंग सेक्टर के लिए अहम है। अब यह साफ हो गया है कि औसत बिक्री कीमत तय करने का मौजूदा तरीका आगे भी लागू रहेगा और कंपनियां रॉयल्टी, डीएमएफ तथा एनएमईटी की रकम को बिक्री मूल्य से अलग करने की मांग नहीं कर सकेंगी।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि एएसपी तय करने की मौजूदा व्यवस्था कानून के मुताबिक है। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि यदि कंपनियों की मांग मान ली जाती तो आने वाले वर्षों में सिर्फ लौह अयस्क से ही हजारों करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो सकता था। दूसरे खनिजों को जोड़ने पर यह नुकसान और भी अधिक हो सकता है।

साथ ही यह फैसला माइनिंग से जुड़े दूसरे मामलों के लिए भी एक अहम कानूनी सिद्धांत तय करता है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि आर्थिक और राजस्व से जुड़ी नीतियों में कोर्ट तभी हस्तक्षेप करेगा, जब वे संविधान या कानून का स्पष्ट उल्लंघन करती हों। केवल यह कहना कि किसी नियम से आर्थिक बोझ बढ़ गया है, उसे रद्द कराने का आधार नहीं बन सकता।

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