राजस्थान हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी: अनुच्छेद 227 का प्रयोग वैधानिक अपील का विकल्प नहीं, असाधारण परिस्थितियों में ही होगा हस्तक्षेप
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 226 एवं 227 के तहत न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं को स्पष्ट करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला दिया है।
न्यायालय ने कहा कि यदि किसी पक्षकार के पास उपलब्ध वैधानिक अपील (Statutory Appeal) का प्रभावी उपाय था, लेकिन उसने उसका उपयोग नहीं किया, तो वह बाद में किसी अन्य पक्ष द्वारा दायर अपील में पारित आदेश को चुनौती नहीं दे सकता।
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 227 के तहत (Supervisory Jurisdiction) की शक्ति का उपयोग वैधानिक अपील का विकल्प (Substitute for Appeal) नहीं बनाया जा सकता।
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने अयूब सोढ़ा की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह रिपोर्टेबल फैसला दिया है।
क्या है पूरा मामला?
बीकानेर निवासी सुरेन्द्र कुमार सेठिया ने सिविल अदालत में वाद दायर कर दावा किया कि वह विवादित भूमि का वैध पट्टाधारी (Patta Holder) है।
सेठिया ने वाद में आरोप लगाया कि राज्य सरकार एवं लोक निर्माण विभाग (PWD) उक्त भूमि पर सड़क निर्माण करना चाहते हैं, जबकि वह उसकी निजी संपत्ति है।
वाद में अदालत से मांग की गई कि प्रतिवादियों को भूमि में हस्तक्षेप करने से रोका जाए।
वाद लंबित रहने के दौरान अयूब सोढ़ा ने आदेश 1 नियम 10 सीपीसी के तहत आवेदन पेश कर स्वयं को प्रतिवादी बनाए जाने की मांग की।
याचिकाकर्ता का कहना था कि संबंधित भूमि वास्तव में सार्वजनिक मार्ग (Public Way) का हिस्सा है और यदि निजी व्यक्ति को संरक्षण दिया गया, तो आम जनता के आवागमन तथा प्रशासनिक कार्यों में बाधा उत्पन्न होगी।
हाईकोर्ट ने अयूब सोढ़ा का आवेदन स्वीकार करते हुए उन्हें प्रतिवादी बना लिया।
ट्रायल कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक का घटनाक्रम
प्रारंभ में ट्रायल कोर्ट ने अस्थायी निषेधाज्ञा (Temporary Injunction) देने से इनकार कर दिया।
इसके विरुद्ध वादी ने आदेश 43 सीपीसी के तहत अपील दायर की।
अपीलीय अदालत ने साइट प्लान, निरीक्षण रिपोर्ट एवं रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए माना कि वादी के पक्ष में प्रथम दृष्टया मामला (Prima Facie Case) बनता है। इसलिए मामला पुनः ट्रायल कोर्ट को भेज दिया गया।
पुनः सुनवाई के बाद 30 मई 2012 को ट्रायल कोर्ट ने विवादित भूमि के संबंध में यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखने का आदेश पारित किया।
इस आदेश के विरुद्ध राज्य सरकार ने अपील दायर की, जिसे बाद में जिला अदालत ने स्वीकार कर लिया।
इसके खिलाफ वादी ने राजस्थान हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की।
हाईकोर्ट ने यह कहते हुए मामला पुनः अपीलीय न्यायालय को भेज दिया कि पहले विलंब माफी (Limitation Act की धारा 5) के आवेदन का निर्णय होना आवश्यक था।
बाद में अपीलीय न्यायालय ने दोबारा सुनवाई करते हुए 2 मई 2023 को राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी।
याचिकाकर्ता की सबसे बड़ी चूक क्या रही?
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में विशेष रूप से कहा कि अयूब सोढ़ा स्वयं इस मुकदमे में पक्षकार थे।
ट्रायल कोर्ट के 30 मई 2012 के आदेश के विरुद्ध उनके पास भी स्वतंत्र रूप से अपील करने का वैधानिक अधिकार था, लेकिन उन्होंने कभी वह अपील दायर नहीं की।
कोर्ट ने कहा कि अयूब सोढ़ा ने आदेश को अपने विरुद्ध अंतिम (Final) होने दिया।
बाद में जब राज्य सरकार की अपील खारिज हुई, तब उन्होंने सीधे अनुच्छेद 226 एवं 227 के तहत हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर दी।
दूसरे की अपील में अधिकार नहीं मिल जाता
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सिर्फ इसलिए कि राज्य सरकार ने अपील दायर की थी, याचिकाकर्ता को उस अपीलीय निर्णय को चुनौती देने का अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता।
यदि कोई पक्षकार स्वयं उपलब्ध वैधानिक अपील का उपयोग नहीं करता, तो वह बाद में दूसरे प्रतिवादी द्वारा दायर अपील के निर्णय को चुनौती नहीं दे सकता।
अपीलीय कार्यवाही केवल उसी पक्ष के अधिकारों तक सीमित रहती है, जिसने अपील दायर की है।
अनुच्छेद 227 पर महत्वपूर्ण टिप्पणी
जस्टिस फरजंद अली ने कहा कि अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट की शक्ति न तो अपीलीय (Appellate) है और न ही रिविजनल (Revisional)।
कोर्ट ने कहा कि इसका उद्देश्य केवल अधीनस्थ न्यायालयों को उनके अधिकार क्षेत्र की सीमा में रखना है।
एकलपीठ ने कहा कि इस शक्ति का प्रयोग केवल तब किया जाता है, जब आदेश में स्पष्ट अधिकार क्षेत्र की त्रुटि (Jurisdictional Error), प्रत्यक्ष अवैधता (Patent Illegality), गंभीर विकृति (Manifest Perversity) अथवा न्याय का स्पष्ट दुरुपयोग (Miscarriage of Justice) दिखाई दे।
हाईकोर्ट ने कहा कि जहां प्रभावी वैधानिक अपील उपलब्ध हो, वहां अनुच्छेद 227 का सहारा लेकर उस प्रक्रिया को दरकिनार नहीं किया जा सकता।
स्टेटस-क्वो आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध रिकॉर्ड, साइट निरीक्षण रिपोर्ट तथा अन्य सामग्री के आधार पर न्यायिक विवेक का प्रयोग करते हुए यथास्थिति बनाए रखने का आदेश पारित किया था।
रिकॉर्ड से ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया, जिससे यह कहा जा सके कि आदेश में कोई स्पष्ट कानूनी त्रुटि, अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण अथवा न्यायिक विकृति मौजूद थी।
जिसके आधार पर हाईकोर्ट अनुच्छेद 227 के तहत हस्तक्षेप कर सके।
रिट याचिका खारिज, लेकिन अन्य कानूनी उपाय खुले
इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने रिट याचिका को मेरिट रहित (Devoid of Merit) मानते हुए खारिज कर दिया।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस याचिका के खारिज होने से याचिकाकर्ता कानून के तहत उपलब्ध अन्य वैधानिक उपायों से वंचित नहीं होगा।
यदि परिस्थितियां उपयुक्त हों, तो वह सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 39 नियम 4 (Order XXXIX Rule 4 CPC) के तहत उपलब्ध उपाय अपना सकता है।