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वैज्ञानिकों की पदोन्नति पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: कोर्ट नहीं तय कर सकता प्रमोशन का नया फॉर्मूला, एक्सपर्ट कमेटी के मूल्यांकन में दखल नहीं, योग्यता का फैसला कमेटी करेगी

Supreme Court Upholds Expert Committee's Role in CSIR Scientists' Promotions, Rejects Judicial Formula

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च में वैज्ञानिकों के प्रमोशन को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद पर बड़ा और स्पष्ट फैसला सुनाते हुए कहा है कि प्रमोशन का तरीका और मूल्यांकन का फॉर्मूला कोर्ट तय नहीं कर सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने वैज्ञानिकों की पदोन्नति (प्रमोशन) से जुड़े एक अहम मामले में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि कोर्ट या ट्रिब्यूनल किसी सेवा नियम में ऐसा नया फॉर्मूला नहीं जोड़ सकते, जो उसमें पहले से मौजूद ही नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर प्रमोशन नियमों में एपीआर/पीएमएस और वर्क रिपोर्ट के अंकों का औसत (एवरेज) निकालने का कोई प्रावधान नहीं है, तो कोर्ट खुद ऐसा फॉर्मूला नहीं जोड़ सकता। किसी वैज्ञानिक को प्रमोशन देना है या नहीं, इसका फैसला विशेषज्ञ असेसमेंट कमेटी ही करेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:

प्रमोशन के नियमों में जो लिखा है, कोर्ट उसी का पालन करा सकता है, उसमें नया फॉर्मूला नहीं जोड़ सकता। किसी वैज्ञानिक की पदोन्नति के लिए वह उपयुक्त है या नहीं, यह तय करना विशेषज्ञ असेसमेंट कमेटी का काम है।

जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने यह फैसला काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर) की अपील पर सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (सीएटी) और कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले रद्द करते हुए कहा कि दोनों ने प्रमोशन नियमों की गलत व्याख्या कर दी थी।

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क्या था पूरा मामला?

मामला काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर) के वैज्ञानिक डॉ. अनिल अर्नेस्ट की पदोन्नति से जुड़ा था। उनका दावा था कि वह वर्ष 2012 से ही सीनियर साइंटिस्ट बनने के पात्र थे, लेकिन उन्हें प्रमोशन वर्ष 2015 से दिया गया।

डॉ. अर्नेस्ट का कहना था कि उनके एनुअल परफॉर्मेंस रिपोर्ट (एपीआर) और परफॉर्मेंस मैपिंग स्कीम (पीएमएस) में लगातार 90 प्रतिशत से अधिक अंक रहे। लेकिन असेसमेंट कमेटी ने उनकी वर्क रिपोर्ट का मूल्यांकन करते हुए 82 प्रतिशत अंक दिए, जो प्रमोशन के लिए तय 85 प्रतिशत से कम थे।

वैज्ञानिक का तर्क था कि अगर एपीआर/पीएमएस के अंक और वर्क रिपोर्ट के अंक का औसत निकाला जाए, तो उनका स्कोर 85 प्रतिशत से ऊपर पहुंच जाता है। इसलिए उन्हें पहले की तारीख से प्रमोशन मिलना चाहिए।

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सीएटी और हाईकोर्ट ने क्या कहा?

केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने वैज्ञानिक की दलील स्वीकार कर ली। ट्रिब्यूनल ने माना कि एपीआर/पीएमएस और वर्क रिपोर्ट के अंकों का औसत 85 प्रतिशत से अधिक बनता है। इसलिए उसने वैज्ञानिक को पदोन्नति देने का निर्देश दिया।

बाद में कर्नाटक हाईकोर्ट ने भी इस राय से सहमति जताई। हालांकि, उसने सीधे प्रमोशन देने का आदेश नहीं दिया। हाईकोर्ट ने CSIR को समीक्षा विभागीय पदोन्नति समिति (रिव्यू डीपीसी) बुलाकर मामले पर नए सिरे से फैसला करने का निर्देश दिया।

इन्हीं दोनों आदेशों को चुनौती देते हुए काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

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वैज्ञानिकों की पदोन्नति का नियम क्या कहता है?

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च के प्रमोशन नियमों को विस्तार से समझाया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस विवाद को समझने के लिए पहले काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च के प्रमोशन नियमों को समझना जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सीएसआईआर के साइंटिस्ट्स रिक्रूटमेंट एंड प्रमोशन रूल्स, 2001 और वर्ष 2011 में किए गए संशोधन (सर्कुलर) को विस्तार से समझा।

कोर्ट ने कहा कि वैज्ञानिकों की पदोन्नति दो अलग-अलग चरणों में होती है:

  • पहले चरण में इंटरनल स्क्रीनिंग कमेटी वैज्ञानिक के एपीआर/पीएमएस रिकॉर्ड की जांच करती है कि कौन वैज्ञानिक प्रमोशन के लिए पात्र है। अगर वह तय मानकों पर खरा उतरता है, तभी उसका मामला अगले चरण के लिए भेजा जाता है।
  • दूसरे चरण में विशेषज्ञों की असेसमेंट कमेटी वैज्ञानिक की वर्क रिपोर्ट और अन्य रिकॉर्ड का मूल्यांकन कर यह तय करती है कि वह वास्तव में प्रमोशन के योग्य है या नहीं।

कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि नियमों में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि एपीआर/पीएमएस और वर्क रिपोर्ट के अंकों का औसत निकालना जरूरी है। केवल यह कहा गया है कि दोनों को ध्यान में रखा जाएगा।

‘कोर्ट नया फॉर्मूला नहीं जोड़ सकता’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नियमों में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि एपीआर/पीएमएस और वर्क रिपोर्ट के अंकों का औसत निकालकर प्रमोशन का फैसला किया जाएगा।

कोर्ट ने कहा कि सीएटी और हाईकोर्ट ने अपने फैसले में ऐसा फॉर्मूला जोड़ दिया, जो नियमों में था ही नहीं। ऐसा करना कानून की व्याख्या नहीं, बल्कि नियम में नए शब्द जोड़ने जैसा है, जिसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।

कोर्ट ने साफ कहा कि नियम केवल इतना कहते हैं कि असेसमेंट कमेटी एपीआर/पीएमएस और वर्क रिपोर्ट दोनों पर विचार करेगी। लेकिन दोनों को किस तरह महत्व देना है या कितने अंक देने हैं, इसका कोई गणितीय फॉर्मूला नियमों में नहीं दिया गया है।

‘वैज्ञानिक की योग्यता तय करना विशेषज्ञों का काम’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी वैज्ञानिक का काम केवल अंकों से नहीं आंका जा सकता।

कई बार कोई वैज्ञानिक बहुत जटिल शोध पर काम कर रहा होता है, जिसका परिणाम तुरंत दिखाई नहीं देता। वहीं कोई दूसरा वैज्ञानिक अपेक्षाकृत आसान विषय पर बेहतर परिणाम हासिल कर सकता है। ऐसे में केवल अंक देखकर दोनों की तुलना नहीं की जा सकती।

इसी कारण नियमों ने यह जिम्मेदारी विशेषज्ञ असेसमेंट कमेटी को दी है, जिसमें संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ शामिल होते हैं। ऐसे मामलों में किस वैज्ञानिक का प्रदर्शन प्रमोशन के योग्य है, इसका फैसला वही बेहतर तरीके से कर सकती है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रमोशन का मूल्यांकन एक तकनीकी और विशेषज्ञता वाला काम है, जिसे संबंधित क्षेत्र के एक्सपर्ट्स पर ही छोड़ना चाहिए।

पक्षपात या दुर्भावना साबित नहीं हुई: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में यह भी साफ किया कि असेसमेंट कमेटी में शामिल सदस्य अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ होते हैं और उन्हें उम्मीदवार की योग्यता और काम का बेहतर आकलन करने की क्षमता होती है।

कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में कोर्ट को हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए, जब तक कि कोई स्पष्ट दुर्भावना (मलाफाइड) या नियमों का उल्लंघन सामने न आए।

इस केस में कोर्ट ने पाया कि असेसमेंट कमेटी के खिलाफ किसी तरह का दुर्भावना (माला फाइड) का आरोप नहीं था, इसलिए उनके निर्णय को चुनौती देने का कोई ठोस आधार नहीं बनता।

इतना ही नहीं, बाद में इसी वैज्ञानिक को अगली असेसमेंट में प्रमोशन भी मिल गया था। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि कमेटी ने उनके साथ पक्षपात किया था।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीएटी और कर्नाटक हाईकोर्ट ने सीएसआईआर के प्रमोशन नियमों की गलत व्याख्या की। दोनों ने नियमों में ऐसा औसत (एवरेज) निकालने का तरीका जोड़ दिया, जिसका कहीं कोई प्रावधान नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट ने सीएसआईआर की अपील को स्वीकार करते हुए साफ कहा कि:

  • एपीआर/पीएमएस और वर्क रिपोर्ट के अंकों का औसत निकालने का कोई नियम नहीं है।
  • प्रमोशन का फैसला एक्सपर्ट असेसमेंट कमेटी के विवेक पर निर्भर करेगा।
  • कोर्ट्स अपने स्तर पर नया मूल्यांकन फॉर्मूला लागू नहीं कर सकतीं।

इसी आधार पर कोर्ट ने दोनों फैसले रद्द कर दिए और वैज्ञानिक की मूल याचिका भी खारिज कर दी।

फैसले का असर

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सिर्फ सीएसआईआर केवल एक व्यक्ति के प्रमोशन विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे सरकारी और अर्ध-सरकारी संस्थानों में प्रमोशन प्रक्रिया के लिए एक अहम दिशा तय करता है। यह फैसला उन सभी मामलों में अहम है जहां कर्मचारी प्रमोशन के लिए कोर्ट में चुनौती देते हैं और गणितीय या वैकल्पिक मूल्यांकन तरीकों की मांग करते हैं।

कोर्ट के इस फैसले से साफ हो गया है कि अगर सेवा नियमों में कोई तरीका तय नहीं है, तो कोर्ट या ट्रिब्यूनल अपने स्तर पर नया नियम या नया फॉर्मूला नहीं जोड़ सकते।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि कर्मचारी प्रमोशन के योग्य है या नहीं, इसका फैसला विशेषज्ञ समिति का होता है। अगर उसके निर्णय में नियमों का उल्लंघन, मनमानी या दुर्भावना साबित नहीं होती, तो कोर्ट उसमें हस्तक्षेप नहीं करेगा।

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