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राजस्थान ADJ भर्ती: सुप्रीम कोर्ट ने इंटरव्यू कटऑफ को सही ठहराया, कहा- भर्ती में शामिल होने के बाद नियमों को चुनौती नहीं दे सकते; उम्मीदवार की अपील खारिज, हाईकोर्ट का फैसला बरकरार

Supreme Court Upholds Rajasthan ADJ Recruitment, Says Failed Candidate Cannot Challenge Rules After Participating

नई दिल्ली: राजस्थान हाईकोर्ट की अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (एडीजे) भर्ती को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है।

सुप्रीम कोर्ट ने भर्ती इंटरव्यू में तय न्यूनतम अंकों (कटऑफ) के नियम को सही ठहराते हुए साफ कहा कि कोई उम्मीदवार भर्ती के नियमों को जानते हुए परीक्षा और इंटरव्यू में शामिल होने के बाद असफल होने पर उन्हीं नियमों को चुनौती नहीं दे सकता।

इसी के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए उम्मीदवार की अपील खारिज कर दी।

यह मामला राजस्थान में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (एडीजे) भर्ती के दौरान इंटरव्यू में 25 फीसदी न्यूनतम अंक अनिवार्य करने के नियम से जुड़ा है। उम्मीदवार का चयन इंटरव्यू में तय न्यूनतम अंक नहीं मिलने के कारण नहीं हो पाया था, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने कहा कि भर्ती प्रक्रिया उस समय लागू नियमों के अनुसार पूरी हुई थी। जो उम्मीदवार उन्हीं नियमों के तहत परीक्षा और इंटरव्यू में शामिल होते हैं, वे बाद में असफल होने पर उन नियमों को चुनौती नहीं दे सकते। कई साल बाद पूरी चयन प्रक्रिया या पहले से हो चुकी नियुक्तियों में दखल देना भी सही नहीं होगा।

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आधे अंक से शुरू हुआ पूरा विवाद

यह विवाद राजस्थान न्यायिक सेवा नियम, 2010 के तहत अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (एडीजे) की भर्ती से जुड़ा है। शुरुआत में वर्ष 2010 में भर्ती निकाली गई थी, लेकिन कुछ विवादों के बाद पूरी चयन प्रक्रिया रद्द कर दी गई। इसके बाद वर्ष 2011 में नई भर्ती निकाली गई। इसी दौरान राज्य सरकार ने नियमों में संशोधन कर इंटरव्यू में कम से कम 25 फीसदी अंक लाना अनिवार्य कर दिया।

याचिकाकर्ता मनोज गोयल ने लिखित परीक्षा में अच्छे अंक हासिल किए और इंटरव्यू के लिए चुने गए। लिखित और इंटरव्यू के कुल अंकों में उनका स्थान 39 रिक्तियों के मुकाबले 11वां था। लेकिन इंटरव्यू में उन्हें 30 में से सिर्फ 7 अंक मिले, जबकि चयन के लिए कम से कम 7.5 अंक जरूरी थे। केवल आधे अंक से पीछे रहने के कारण उनका चयन नहीं हुआ।

इसके बाद मनोज गोयल पहले कुछ अन्य उम्मीदवारों के साथ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। वहां से राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर करने की छूट मिलने के बाद उन्होंने हाईकोर्ट में नियम को चुनौती दी।

राजस्थान हाईकोर्ट ने यह कहते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी कि जिस नियम को चुनौती दी गई थी, उसे सरकार पहले ही हटा चुकी है। भर्ती प्रक्रिया भी पूरी हो चुकी थी और चयनित उम्मीदवारों की नियुक्तियां अंतिम हो चुकी थीं।

इसके बाद मनोज गोयल ने हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

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राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजस्थान हाईकोर्ट ने मामले में कोई कानूनी गलती नहीं की। जिस नियम को मनोज गोयल ने चुनौती दी थी, उसे सरकार पहले ही हटा चुकी थी। ऐसे में उस नियम की वैधता पर अलग से फैसला देने की जरूरत नहीं रह गई थी।

कोर्ट ने यह भी कहा कि भर्ती प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और चयनित उम्मीदवार कई वर्षों से न्यायिक सेवा में काम कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में अब नियुक्तियों में दखल देने का कोई आधार नहीं बनता। इसलिए राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है।

असफल होने के बाद भर्ती नियमों पर सवाल नहीं उठा सकते

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कोई उम्मीदवार भर्ती के नियमों को जानते हुए परीक्षा और इंटरव्यू में शामिल होता है, तो बाद में चयन नहीं होने पर उन्हीं नियमों पर सवाल नहीं उठा सकता या बाद में असफल होने पर उन्हीं नियमों को चुनौती नहीं दे सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून का साफ सिद्धांत है कि उम्मीदवार पहले चयन प्रक्रिया में भाग ले और बाद में परिणाम आने पर नियमों पर सवाल उठाए, यह स्वीकार नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि मनोज गोयल ने भी 2011 में संशोधित नियमों के तहत परीक्षा और इंटरव्यू दिया था। इसलिए चयन नहीं होने के बाद उस नियम को गलत बताकर राहत नहीं मांगी जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने इंटरव्यू कटऑफ को सही माना

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश का पद बेहद जिम्मेदारी वाला होता है। ऐसे पद के लिए सिर्फ लिखित परीक्षा के अंक ही काफी नहीं होते। इंटरव्यू के जरिए यह भी देखा जाता है कि उम्मीदवार में फैसले लेने की क्षमता, व्यवहार, समझ-बूझ और न्यायिक पद के लिए जरूरी दूसरे गुण हैं या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे महत्वपूर्ण पदों के लिए इंटरव्यू में न्यूनतम अंक तय करना गलत नहीं है। इसका मकसद ऐसे उम्मीदवारों का चयन करना है, जिनमें न्यायिक पद की जिम्मेदारियां निभाने की जरूरी क्षमता और योग्यता हो।

10 साल पुरानी नियुक्तियों में दखल से इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वर्ष 2013 में चयनित उम्मीदवार पिछले एक दशक से अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में काम कर रहे हैं। अगर अब चयन सूची बदली जाती है या नए सिरे से नियुक्तियां की जाती हैं, तो पूरी वरिष्ठता व्यवस्था प्रभावित होगी। इससे उन अधिकारियों के अधिकारों पर भी असर पड़ेगा, जो वर्षों से सेवा दे रहे हैं।

कोर्ट ने कहा कि यदि इतने वर्षों बाद राहत दी जाती है तो उसी भर्ती में शामिल दूसरे असफल उम्मीदवार भी इसी तरह के दावे लेकर कोर्ट पहुंच सकते हैं। इससे अनावश्यक मुकदमों की बाढ़ आ जाएगी और पूरी भर्ती व्यवस्था प्रभावित होगी।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने मनोज गोयल की सिविल अपील खारिज कर दी और राजस्थान हाईकोर्ट के 8 फरवरी 2018 के फैसले को बरकरार रखा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता इंटरव्यू में तय न्यूनतम अंक हासिल नहीं कर सके, इसलिए उन्हें नियुक्ति का कोई कानूनी अधिकार नहीं मिलता। इसी के साथ कोर्ट ने साफ कर दिया कि भर्ती प्रक्रिया उस समय लागू नियमों के अनुसार पूरी हुई थी और अब उसमें दखल देने का कोई आधार नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला सिर्फ राजस्थान ही नहीं, बल्कि देशभर में सरकारी भर्तियों से जुड़े मामलों में भी अहम है।

कोर्ट के इस फैसले से स्पष्ट हो गया है कि भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने के बाद उम्मीदवार केवल असफल होने के आधार पर नियमों को चुनौती नहीं दे सकते। साथ ही, जब भर्ती प्रक्रिया पूरी हो जाए और चयनित उम्मीदवार लंबे समय से सेवा दे रहे हों, तब कोर्ट बिना ठोस कानूनी कारण के नियुक्तियों में दखल नहीं देगा।

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