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सेवानिवृत्त न्यायाधीश राष्ट्र की ‘बावड़ियां’, जो संकट में समाज को दिशा देते हैं, न्यायपालिका को ऐसा लंगर बनना चाहिए जो तूफानों में भी समाज को स्थिरता दे सके: CJI जस्टिस सूर्यकांत

Retired Judges Are Nation’s ‘Stepwells’, Judiciary Must Be an Anchor in Storms: CJI Justice Surya Kant

जयपुर। भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि सेवानिवृत्त न्यायाधीश देश की अमूल्य धरोहर हैं और उन्हें केवल सम्मान देकर विदा कर देना पर्याप्त नहीं है। उनका अनुभव, ज्ञान और न्यायिक विवेक राष्ट्र निर्माण, वैकल्पिक विवाद निस्तारण (ADR), लोक अदालतों और कानूनी जागरूकता अभियानों में सक्रिय रूप से उपयोग किया जाना चाहिए।

वे जयपुर में Association of Retired Chief Justices and Judges of India, ICOST India तथा राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे।

इस मौके पर CJI ने दुष्यंत के शेर की पंक्तियां भी कहीं-

“वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है
माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है

सामान कुछ नहीं है फटे-हाल है मगर
झोले में उस के पास कोई संविधान है

उस सर-फिरे को यूँ नहीं बहला सकेंगे आप
वो आदमी नया है मगर सावधान है”

रिटायरमेंट अंत नहीं, नई सेवा की शुरुआत”

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्यायाधीश जब सेवा निवृत्त होते हैं तो अक्सर समाज उन्हें सम्मानित कर विदा कर देता है, लेकिन यह मान लेना कि उनकी भूमिका समाप्त हो गई, एक बड़ी भूल है।

उन्होंने कहा कि न्यायाधीश भले पद से निवृत्त हो जाएं, लेकिन उनका अनुभव कभी सेवानिवृत्त नहीं होता।

उन्होंने कहा कि वर्षों तक समाज, कानून, मानवीय व्यवहार और जटिल विवादों को समझने वाले न्यायाधीशों की बुद्धिमत्ता देश के लिए एक राष्ट्रीय संपत्ति है, जिसे निष्क्रिय छोड़ देना सार्वजनिक हित के विरुद्ध होगा।

“मीडिएशन और लोक अदालतें ही करोड़ों लोगों के लिए असली न्याय”

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि वे “Alternative Dispute Resolution” शब्द से पूरी तरह सहमत नहीं हैं, क्योंकि इससे ऐसा लगता है मानो वास्तविक न्याय कहीं और होता है और यह केवल विकल्प मात्र हैं।

उन्होंने कहा कि मेडिएशन, लोक अदालत, आर्बिट्रेशन और कंसिलिएशन करोड़ों भारतीयों के लिए न्याय का सबसे सुलभ माध्यम हैं। ये ऐसे मंच हैं जहां लोगों को उनकी भाषा में, कम समय में और कम खर्च में न्याय मिलता है।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि किसी भी मुकदमे में अदालत जाने से पहले पक्षकारों को पहले मेडिएशन सेंटर का दरवाजा खटखटाना चाहिए। यदि समझौता हो जाए तो वर्षों की मुकदमेबाजी से बचा जा सकता है।

सेवानिवृत्त जज निभा सकते हैं चार बड़ी भूमिकाएं

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि पूर्व न्यायाधीश न्याय व्यवस्था को चार प्रमुख क्षेत्रों में मजबूत कर सकते हैं—

मध्यस्थ और पंच के रूप में – पारिवारिक, व्यावसायिक और दीवानी विवादों का शीघ्र समाधान।

कानूनी शिक्षक के रूप में – स्कूलों, कॉलेजों, पंचायतों और विश्वविद्यालयों में नागरिक अधिकारों की जानकारी देना।

प्रि-लिटिगेशन काउंसलर के रूप में – मुकदमा बनने से पहले विवादों को सुलझाना।

मार्गदर्शक के रूप में – नई पीढ़ी के वकीलों, मध्यस्थों और न्यायिक अधिकारियों को प्रशिक्षण देना।

उन्होंने कहा कि न्यायपालिका हर न्यायाधीश के रिटायर होने के साथ संस्थागत स्मृति खो देती है, इसलिए इस अनुभव को संरक्षित करना आवश्यक है।

राष्ट्रीय रजिस्ट्र्री बनाने का प्रस्ताव

मुख्य न्यायाधीश ने सुझाव दिया कि देशभर के इच्छुक सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की एक राष्ट्रीय रजिस्ट्री बनाई जानी चाहिए, जो ADR, लोक अदालत और विधिक जागरूकता अभियानों में सेवाएं देने को तैयार हों।

उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों और संबंधित संस्थाओं के बीच समझौता कर इस दिशा में औपचारिक ढांचा तैयार किया जाना चाहिए, ताकि पूर्व न्यायाधीश सम्मानपूर्वक और संस्थागत रूप से समाज सेवा में भाग ले सकें।

“राजस्थान की बावड़ियों जैसे हैं हमारे बुजुर्ग न्यायाधीश”

अपने संबोधन में जस्टिस सूर्यकांत ने राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि राजस्थान में बावड़ियां वर्षा का जल संजोकर रखती हैं और संकट के समय लोगों की प्यास बुझाती हैं।

उन्होंने कहा,

“हमारे बुजुर्ग और अनुभवी न्यायाधीश भी समाज की ऐसी ही बावड़ियां हैं। जब भी न्याय व्यवस्था किसी संकट, जटिल विवाद या मार्गदर्शन की स्थिति में होती है, तब हमें इन्हीं अनुभवी लोगों की ओर देखना चाहिए।

उन्होंने कहा कि एक बुद्धिमान न्यायपालिका इन अनुभवों को केवल दूर से सम्मान नहीं देती, बल्कि उन्हें संरक्षित करती है और समय आने पर उनसे शक्ति प्राप्त करती है।

जनता का न्यायपालिका पर गहरा विश्वास बनाए रखना होगा

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि भारतीय जनता का न्यायपालिका और उससे जुड़ी संस्थाओं पर असाधारण विश्वास है। आम नागरिक अदालत के एक शब्द को भी आदेश और न्याय का प्रतीक मानता है।

उन्होंने कहा कि यह न्यायपालिका की जिम्मेदारी है कि इस विश्वास को बनाए रखे और और अधिक मजबूत करे।

शेरो-शायरी से समापन

अपने संबोधन के अंत में जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि न्यायपालिका केवल भवनों या आदेशों का नाम नहीं, बल्कि आम आदमी की उम्मीद का आधार है। उन्होंने कहा कि जब किसी व्यक्ति के पास कुछ नहीं होता, तब भी उसके झोले में संविधान होता है, और वही उसके अधिकारों की सबसे बड़ी ताकत है।

उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को ऐसा लंगर बनना चाहिए जो तूफानों में भी समाज को स्थिरता दे सके।

सम्मेलन में मौजूद न्यायविदों, सेवानिवृत्त न्यायाधीशों और विधिक विशेषज्ञों ने मुख्य न्यायाधीश के विचारों का स्वागत किया और इसे न्यायिक सुधारों की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया।

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