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फर्जी वसीयत निकली तो भी खरीदार अपराधी नहीं: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

Buyer Not Criminally Liable for Forged Will Linked Property: Supreme Court
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जाली वसीयत से जुड़ी संपत्ति खरीदने वाला व्यक्ति तब तक अपराधी नहीं माना जाएगा जब तक उसकी धोखाधड़ी में भूमिका साबित न हो।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि यदि कोई व्यक्ति संपत्ति खरीदता है और बाद में वह संपत्ति किसी फर्जी या विवादित वसीयत (Will) से जुड़ी पाई जाती है, तो मात्र इस आधार पर खरीदार को आपराधिक मामले में आरोपी नहीं बनाया जा सकता।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि जब तक खरीदार की धोखाधड़ी या जालसाजी में सीधी भूमिका साबित न हो, तब तक उसके खिलाफ आपराधिक मामला चलाना कानून का दुरुपयोग होगा।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला तमिलनाडु की एक जमीन से जुड़ा था, जहां 1988 की एक वसीयत को लेकर विवाद सामने आया। आरोप था कि इस वसीयत के जरिए मृत व्यक्ति की संपत्ति को गलत तरीके से ट्रांसफर किया गया।

इसी कथित वसीयत के आधार पर 1998 में रजिस्टर्ड सेल डीड के जरिए कई लोगों को जमीन बेची गई। बाद में इस वसीयत को जाली बताते हुए खरीदारों में से एक व्यक्ति को भी आरोपी बना दिया गया।

खरीदार पर IPC की कई धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया, जिनमें धोखाधड़ी (cheating), जालसाजी (forgery) और आपराधिक साजिश (criminal conspiracy) शामिल थे। आरोप था कि उसने फर्जी वसीयत के आधार पर संपत्ति खरीदी और इस पूरे षड्यंत्र का हिस्सा था।

खरीदार को हाईकोर्ट ने नहीं मिली राहत

आरोपी खरीदार ने मद्रास हाईकोर्ट का रुख किया और केस को रद्द (quash) करने की मांग की। उसने दलील दी कि उसने पूरी जांच-पड़ताल के बाद वैध तरीके से संपत्ति खरीदी और उसका फर्जी वसीयत से कोई संबंध नहीं है।

उसने अदालत में दलील दी कि उसने जमीन पूरी कानूनी प्रक्रिया के तहत खरीदी थी। उसने विक्रेता के टाइटल की जांच की और वैध भुगतान (consideration) किया। उसका कहना था कि न तो वह वसीयत तैयार करने में शामिल था और न ही उसे यह जानकारी थी कि वसीयत कथित रूप से जाली है। इसलिए उसे आपराधिक मामले में घसीटना गलत है।

लेकिन मद्रास हाईकोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था। हाईकोर्ट ने यह कहते हुए राहत देने से इनकार कर दिया कि मामले में तथ्यों को लेकर विवाद है और इसकी सुनवाई ट्रायल में ही होनी चाहिए।

इसी के खिलाफ आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

SC की सख्त टिप्पणी: बिना सबूत केस नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई भी सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि खरीदार वसीयत की जालसाजी में शामिल था या उसे इसकी जानकारी थी।

अदालत ने स्पष्ट कहा कि केवल इस आधार पर कि संपत्ति का संबंध बाद में किसी विवादित दस्तावेज से निकलता है, खरीदार को आरोपी नहीं बनाया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर वसीयत जाली साबित होती है, तो सबसे ज्यादा नुकसान खुद खरीदार को ही होगा, क्योंकि उसकी संपत्ति पर अधिकार ही संदिग्ध हो जाएगा।

कोर्ट का स्पष्ट रुख: धोखाधड़ी साबित होना जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसले Mohammed Ibrahim v. State of Bihar का हवाला देते हुए कहा कि धोखाधड़ी जैसे अपराध में यह साबित करना जरूरी होता है कि आरोपी ने जानबूझकर किसी को धोखा दिया या धोखाधड़ी में सक्रिय भूमिका निभाई।

सिर्फ शक या अनुमान के आधार पर किसी को आपराधिक मामले में शामिल नहीं किया जा सकता।

अदालत ने कहा कि इस तरह के मामलों में अगर बिना सबूत के खरीदारों को आरोपी बनाया जाता है, तो यह न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। कोर्ट ने यह भी माना कि सिविल विवादों को आपराधिक केस में बदलना एक खतरनाक प्रवृत्ति है, जिसे रोका जाना जरूरी है।

फाइनल फैसला: खरीदार को राहत

सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम आदेश में मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और खरीदार के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को खत्म कर दिया।

अदालत ने साफ कहा कि इस मामले में आरोपी के खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य नहीं है और ऐसे में उसे ट्रायल का सामना करने के लिए मजबूर करना गलत होगा।

यह फैसला संपत्ति खरीदने वाले लोगों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है। कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल विवादित वसीयत से जुड़ी संपत्ति खरीदने के आधार पर किसी को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता।

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