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राजस्थान हाईकोर्ट में सीनियर एडवोकेट की नियुक्ति की कवायद: 192 आवेदनों में से 13 महिला अधिवक्ताओं के आवेदन, पारदर्शिता, प्रक्रिया और विशेषाधिकारों पर विस्तृत विश्लेषण

Rajasthan High Court Senior Advocate Designation 2026: 192 Lawyers Apply After 4 Years

जयपुर। राजस्थान की न्यायिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है—सीनियर एडवोकेट (वरिष्ठ अधिवक्ता) के रूप में नामांकन।

यह न केवल वकालत के क्षेत्र में उत्कृष्टता का प्रतीक है, बल्कि विधिक पेशे में अनुभव, ज्ञान और प्रतिष्ठा का सर्वोच्च सम्मान भी माना जाता है।

हाल ही में राजस्थान हाईकोर्ट में सीनियर एडवोकेट के पद के लिए कुल 193 अधिवक्ताओं ने आवेदन किया था, जिनमें से एक अधिवक्ता द्वारा आवेदन वापस लेने के बाद अब यह संख्या 192 रह गई है।

यह प्रक्रिया 27 फरवरी 2026 को जारी नोटिस के बाद शुरू हुई थी और 31 मार्च 2026 तक आवेदन आमंत्रित किए गए थे।

यह संख्या अपने आप में इस पद की प्रतिष्ठा और वकालत जगत में इसकी अहमियत को दर्शाती है।

4 साल बाद-ACJ की पहल

राजस्थान हाईकोर्ट के वर्तमान कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा की पहल पर एक बार फिर से राजस्थान हाईकोर्ट में सीनियर एडवोकेट के लिए आवेदन मांगे गए.

वर्ष 2022 के बाद करीब 4 साल बाद राजस्थान के अधिवक्ताओं को सीनियर एडवोकेट नामित होंगे.

उल्लेखनीय है कि इससे पहले 25 जनवरी 2022 को आखिरी बार 26 अधिवक्ताओं को सीनियर एडवोकेट का दर्जा प्रदान किया गया था, जिनमें गायत्री राठौड़ एकमात्र महिला थीं।

इस कवायद में मई का प्रथम सप्ताह बहुत महत्वूपर्ण होने वाला हैं क्योकि कमेटी जयपुर में होगी और वह इन आवेदनों पर विचार करेंगी

सीनियर एडवोकेट: एक सम्मानजनक पहचान

देश की न्यायिक प्रणाली में अधिवक्ताओं को मुख्यतः दो वर्गों में विभाजित किया गया है—साधारण अधिवक्ता और सीनियर एडवोकेट।

‘अधिवक्ता अधिनियम, 1961’ की धारा 16 के तहत यह व्यवस्था की गई है।

सीनियर एडवोकेट वह अधिवक्ता होता है जिसे उसकी कानूनी दक्षता, अनुभव, विशेष ज्ञान और बार में प्रतिष्ठा के आधार पर उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय द्वारा नामित किया जाता है।

यह पद केवल अनुभव का परिणाम नहीं होता, बल्कि यह उस अधिवक्ता की विधिक समझ, न्यायिक योगदान और समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारी का प्रतिबिंब होता है।

राजस्थान हाईकोर्ट में वर्तमान प्रक्रिया: बढ़ती प्रतिस्पर्धा

राजस्थान हाईकोर्ट में इस बार 192 अधिवक्ताओं का आवेदन करना इस बात का संकेत है कि युवा और अनुभवी वकील इस सम्मान को पाने के लिए उत्सुक हैं।

इस प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय है—इस बार 13 महिला अधिवक्ताओं ने भी आवेदन किया है।

यह न्यायिक क्षेत्र में लैंगिक समानता की दिशा में सकारात्मक संकेत है, हालांकि अभी भी यह संख्या कुल आवेदनों की तुलना में काफी कम है।

आवेदन करने वाले कुल 192 अधिवक्ताओं में सबसे पुराने नाम वर्ष 1962 के पंजीकृत अधिवक्ता पी.एन. भंडारी हैं। इसके अलावा 1964 के प्रकाश चंद्र जैन और 1968 के आसु सिंह शेखावत भी उम्मीदवार हैं।

इस सूची में सबसे युवा वर्ष 2010 की अधिवक्ता वर्षा बिस्सा और माही यादव हैं। एक आवेदक (राहुल कमवार) ने अपना आवेदन वापस ले लिया है।

वर्ष के आधार पर अधिवक्ताओं की सूची

1960 का दशक
1962 – पी.एन. भंडारी
1964 – प्रकाश चंद्र जैन
1968 – आसु सिंह शेखावत

1970 का दशक
1972 – संतोष कुमार जैन
1975 – राजेंद्र प्रसाद गर्ग
1976 – शिव चरण गुप्ता, गिरिराज बर्धर
1978 – हनुमान चौधरी
1979 – अशोक कुमार पारीक

1980 का दशक
1980 – रोशन लाल सेठी
1981 – पी.के. कसलीवाल
1982 – मोहम्मद अशफाक खान, महेश कुमार गुप्ता
1983 – प्रह्लाद सिंह, राम किशन शर्मा
1984 – अमोद कसलीवाल, वीरेंद्र कुमार अग्रवाल, रामिंद्र सिंह सलूजा
1985 – हेम राज सोनी, संजय महरिश
1987 – धर्मवीर थोलीया, लीला धर खत्री, सुनील त्यागी
1988 – आर.के. डागा, मुकेश कुमार अग्रवाल, रवि डांगी, निर्मल कुमार गोयल
1989 – मनु भार्गव, ब्रह्मानंद सांदू, नरेश बत्रा

1990 का दशक
1990 – आज़ाद अहमद, लखन लाल गुप्ता, पंकज मेहता, संदीप भंडावत
1991 – चिरंजी लाल सैनी, रिनेश कुमार गुप्ता, दुर्गा प्रसाद शर्मा
1992 – भानु प्रकाश माथुर, अनुराग शर्मा, संजय मेहला
1993 – जावेद खान मोयल, सी.एस. कोटवानी, विनय जैन, राजलक्ष्मी सिंह चौधरी
1994 – दिनेश यादव, भीम कांत व्यास
1995 – अश्विनी कुमार छोबिसा, विकास जैन
1996 – विजय चौधरी, जय प्रकाश गुप्ता
1997 – राकेश कुमार, संदीप सरूपरिया, राजेश शाह
1998 – मनीष गुप्ता, मंजीत कौर
1999 – पंकज गुप्ता, रघुनंदन शर्मा, सरांश सैनी, दीपक मेनारिया

2000 का दशक
2000 – कपिल प्रकाश माथुर, समीत बिश्नोई, सतीश कुमार खंडेलवाल
2001 – पंकज शर्मा, सुरुचि कसलीवाल, ओम प्रकाश मिश्रा
2002 – शीतल कुंभट, मनीष कुमार
2003 – आलोक चतुर्वेदी, तनवीर अहमद, सिद्धार्थ रंका
2004 – राहुल कमवार, विवेक डांगी, अमोल व्यास
2005 – नितिन जैन, शोभित तिवारी
2006 – जसवंत पर्सोया, राजवेंद्र सरस्वत
2007 – विनय कोठारी, लोकेश माथुर
2008 – संदीप सिंह शेखावत, शरद कोठारी
2009 – सज्जन सिंह राठौड़, बी.एस. अजातशत्रु सिंह मीणा

2010 के बाद
2010 – अंकुर माथुर
2011 – माही यादव, वर्षा बिस्सा

13 महिला अधिवक्ताओं ने किया आवेदन

देशभर में पिछले कुछ सालों में महिला अधिवक्ताओं को वरिष्ठ अधिवक्ता नामित करने में तेजी गई है। राजस्थान को पहली महिला अधिवक्ता मिलने में ही करीब 7 दशक का समय लगा है।

लेकिन इस बार 13 महिला अधिवक्ताओं के आवेदन से उम्मीद है कि इस बार यह संख्या अधिक होगी।

इस सूची में महिला अधिवक्ताओं की सूची अनीता अग्रवाल, सुसान मैथ्यू , नैना सराफ, माही यादव, सुरुचि कसलीवाल, वर्षा बिस्सा, राजलक्ष्मी सिंह चौधरी, क्षमा पुरोहित, मंजीत कौर, शालिनी श्योराण , सुदेश पंवार शामिल हैं.

जयपुर के अधिवक्ताओं की बड़ी संख्या

आवेदन करने वाले अधिवक्ताओं में राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर में प्रैक्टिसिंग 125 अधिवक्ता हैं, वहीं जोधपुर से जुड़े करीब 65+ अधिवक्ता हैं।

जयपुर के अधिवक्ताओं में सबसे पुराने वर्ष 1962 के पंजीकृत अधिवक्ता हैं, वहीं सबसे युवा वर्ष 2011 की माही यादव हैं।

जयपुर के अधिवक्ताओं में सबसे अधिक नाम 1990–2000 दशक में हैं। यह सूची स्पष्ट रूप से दिखाती है कि जयपुर में अनुभव और नई पीढ़ी दोनों का संतुलन है।

जोधपुर से मिड-सीनियर और सीनियर वर्ग के अधिक अधिवक्ता

जोधपुर से आवेदन करने वाले अधिवक्ताओं में सबसे वरिष्ठ 1980 के पंजीकृत अधिवक्ता हैं, वहीं सबसे युवा वर्ष 2011 की वर्षा बिस्सा हैं।

सबसे अधिक अधिवक्ता 1990–2005 के बीच हैं, जो कि मुख्यतः मिड-सीनियर और सीनियर वर्ग का मजबूत प्रतिनिधित्व है

नियर एडवोकेट बनने की प्रक्रिया: पारदर्शिता की दिशा में सुधार

सीनियर एडवोकेट की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर वर्षों से पारदर्शिता की मांग उठती रही है। इसी संदर्भ में 2017 में आए एक ऐतिहासिक निर्णय ने इस प्रक्रिया को नया स्वरूप दिया।

इस निर्णय के तहत हर उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में एक स्थायी समिति (Permanent Committee) का गठन अनिवार्य किया गया। इस समिति में शामिल होते हैं:

मुख्य न्यायाधीश, दो वरिष्ठतम न्यायाधीश, एडवोकेट जनरल / अटॉर्नी जनरल , बार का एक प्रतिष्ठित सदस्य

यह समिति आवेदन की जांच करती है और उम्मीदवारों का मूल्यांकन करती है।

मूल्यांकन प्रणाली: अंक-आधारित चयन

नई प्रक्रिया में चयन के लिए एक पॉइंट-बेस्ड सिस्टम अपनाया गया है, जिसमें कुल 100 अंकों के आधार पर अधिवक्ताओं का मूल्यांकन किया जाता है। इसमें शामिल हैं:

पेशेवर दक्षता, कानूनी ज्ञान, प्रकाशित लेख और अकादमिक योगदान, महत्वपूर्ण मामलों में भूमिका, प्रो बोनो कार्य (निःशुल्क सेवा)
साक्षात्कार.

यह प्रणाली इस बात को सुनिश्चित करती है कि चयन केवल व्यक्तिगत संपर्क या सिफारिश पर नहीं, बल्कि योग्यता के आधार पर हो।

2023 में किए गए महत्वपूर्ण बदलाव

2023 में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया में कुछ महत्वपूर्ण संशोधन किए, जिनका उद्देश्य इसे और अधिक न्यायसंगत और व्यावहारिक बनाना था।

प्रकाशित लेखों के लिए अंक 15 से घटाकर 5 किए गए. जजमेंट्स और प्रो बोनो कार्य के लिए अंक 40 से बढ़ाकर 50 किए गए
इंटरव्यू के 25 अंक बरकरार रखे गए. विविधता और नई पीढ़ी के वकीलों को प्रोत्साहन दिया गया

इन बदलावों का उद्देश्य यह था कि केवल लेखन या अकादमिक कार्य ही नहीं, बल्कि वास्तविक न्यायिक योगदान को अधिक महत्व दिया जाए।

सीनियर एडवोकेट के विशेषाधिकार

सीनियर एडवोकेट बनने के बाद अधिवक्ता को कई विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं, जो उन्हें अन्य अधिवक्ताओं से अलग पहचान देते हैं।

  1. उच्च फीस -सीनियर एडवोकेट की फीस सामान्य अधिवक्ताओं से अधिक होती है और वे प्रति सुनवाई शुल्क लेते हैं।
  2. विशेष वेशभूषा – उनकी यूनिफॉर्म अलग होती है, जो उनके वरिष्ठ दर्जे को दर्शाती है।

हालांकि विशेषाधिकारों के साथ कुछ सीमाएँ भी होती हैं—

वे सीधे केस फाइल नहीं कर सकते, उन्हें किसी जूनियर या एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड के माध्यम से ही पेश होना होता है
वे सीधे क्लाइंट से संपर्क नहीं कर सकते.यह व्यवस्था इस उद्देश्य से बनाई गई है कि सीनियर एडवोकेट केवल जटिल कानूनी मुद्दों और रणनीति पर ध्यान केंद्रित करें।

फुल कोर्ट की भूमिका: अंतिम निर्णय

सीनियर एडवोकेट के चयन में अंतिम निर्णय फुल कोर्ट द्वारा लिया जाता है। स्थायी समिति द्वारा चयनित नामों को फुल कोर्ट के सामने रखा जाता है, जहां सभी न्यायाधीश मिलकर निर्णय लेते हैं। यदि सहमति नहीं बनती है, तो मतदान के जरिए फैसला किया जाता है।

गुप्त मतदान और पारदर्शिता

सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि गुप्त मतदान केवल विशेष परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए और इसके कारण भी दर्ज किए जाने चाहिए। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समिति द्वारा किए गए मूल्यांकन का सम्मान किया जाए और निर्णय निष्पक्ष हो।

क्या जज सिफारिश कर सकते हैं?

एक महत्वपूर्ण सुधार यह किया गया है कि अब कोई भी न्यायाधीश किसी अधिवक्ता के नाम की सिफारिश नहीं करेगा।

यह कदम इसलिए उठाया गया ताकि प्रक्रिया में पक्षपात की संभावना समाप्त हो और चयन पूरी तरह योग्यता-आधारित हो।

अनुभव की शर्त

सीनियर एडवोकेट बनने के लिए न्यूनतम 10 वर्षों का अनुभव आवश्यक है। हालांकि, असाधारण प्रतिभा वाले युवा अधिवक्ताओं को भी अवसर दिया जा सकता है, विशेषकर यदि वे 45 वर्ष से कम आयु के हों।

विविधता और लैंगिक समानता की आवश्यकता

इस बार राजस्थान हाईकोर्ट में 13 महिला अधिवक्ताओं द्वारा आवेदन किया जाना एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन यह संख्या अभी भी कम है।

न्यायपालिका ने स्वयं इस बात को स्वीकार किया है कि अधिक महिला वकीलों को प्रोत्साहन मिलना चाहिए, पहली पीढ़ी के वकीलों को अवसर दिया जाना चाहिए, विविध पृष्ठभूमि से आने वाले अधिवक्ताओं को शामिल किया जाना चाहिए, ट्राइब्यूनल विशेषज्ञों को भी मौका दिया जाना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि जो अधिवक्ता NCLT, TDSAT जैसे ट्राइब्यूनलों में विशेषज्ञता रखते हैं, उन्हें केवल इस आधार पर वंचित नहीं किया जाना चाहिए कि उनकी सुप्रीम कोर्ट में उपस्थिति कम है।

स्वतः संज्ञान से नामांकन

फुल कोर्ट के पास यह अधिकार भी है कि वह बिना आवेदन के भी किसी अधिवक्ता को सीनियर एडवोकेट के रूप में नामित कर सकती है, यदि वह सभी आवश्यक मानदंडों को पूरा करता है।

प्रक्रिया की नियमितता: एक बड़ी चुनौती

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि यह प्रक्रिया नियमित रूप से होनी चाहिए, लेकिन कई हाईकोर्ट में वर्षों तक यह प्रक्रिया नहीं होती, जिससे योग्य अधिवक्ताओं को अवसर नहीं मिल पाता।

इस बार राजस्थान हाईकोर्ट में बड़ी संख्या में आवेदन आना इस बात का संकेत है कि लंबे समय बाद यह प्रक्रिया सक्रिय हुई है।

न्यायिक सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

राजस्थान हाईकोर्ट में सीनियर एडवोकेट नामांकन की यह प्रक्रिया न केवल एक प्रशासनिक कार्यवाही है, बल्कि यह न्यायिक सुधार और पारदर्शिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

192 आवेदनों के बीच चयन करना निश्चित रूप से चुनौतीपूर्ण होगा, लेकिन नई पारदर्शी और अंक-आधारित प्रणाली यह सुनिश्चित करती है कि योग्यतम अधिवक्ताओं को ही यह सम्मान मिले।

यह प्रक्रिया यह भी दर्शाती है कि भारतीय न्यायपालिका समय के साथ स्वयं को सुधारने और अधिक जवाबदेह बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।

सीनियर एडवोकेट का पद केवल एक उपाधि नहीं, बल्कि यह न्याय, सेवा और उत्कृष्टता का प्रतीक है—और इस सम्मान को प्राप्त करने वाले अधिवक्ता न केवल अपने पेशे में बल्कि समाज में भी एक उदाहरण स्थापित करते हैं।

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