नई दिल्ली: हेट स्पीच (घृणास्पद भाषण) के मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा है कि पुलिस द्वारा स्वतः (suo motu) FIR दर्ज न करना अपने आप में अदालत की अवमानना (Contempt of Court) नहीं माना जा सकता।
न्यायमूर्ति जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने साफ कहा कि अगर किसी पक्ष ने पहले पुलिस के पास शिकायत या सबूत ही नहीं रखा, तो सीधे अवमानना याचिका दाखिल करना उचित नहीं है।
कोर्ट के मुताबिक बिना शिकायत और सामग्री के यह मान लेना कि पुलिस ने जानबूझकर कार्रवाई नहीं की, गलत है। ऐसे मामलों में अवमानना की कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती
याचिकाकर्ताओं की दलील क्या थी?
मामला हेट स्पीच से जुड़े मामलों में दायर अवमानना याचिकाओं से संबंधित था। कोर्ट का यह फैसला Ashwini Kumar Upadhyaya v. Union of India से जुड़े मामलों में आया है, जिनमें देशभर में बढ़ते हेट स्पीच के मामलों पर सख्त कार्रवाई की मांग की गई थी।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट के 2022 और 2023 के आदेशों के अनुसार पुलिस को हेट स्पीच मामलों में स्वतः FIR दर्ज करनी चाहिए। उनका आरोप था कि ऐसा न करना कोर्ट के आदेशों की अवमानना है।
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि पुलिस का यह कर्तव्य है कि वह बिना शिकायत के भी हेट स्पीच के मामलों में FIR दर्ज करे।
वहीं राज्य की ओर से कहा गया कि बिना किसी शिकायत या ठोस सामग्री के, पुलिस पर स्वतः कार्रवाई का आरोप नहीं लगाया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया तर्क
कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की इस दलील को ‘बहुत व्यापक और असंगत’ (overly broad and untenable) बताया।
कोर्ट ने कहा कि पहले दिए गए आदेशों का मकसद केवल यह सुनिश्चित करना था कि पुलिस अपने कानूनी कर्तव्यों का पालन करे और उचित मामलों में तुरंत कार्रवाई करे, न कि हर मामले में स्वतः FIR दर्ज करना अनिवार्य बना दिया जाए।
SC का स्पष्ट रुख: ‘पहले शिकायत, फिर कार्रवाई’
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर किसी व्यक्ति ने पहले पुलिस के पास जाकर शिकायत ही नहीं की या कोई सामग्री प्रस्तुत नहीं की, तो सीधे अवमानना का आरोप लगाना उचित नहीं है।
अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में यह मान लेना कि पुलिस ने आदेश का उल्लंघन किया है, पूरी तरह गलत होगा।
इस फैसले के साथ कोर्ट ने अवमानना कानून के दायरे को स्पष्ट किया है कि अवमानना का सहारा लेने से पहले संबंधित अधिकारियों के पास जाना जरूरी है।
अवमानना के लिए क्या जरूरी है?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अवमानना तभी मानी जाएगी जब पुलिस को संज्ञेय अपराध की जानकारी हो और फिर भी वह जानबूझकर कार्रवाई न करे।
लेकिन यदि शिकायत ही नहीं दी गई हो या सबूत प्रस्तुत न किए गए हों, तो ‘हिचकिचाहट’ या ‘अवज्ञा’ मानना सही नहीं होगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल FIR दर्ज न करना, बिना अन्य तथ्यों के, अवमानना नहीं माना जा सकता।
कानून पर्याप्त, नए निर्देश की जरूरत नहीं:SC
कोर्ट ने यह भी कहा कि हेट स्पीच से निपटने के लिए मौजूदा कानून पर्याप्त हैं और इस क्षेत्र में कोई ‘कानूनी खालीपन’ (legislative vacuum) नहीं है। इसमें किसी नए कानून या निर्देश की आवश्यकता नहीं है।
कोर्ट ने यह फैसला विधायिका पर छोड़ दिया है। कानून में भविष्य में कोई बदलाव जरूरी है या नहीं यह फैसला संसद और सरकार पर छोड़ा गया है।
अंतिम फैसला: अवमानना याचिकाएं खारिज
कोर्ट ने इन टिप्पणियों के साथ अवमानना याचिकाओं का निपटारा कर दिया और कोई अतिरिक्त निर्देश जारी नहीं किए।
अदालत ने अपने अंतिम आदेश में दोनों अवमानना याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि इस मामले में पुलिस द्वारा किसी प्रकार की जानबूझकर अवहेलना साबित नहीं होती। कोर्ट ने कहा कि पुलिस द्वारा स्वतः FIR दर्ज न करना अपने आप में अवमानना नहीं है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि अवमानना का मामला तभी बनता है, जब यह साबित हो कि अधिकारियों को अपराध की जानकारी थी और फिर भी उन्होंने जानबूझकर कार्रवाई नहीं की।
कोर्ट ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता ने पहले पुलिस के पास जाकर शिकायत या सामग्री प्रस्तुत ही नहीं की, तो अवमानना का अधिकार इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
कोर्ट के इस फैसले से स्पष्ट है कि हर हेट स्पीच मामले में पुलिस की स्वतः कार्रवाई को अवमानना से नहीं जोड़ा जा सकेगा।