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चेक बाउंस मामलों में अपील के दौरान 20% राशि जमा करना हर हाल में अनिवार्य नहीं, यह शर्त स्वतः रूप से लागू नहीं

Rajasthan High Court Rules 20% Deposit Not Mandatory in Cheque Bounce Appeals

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने चेक बाउंस (धारा 138, निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट) से जुड़े मामलों को लेकर एक रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा है कि अपील लंबित रहने के दौरान सजा स्थगन (suspension of sentence) के लिए 20% जुर्माना राशि जमा करना हर हाल में अनिवार्य नहीं है।

हाईकोर्ट ने कहा कि यह शर्त स्वतः (automatic) रूप से लागू नहीं की जा सकती, बल्कि इसके लिए न्यायालय को परिस्थितियों के आधार पर विवेकपूर्ण निर्णय लेना होगा।

जस्टिस अनिल कुमार उपमन की एकल पीठ ने कुनाराम की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया है।

मामला क्या था?

मामले में याचिकाकर्ता कुनाराम, जोधपुर जिले के ओसियां तहसील के निवासी हैं। उनके खिलाफ चेक बाउंस का मामला दर्ज हुआ था, जिसमें ट्रायल कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराते हुए सजा और जुर्माना लगाया। इसके खिलाफ उन्होंने अपील दायर की।

अपील के दौरान अतिरिक्त सत्र न्यायालय, जोधपुर महानगर ने सजा स्थगित करने की अनुमति तो दी, लेकिन शर्त रखी कि याचिकाकर्ता को जुर्माने की राशि का 20% पहले जमा करना होगा।

इसके बाद जब याचिकाकर्ता ने अपनी खराब आर्थिक और स्वास्थ्य स्थिति का हवाला देते हुए इस शर्त से छूट मांगी, तो अदालत ने उसका आवेदन खारिज कर दिया।

इसी आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

याचिकाकर्ता की दलील

याचिकाकर्ता कुनाराम की ओर से उनके अधिवक्ता ने हाईकोर्ट में दलील देते हुए कहा कि अपीलीय अदालत ने कानून की गलत व्याख्या करते हुए 20% जुर्माना राशि जमा करने की शर्त को अनिवार्य मान लिया, जबकि ऐसा नहीं है।

अधिवक्ता ने कहा कि धारा 148, निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट के तहत 20% राशि जमा करने का आदेश तभी दिया जा सकता है, जब शिकायतकर्ता (complainant) इस संबंध में कोई आवेदन प्रस्तुत करे।

वर्तमान मामले में ऐसा कोई आवेदन नहीं किया गया था, फिर भी अदालत ने स्वतः (suo motu) यह शर्त लगा दी, जो विधि-विरुद्ध है।

अधिवक्ता ने दलील दी कि अपीलीय अदालत ने यह मान लिया कि 20% राशि जमा करना एक अनिवार्य (mandatory) प्रावधान है, जबकि वास्तव में यह विवेकाधीन (discretionary) है।

शर्त सामान्य नियम नहीं

याचिकाकर्ता के अनुसार, अदालत को हर मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेना चाहिए, न कि एक सामान्य नियम की तरह सभी मामलों में यह शर्त लागू करनी चाहिए।

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले Jamboo Bhandari बनाम MP State Industrial Development Corporation (2023) का हवाला देते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि 20% जमा करने की शर्त सामान्यतः लागू की जा सकती है, लेकिन विशेष परिस्थितियों में इससे छूट दी जा सकती है।

याचिकाकर्ता ने अपनी गंभीर स्वास्थ्य स्थिति को भी अदालत के समक्ष रखा। उन्होंने बताया कि वे जीवन-घातक बीमारी से ग्रस्त हैं, उनके लीवर और किडनी प्रभावित हैं, और वे लंबे समय से इलाज पर निर्भर हैं। उनकी शारीरिक स्थिति इतनी खराब है कि वे स्वतंत्र रूप से चल-फिर भी नहीं सकते।

अधिवक्ता ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता के पास कोई स्थायी आय का स्रोत नहीं है और वे पूरी तरह अपने परिवार पर निर्भर हैं। ऐसी स्थिति में 20% राशि जमा करना उनके लिए लगभग असंभव है।

याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि यदि यह शर्त लागू रहती है, तो उन्हें सजा भुगतने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जिससे उनका अपील का संवैधानिक अधिकार प्रभावित होगा।

उन्होंने कहा कि सजा स्थगन का उद्देश्य ही यह है कि आरोपी को अपील लंबित रहने तक राहत मिले, ताकि वह प्रभावी रूप से अपना पक्ष रख सके।

प्रतिवादी/शिकायतकर्ता का पक्ष

इस मामले में प्रतिवादी पक्ष में राज्य सरकार और शिकायतकर्ता (महिंद्रा एंड महिंद्रा फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड) शामिल हैं।

दोनों ने अपीलीय अदालत के आदेश का समर्थन करते हुए हाईकोर्ट में अपना पक्ष प्रस्तुत किया।

प्रतिवादी पक्ष ने तर्क दिया कि अपीलीय अदालत द्वारा पारित आदेश कानून के अनुरूप और न्यायसंगत है। उन्होंने कहा कि धारा 148, निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट का उद्देश्य चेक बाउंस मामलों में शिकायतकर्ता के हितों की रक्षा करना है और यह सुनिश्चित करना है कि आरोपी अपील प्रक्रिया का दुरुपयोग न करे।

उन्होंने यह भी कहा कि 20% राशि जमा करने की शर्त कोई असामान्य या कठोर शर्त नहीं है, बल्कि यह एक संतुलन बनाए रखने का साधन है, जिससे आरोपी को राहत भी मिलती है और शिकायतकर्ता के हित भी सुरक्षित रहते हैं।

प्रतिवादी पक्ष का यह भी कहना था कि अपीलीय अदालत को यह अधिकार है कि वह सजा स्थगन के दौरान उचित शर्तें लगाए, ताकि न्याय प्रक्रिया प्रभावित न हो। इसलिए 20% राशि जमा करने की शर्त लगाना अदालत के अधिकार क्षेत्र में आता है।

हालांकि, सुनवाई के दौरान प्रतिवादी पक्ष ने एक वैकल्पिक सुझाव भी दिया। उन्होंने कहा कि यदि हाईकोर्ट को लगता है कि इस मामले में हस्तक्षेप आवश्यक है, तो कम से कम अपीलीय अदालत को यह निर्देश दिया जाए कि वह अपील की सुनवाई को शीघ्रता से पूरा करे और 20% राशि जमा करने की शर्त पर जोर न दे।

हाईकोर्ट का फैसला

दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने जहां अपनी व्यक्तिगत और आर्थिक कठिनाइयों के आधार पर राहत की मांग की, वहीं प्रतिवादी पक्ष ने कानून के उद्देश्य और प्रक्रिया की शुचिता को बनाए रखने पर जोर दिया।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अपीलीय अदालत ने बिना किसी आवेदन (Section 148 NI Act के तहत) के ही 20% राशि जमा करने की शर्त लगा दी।

हाईकोर्ट ने कहा कि यह मान लिया गया कि 20% राशि जमा करना अनिवार्य है, जबकि यह कानून की गलत व्याख्या है।

विशेष प्रावधान लेकिन उद्देश्य अलग

हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 430 BNSS अपीलीय अदालत को सजा स्थगित करने और जमानत देने का अधिकार देती है।

जबकि धारा 148 NI Act एक विशेष प्रावधान है, जो अदालत को 20% राशि जमा करने का निर्देश देने की अनुमति देता है।

ये दोनों प्रावधान अलग-अलग उद्देश्य और क्षेत्र में लागू होते हैं।

अंतिम फैसला

हाईकोर्ट ने कहा कि 20% राशि जमा करना अनिवार्य नहीं है और यह शर्त हर मामले में स्वतः लागू नहीं की जा सकती।

हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 148 के तहत आदेश तभी दिया जाना चाहिए, जब शिकायतकर्ता इस संबंध में आवेदन करे।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश

हाईकोर्ट ने अपीलीय अदालत द्वारा लगाई गई 20% जमा करने की शर्त को रद्द कर दिया।

अपील की सुनवाई बिना 20% जमा करने की शर्त के जारी रखने का निर्देश दिया।

साथ ही, अपीलीय अदालत को 6 महीने के भीतर अपील का निस्तारण करने का निर्देश दिया।

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