नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने रियल एस्टेट सेक्टर में फंसे होमबायर्स को बड़ी राहत देते हुए कहा है कि दिवालिया प्रक्रिया (CIRP) के दौरान जरूरत पड़ने पर “कॉरपोरेट वील” (Corporate Veil) उठाया जा सकता है।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने स्पष्ट किया कि अगर होल्डिंग कंपनी और उसकी ग्रुप/सब्सिडियरी कंपनियां आपस में गहराई से जुड़ी हैं, तो उनकी संपत्तियों को एक साथ देखा जा सकता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में सब्सिडियरी कंपनियों की संपत्तियों को भी Corporate Insolvency Resolution Process (CIRP) में शामिल किया जा सकता है, ताकि प्रोजेक्ट्स को पूरा किया जा सके और होमबायर्स के हितों की रक्षा हो सके।
क्या था पूरा मामला
यह मामला Earth Infrastructures Limited (EIL) नाम की रियल एस्टेट कंपनी से जुड़ा था, जिसके कई हाउसिंग प्रोजेक्ट 2016 के आसपास ठप हो गए थे।
इन प्रोजेक्ट्स को कंपनी ने अलग-अलग सब्सिडियरी कंपनियों के जरिए स्ट्रक्चर किया था, जबकि असल नियंत्रण होल्डिंग कंपनी EIL के पास ही था।
जब कंपनी के खिलाफ 2018 में दिवालिया प्रक्रिया शुरू हुई, तो सवाल उठा कि क्या सब्सिडियरी कंपनियों की संपत्ति को भी इसमें शामिल किया जा सकता है या नहीं।
कहां फंसा मामला?
इस केस में असली विवाद जमीन और प्रोजेक्ट्स के मालिकाना हक को लेकर था।
ग्रेटर नोएडा इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी (GNIDA) का कहना था कि जिन हाउसिंग प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा था, वे कानूनी तौर पर अलग-अलग सब्सिडियरी कंपनियों के नाम पर थे, इसलिए उनकी संपत्तियों को होल्डिंग कंपनी Earth Infrastructures Limited (EIL) की दिवालिया प्रक्रिया में शामिल नहीं किया जा सकता।
इसी तर्क को मानते हुए NCLAT ने पहले से मंजूर रेजोल्यूशन प्लान को रद्द कर दिया।
लेकिन इससे स्थिति और जटिल हो गई, क्योंकि अगर इन सब्सिडियरी कंपनियों की संपत्तियां शामिल नहीं होतीं, तो प्रोजेक्ट्स को पूरा करना मुश्किल हो जाता और हजारों होमबायर्स का पैसा फंस जाता।
यही वजह थी कि मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां इस पूरे विवाद पर कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया।
NCLAT के फैसले पर रोक
कोर्ट ने NCLAT के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि सब्सिडियरी कंपनियों की संपत्तियां होल्डिंग कंपनी की CIRP प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बन सकतीं।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि EIL ही इन प्रोजेक्ट्स के पीछे असली नियंत्रण और संचालन करने वाली कंपनी थी, जबकि सब्सिडियरी कंपनियां केवल औपचारिक संरचना थीं।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अगर कंपनियां केवल कागजों पर अलग दिखाई देती हैं, लेकिन असल में एक ही इकाई की तरह काम करती हैं, तो कानून उनके बीच की दीवार (corporate veil) हटाने की अनुमति देता है।
SC का बड़ा रुख: ‘सब्सिडियरी सिर्फ एक फ्रंट’
सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को गलत ठहराया और कहा कि इस मामले में सब्सिडियरी कंपनियां केवल एक “फ्रंट” की तरह काम कर रही थीं, जबकि असली नियंत्रण होल्डिंग कंपनी के पास था।
अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में कॉरपोरेट वील हटाकर वास्तविक स्थिति को देखना जरूरी है।
होमबायर्स के हित को प्राथमिकता
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि CIRP का उद्देश्य केवल कंपनियों का पुनर्गठन नहीं, बल्कि निवेशकों खासतौर पर होमबायर्स के हितों की रक्षा करना भी है।
अदालत ने माना कि अगर सब्सिडियरी कंपनियों की संपत्ति को शामिल नहीं किया जाएगा, तो प्रोजेक्ट्स पूरे नहीं हो पाएंगे और होमबायर्स को नुकसान होगा।
अदालतों पर टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि NCLAT ने यह मानकर गलती की कि सब्सिडियरी कंपनियों की संपत्ति को शामिल नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि “जहां ग्रुप कंपनियां एक ही इकाई के रूप में काम करती हैं, वहां कॉर्पोरेट वील हटाना जरूरी हो सकता है।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि वास्तविक नियंत्रण और आर्थिक संरचना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
फाइनल फैसला: रेजोल्यूशन प्लान बहाल
सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम आदेश में NCLAT के फैसले को रद्द कर दिया और NCLT द्वारा स्वीकृत रेजोल्यूशन प्लान को बहाल कर दिया।
कोर्ट ने यह भी अनुमति दी कि सफल आवेदक प्रोजेक्ट्स को पूरा कर सकते हैं, जिससे होमबायर्स को राहत मिलेगी।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कॉर्पोरेट कानून और इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण मिसाल है। इससे साफ हो गया है कि अदालतें जरूरत पड़ने पर कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर की आड़ हटाकर न्याय सुनिश्चित करेंगी, खासकर जब हजारों होमबायर्स का भविष्य दांव पर हो।
कोर्ट के इस फैसले से अटके रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स पूरे होने का रास्ता भी साफ हो गया है। यह फैसला साफ करता है कि कंपनियां केवल कानूनी संरचना के पीछे छिपकर जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं।