नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर संपत्ति विवादों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के कोटा मंदिर संपत्ति विवाद पर अहम फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि केवल किसी मंदिर के प्रबंधन या निगरानी (सुपरवाइजरी कंट्रोल) में शामिल होने या पुजारियों की नियुक्ति करने से किसी व्यक्ति या संस्था को उस मंदिर का मालिकाना हक (टाइटल) नहीं मिल जाता।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें कोटा स्थित ‘मूर्ति स्वरूप श्री गोवर्धन नाथ जी’ मंदिर पर एक संस्था के मालिकाना हक को मान्यता दी गई थी।
क्या था मंदिर संपत्ति विवाद मामला?
यह मामला राजस्थान के कोटा स्थित ‘मूर्ति स्वरूप श्री गोवर्धन नाथ जी’ मंदिर से जुड़ा था।
मंदिर पर अधिकार को लेकर विवाद तब शुरू हुआ जब एक संस्था ने दावा किया कि वह लंबे समय से मंदिर का प्रबंधन और देखरेख कर रही है, इसलिए मंदिर पर उसका अधिकार बनता है।
दूसरी ओर, अपीलकर्ता ने कहा कि उनका परिवार पीढ़ियों से मंदिर का संरक्षक (caretaker) रहा है और केवल प्रशासनिक नियंत्रण के आधार पर किसी संस्था को मालिक नहीं माना जा सकता।
राजस्थान हाईकोर्ट ने संस्था के पक्ष में फैसला देते हुए कहा था कि वह मंदिर के प्रबंधन और पुजारियों की नियुक्ति में सक्रिय भूमिका निभाती रही है, इसलिए उसका दावा स्वीकार किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि प्रतिवादी अपने अधिकार साबित नहीं कर पाए, जिसका लाभ संस्था को मिलना चाहिए।
हालांकि, इस दौरान संस्था कोई भी ऐसा दस्तावेज पेश नहीं कर सकी थी, जिससे यह साबित हो सके कि मंदिर पर उसका कानूनी मालिकाना हक है।
SC का रुख: ‘कमजोर बचाव से मजबूत दावा नहीं बनता’
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस दृष्टिकोण को गलत ठहराया।
अदालत ने कहा कि यदि प्रतिवादी अपना मालिकाना हक साबित नहीं कर पाया, तो इसका मतलब यह नहीं कि वादी अपने आप मालिक बन जाएगा।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संपत्ति विवादों में हर पक्ष को अपना स्वतंत्र और वैध अधिकार साबित करना होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा:
“केवल यह तथ्य कि किसी संस्था ने मंदिर के प्रबंधन या निगरानी की भूमिका निभाई है या पुजारियों की नियुक्ति में भाग लिया है, इससे उसे मंदिर का मालिकाना हक नहीं मिल जाता।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी संपत्ति पर अधिकार साबित करने के लिए ठोस और वैध दस्तावेज जरूरी होते हैं। केवल प्रशासनिक भूमिका निभाने से मालिकाना हक स्थापित नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट का फैसला गलत: SC
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने मामले में कानून के सिद्धांतों का सही तरीके से पालन नहीं किया। हाईकोर्ट ने यह मान लिया कि यदि प्रतिवादी अपना दावा साबित नहीं कर पा रहा है, तो इसका फायदा वादी (संस्था) को मिल जाएगा।
शीर्ष अदालत ने इसे गलत ठहराते हुए कहा कि:
- किसी एक पक्ष की कमजोरी से दूसरे पक्ष को स्वतः फायदा नहीं मिल सकता
- वादी को अपना मालिकाना हक खुद साबित करना होता है
- बिना दस्तावेज के सिर्फ प्रबंधन के आधार पर टाइटल नहीं दिया जा सकता
दस्तावेजों की कमी बनी बड़ी वजह
सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि संस्था कोई ऐसा दस्तावेज पेश नहीं कर पाई, जिससे यह साबित हो सके कि मंदिर की संपत्ति कानूनी रूप से उसके नाम समर्पित (dedicated) या हस्तांतरित (vested) की गई थी।
अदालत ने इसे गलत ठहराते हुए कहा कि:
- न तो कोई डीड ऑफ डेडिकेशन (समर्पण पत्र) था
- न कोई एंडोमेंट (दान/समर्पण) का दस्तावेज
- और न ही कोई कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य
जिससे यह साबित हो सके कि मंदिर की संपत्ति संस्था के नाम पर थी।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम आदेश में राजस्थान हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट दोनों के फैसलों को रद्द कर दिया।
अदालत ने कहा कि संस्था मंदिर पर अपना वैध मालिकाना हक साबित करने में असफल रही है, इसलिए केवल प्रबंधन और नियंत्रण के आधार पर उसे अधिकार नहीं दिया जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि संपत्ति विवादों में वैध दस्तावेज और कानूनी साक्ष्य अनिवार्य हैं।
कोर्ट ने पाया कि वादी संस्था मंदिर पर अपना स्वतंत्र मालिकाना हक साबित नहीं कर पाई, इसलिए राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला कानून के अनुरूप नहीं था। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए अपील स्वीकार कर ली।