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जोधपुर ​पुलिस ने 10 युवतियों को बिना FIR रातभर थाने में रखा, हाईकोर्ट ने मामले को सौपा CBI को

Rajasthan High Court Orders CBI Probe Into 8-Year-Old Missing Youth Case, Suggests AI-Generated Age Progression Image

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने जालसाजी और साइबर फ्रॉड से जुड़े एक मामले में पुलिस कार्रवाई पर गंभीर टिप्पणी करते हुए पूरे मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपने के आदेश दिए हैं।

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि प्रथमदृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि पुलिस ने बिना एफआईआर दर्ज किए 10 युवतियों को उनके घरों से उठाकर रातभर थाने में अवैध रूप से रखा और बाद में मामले को वैध ठहराने के लिए एफआईआर दर्ज की गई।

जस्टिस अनिल कुमार उपमन की एकलपीठ ने यह आदेश पीड़ित युवतियों की ओर से दायर आपराधिक याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया है।

हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत फैसले में कहा कि मामले में स्थानीय पुलिस अधिकारियों पर ही गंभीर आरोप हैं, ऐसे में निष्पक्ष जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती।

क्या है मामला

मामले के अनुसार, 16 जनवरी 2025 को कूड़ी भगतासनी थाना पुलिस ने “ऑपरेशन साइबर शील्ड” के तहत एक कथित फर्जी कॉल सेंटर पर कार्रवाई करते हुए कई युवतियों और युवकों को गिरफ्तार किया था।

पुलिस ने दावा किया था कि “पावर ब्रेक डाउन सर्विस इंडिया” नाम से चल रहे कॉल सेंटर से लोगों के साथ ऑनलाइन धोखाधड़ी की जा रही थी। इसके आधार पर एफआईआर संख्या 27/2025 दर्ज की गई थी।

याचिकाकर्ता युवतियों का दावा

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में कहा गया कि वे केवल कॉल सेंटर में काम करने वाली छात्राएं थीं और उन्हें 15 जनवरी की शाम को ही उनके घरों से उठा लिया गया था, जबकि उस समय तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई थी।

आरोप लगाया गया कि पुलिस ने उन्हें पूरी रात थाने में अवैध रूप से रखा और अगले दिन झूठा मामला दर्ज कर गिरफ्तार दिखाया।

CCTV फुटेज और पुलिस रिकॉर्ड में विरोधाभास

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पुलिस स्टेशन और याचिकाकर्ताओं के घरों के CCTV फुटेज मंगवाए।

अदालत ने पाया कि पुलिस अधिकारियों के बयान और रिकॉर्ड में गंभीर विरोधाभास हैं।

पुलिस ने दावा किया कि युवतियों को पूछताछ के बाद रात में छोड़ दिया गया था, लेकिन अदालत को उपलब्ध CCTV फुटेज और जनरल डायरी एंट्री से यह स्पष्ट नहीं हुआ।

अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस स्टेशन का रात 9 बजे के बाद का CCTV फुटेज उपलब्ध नहीं कराया गया, जिससे साक्ष्य मिटाने की आशंका पैदा होती है।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि रिकॉर्ड में कई ऐसी विसंगतियां हैं, जो दस्तावेजों के “गढ़े जाने” की ओर संकेत करती हैं।

महिलाओं की गिरफ्तारी संबंधी कानून का उल्लंघन

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पुलिस की कार्रवाई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 43(5) और धारा 179 का सीधा उल्लंघन है।

अदालत ने कहा कि महिलाओं को सूर्यास्त के बाद गिरफ्तार नहीं किया जा सकता, जब तक कि मजिस्ट्रेट की अनुमति और विशेष परिस्थितियां न हों।

साथ ही महिलाओं से पूछताछ उनके निवास स्थान पर की जानी चाहिए, न कि थाने में बुलाकर।

कोर्ट ने कहा कि बिना एफआईआर दर्ज किए युवतियों को रातभर थाने में रखना उनके मौलिक अधिकारों और संविधान के अनुच्छेद 21 का गंभीर उल्लंघन है।

कोर्ट ने कहा – निष्पक्ष जांच जरूरी

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि निष्पक्ष जांच भी निष्पक्ष सुनवाई जितनी ही आवश्यक है। यदि जांच एजेंसी पर ही आरोप हों, तो मामले की जांच स्वतंत्र एजेंसी को सौंपी जा सकती है।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यह मामला केवल प्रक्रियागत त्रुटि का नहीं, बल्कि सत्ता के गंभीर दुरुपयोग का प्रतीत होता है।

अदालत ने माना कि युवतियों को अवैध रूप से हिरासत में रखा गया और बाद में एफआईआर दर्ज कर कार्रवाई को वैध दिखाने का प्रयास किया गया।

6 माह में जांच पूर्ण करे CBI

अदालत ने अंततः पूरे मामले की आगे की जांच सीबीआई को सौंपते हुए कूड़ी भगतासनी थाना पुलिस को एक सप्ताह में समस्त रिकॉर्ड CBI को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए।

कोर्ट ने CBI से छह महीने में जांच पूरी कर रिपोर्ट पेश करने को कहा है। साथ ही ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही भी CBI रिपोर्ट आने तक स्थगित रखने के आदेश दिए गए हैं।

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