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29 साल बाद राजस्थान की शिक्षिका को सुप्रीम कोर्ट से मिला इंसाफ, राजस्थान हाईकोर्ट के घटाए मुआवजा को बढ़ाकर किया 4 गुणा

Supreme Court Enhances Compensation to ₹9.12 Lakh for Rajasthan Teacher Injured in 1997 Road Accident

सुप्रीम कोर्ट ने कहा-​किसी सरकारी कर्मचारी की नौकरी बच जाना यह साबित नहीं करता कि उसकी “कमाने की क्षमता” या जीवन की गुणवत्ता प्रभावित नहीं हुई।

नई दिल्ली/जयपुर। सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल राजस्थान की शिक्षिका नरगिस सिद्दीकी को आखिरकार 29 साल बाद सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है।

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस आदेश को पलट दिया हैं जिसमें मुआवजा घटाकर मात्र 2.11 लाख रुपये कर दिया गया था, सुप्रीम कोर्ट ने अब पीड़िता को 9,12,886 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है।

कोर्ट ने कहा कि शारीरिक पीड़ा, मानसिक आघात और जीवन की सुविधाओं के स्थायी नुकसान का आकलन “अधिक संवेदनशीलता” के साथ किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह ने शिक्षिका की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया हैं.

1997 में हुआ था भीषण सड़क हादसा

मामले के अनुसार, 24 फरवरी 1997 को नरगिस सिद्दीकी अपने सरकारी उच्च प्राथमिक विद्यालय में ड्यूटी पर जाने के लिए हीरो पुक स्कूटर से जा रही थीं।

सुबह करीब 7 बजे जयपुर के त्रिवेणी नगर चौराहे पर एक तेज रफ्तार और लापरवाही से चलाए जा रहे ट्रक ने उनकी स्कूटर को सामने से टक्कर मार दी।

हादसे में उनकी स्कूटर पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई और उन्हें शरीर पर गंभीर चोटें आईं।

एसएमएस अस्पताल के मेडिकल बोर्ड ने 26 जुलाई 1998 को जारी दिव्यांगता प्रमाण पत्र में उन्हें 39.07 प्रतिशत स्थायी दिव्यांग घोषित किया।

कई फ्रैक्चर के कारण उनके पैर की लंबाई कम हो गई और कूल्हे की गतिविधि सीमित हो गई, जिससे लंबे समय तक खड़े रहने, जमीन पर बैठने और सामान्य रूप से चलने-फिरने में कठिनाई होने लगी।

MACT ने दिया था 5.57 लाख का मुआवजा

मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT), जयपुर ने 31 जनवरी 2008 को अपने निर्णय में नरगिस सिद्दीकी की मासिक आय 6,230 रुपये मानते हुए भविष्य की आय में कमी, स्थायी दिव्यांगता, चिकित्सा खर्च और मानसिक पीड़ा सहित विभिन्न मदों में कुल 5,57,500 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था।

हाईकोर्ट ने घटा दिया था मुआवजा

बीमा कंपनी की अपील पर राजस्थान हाईकोर्ट ने लापरवाही संबंधी निष्कर्ष तो बरकरार रखा, लेकिन यह कहते हुए भविष्य की आय के नुकसान का मुआवजा हटा दिया कि चूंकि पीड़िता सरकारी कर्मचारी थीं और उनकी नौकरी तथा वेतन जारी रहा, इसलिए वास्तविक आय हानि नहीं हुई। इसके बाद मुआवजा घटाकर केवल 2,11,876 रुपये कर दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा – नौकरी बची, लेकिन जिंदगी प्रभावित हुई

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की इस दलील को गलत मानते हुए कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी की नौकरी बच जाना यह साबित नहीं करता कि उसकी “कमाने की क्षमता” या जीवन की गुणवत्ता प्रभावित नहीं हुई।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 39.07 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता ने एक शिक्षिका के रूप में नरगिस सिद्दीकी की कार्यक्षमता, पदोन्नति की संभावनाओं और सामान्य जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।

कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में केवल आर्थिक नुकसान ही नहीं, बल्कि शारीरिक पीड़ा, मानसिक कष्ट और जीवन की सुविधाओं के स्थायी नुकसान का भी न्यायपूर्ण आकलन आवश्यक है।

सुप्रीम कोर्ट ने बढ़ाया मुआवजा

सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न पूर्व फैसलों — Sidram बनाम United India Insurance, K.S. Muralidhar बनाम R. Subbulakshmi और Raj Kumar बनाम Ajay Kumar — का हवाला देते हुए मुआवजा बढ़ाकर 9,12,886 रुपये कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने उक्त राशि को मूल दावा याचिका दायर करने की तारीख से ब्याज सहित 8 सप्ताह के भीतर पीड़िता के बैंक खाते में जमा कराने का आदेश दिया हैं.

29 साल तक चला न्याय का संघर्ष

इस मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि पीड़िता को न्याय पाने में करीब 29 साल लग गए।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि MACT में दावा निस्तारण में 10 साल 10 महीने लगे.

इसके बाद राजस्थान हाईकोर्ट में अपील के निपटारे में 15 साल 7 महीने और सुप्रीम कोर्ट में करीब 4 महीने का समय लगा।

दुर्लभ मामलों में शामिल

यह मामला उन दुर्लभ मामलों में माना जा रहा है, जहां सुप्रीम कोर्ट ने न केवल हाईकोर्ट द्वारा घटाए गए मुआवजे को बहाल किया, बल्कि मूल दावा राशि से भी अधिक मुआवजा प्रदान किया।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता आदित्य जैन, स्वाति सिंह और सुरकेश लाखवानी ने पैरवी की, जबकि प्रतिवादी बीमा कंपनी की ओर से जेपीएन शाही, मृगांक प्रभाकर और आस्था सिंह ने पक्ष रखा।

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