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नियुक्ति के 6 साल बाद 42% दिव्यांगता को घटाकर 11% करने का आरोप, राजस्थान हाईकोर्ट ने AIIMS जोधपुर को दिए जांच के आदेश

Rajasthan High Court Announces 95 Civil Judge Vacancies for 2026 With Reservation for Women

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक दिव्यांग कर्मचारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए एम्स जोधपुर को उसकी श्रवण दिव्यांगता की दोबारा जांच करने के निर्देश दिए हैं।

मामला जयपुर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (JVVNL) में कार्यरत जूनियर अकाउंटेंट प्रिंस गर्ग से जुड़ा है, जिन्होंने आरोप लगाया कि मेडिकल बोर्ड ने उनकी 42 प्रतिशत स्थायी श्रवण दिव्यांगता को गलत तरीके से घटाकर 11 प्रतिशत दर्शा दिया।

याचिकाकर्ता प्रिंस गर्ग की ओर से अधिवक्ता अक्षित गुप्ता, नकुल बंसल और श्रेयांस धारीवाल नेराजस्थान हाईकोर्ट में दायर याचिका में कहा कि उन्हें वर्ष 2018 में जूनियर अकाउंटेंट पद पर नियुक्त किया गया था और वर्ष 2020 में उनकी सेवा स्थायी कर दी गई।

बाद में 25 मार्च 2026 को उन्हें एक कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, जिसमें नियुक्ति के समय प्रस्तुत दिव्यांगता प्रमाण पत्र की सत्यता और वैधता पर सवाल उठाए गए।

याचिका में कहा गया कि पूर्व में मेडिकल बोर्ड द्वारा जारी प्रमाण पत्र में दोनों कानों में 42 प्रतिशत स्थायी श्रवण हानि बताई गई थी, लेकिन बाद में एसएमएस अस्पताल जयपुर की मेडिकल बोर्ड रिपोर्ट में इसे घटाकर 11 प्रतिशत कर दिया गया।

याचिकाकर्ता ने इसे नियमों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत बताते हुए चुनौती दी।

जस्टिस अनिल कुमार उपमन की एकलपीठ ने याचिकाकर्ता को अंतरिम राहत देते हुए याचिकाकर्ता के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने पर रोक लगा दी है.

साथ ही एम्स जोधपुर को निर्देश दिया कि वह 25 मई से 27 मई 2026 के बीच याचिकाकर्ता की श्रवण क्षमता की जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत करे।

हाईकोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि याचिकाकर्ता अपनी bona fide साबित करने के लिए 10 हजार रुपये की डिमांड ड्राफ्ट राशि कोर्ट रजिस्ट्रार के समक्ष जमा कराएंगे।

यदि एम्स की जांच में दिव्यांगता बेंचमार्क श्रेणी से अधिक पाई जाती है तो राशि वापस कर दी जाएगी, अन्यथा यह राशि राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में जमा होगी।

अदालत ने एम्स जोधपुर को 1 जून 2026 तक जांच पूरी कर प्रमाण पत्र जारी करने तथा उसकी प्रति JVVNL को उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए हैं।

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