कोर्ट ने कहा- यौन अपराधों में केवल पीड़िता के बयान के आधार पर भी दोषसिद्धि संभव, लेकिन पीड़िता के विरोधाभासी बयान पर दोषसिद्धि में बरतनी होगी विशेष सावधानी।
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने चूरू के बहुचर्चित गैंगरेप मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए गए दो आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।
राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ में जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस सुनील बेनीवाल की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि पीड़िता के बयान, मेडिकल और वैज्ञानिक साक्ष्यों तथा जांच अधिकारी की स्वीकारोक्तियों में गंभीर विरोधाभास हैं, जिससे अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में विफल रहा।
हाईकोर्ट ने इस मामले में गैंगरेप के आरोपी वीर सिंह उर्फ बंटी और विक्रम सिंह की अपील स्वीकार करते हुए 29 अगस्त 2025 को राजगढ़, चूरू की अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द कर दिया।
मामले के अनुसार, पीड़िता ने 5 अक्टूबर 2020 को राजगढ़ थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। आरोप था कि वह एसएससी परीक्षा फॉर्म भरने राजगढ़ बस स्टैंड गई थी, जहां उसकी मुलाकात पुराने परिचित विक्रम पूनिया से हुई।
उसने फॉर्म भरवाने के बहाने उसे साथ ले जाकर अन्य युवकों के साथ मिलकर दुष्कर्म किया। बाद में जयपुर के होटल में भी कई लोगों द्वारा गैंगरेप करने, अश्लील वीडियो बनाने और ब्लैकमेल करने के आरोप लगाए गए थे।
याचिकाकर्ता आरोपियों की दलीलें
आरोपियों की ओर से हाईकोर्ट में कहा गया कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किए बिना दोषसिद्धि कर दी।
बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि पीड़िता के शुरुआती बयान और बाद में दर्ज FIR में गंभीर विरोधाभास हैं।
पीड़िता ने बरामदगी के तुरंत बाद पुलिस को दिए बयान में कहा था कि वह घरवालों से नाराज होकर अपनी इच्छा से गई थी और उसके साथ कोई गलत घटना नहीं हुई।
बाद में दर्ज कराई गई रिपोर्ट में गैंगरेप, ब्लैकमेल और नशीला पदार्थ देने जैसे आरोप लगाए गए, जो अविश्वसनीय हैं।
बचाव पक्ष ने कहा कि मेडिकल जांच में शरीर या निजी अंगों पर कोई चोट नहीं मिली और डॉक्टर ने जबरन यौन संबंध की पुष्टि भी नहीं की।
FSL रिपोर्ट में भी किसी आरोपी का डीएनए या अन्य वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं मिला।
जांच अधिकारी ने स्वयं स्वीकार किया कि FIR के कई आरोप जांच में गलत पाए गए। इसलिए अभियोजन पक्ष अपराध संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।
अभियोजन पक्ष की दलीलें
राज्य सरकार की ओर से लोक अभियोजक ने ट्रायल कोर्ट के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि आरोपियों को उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर सही तरीके से दोषी ठहराया गया था।
अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि पीड़िता ने स्पष्ट रूप से आरोप लगाया कि आरोपी उसे बहाने से अपने साथ ले गए और विभिन्न स्थानों पर कई लोगों ने उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया।
अभियोजन ने कहा कि आरोपियों ने अश्लील वीडियो और फोटो बनाकर उसे तथा उसके परिवार को धमकाया, जिसके कारण वह मानसिक रूप से डरी हुई थी और इसी वजह से FIR दर्ज कराने में देरी हुई।
राज्य पक्ष ने यह भी दलील दी कि यौन अपराधों में पीड़िता का बयान अत्यंत महत्वपूर्ण साक्ष्य माना जाता है और यदि उसका बयान विश्वसनीय हो तो केवल उसी के आधार पर दोषसिद्धि की जा सकती है।
अभियोजन ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने सभी तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए सही फैसला सुनाया था, इसलिए आरोपियों की अपील खारिज की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट का फैसला
हालांकि हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि पीड़िता की शुरुआती बयानबाजी और बाद में दर्ज कराई गई FIR में गंभीर अंतर है।
कोर्ट ने कहा कि पीड़िता की बरामदगी के तुरंत बाद दर्ज बयान में उसने स्वयं कहा था कि वह घरवालों से नाराज होकर अपनी मर्जी से गई थी और उसके साथ कोई गलत घटना नहीं हुई।
कोर्ट ने यह भी माना कि जांच अधिकारी रामप्रताप विश्नोई ने स्वयं स्वीकार किया कि FIR में दर्ज कई महत्वपूर्ण आरोप जांच में गलत पाए गए।
जांच में यह सामने आया कि पीड़िता को कार में जबरन नहीं ले जाया गया था, बल्कि वह आरोपी के साथ मोटरसाइकिल पर गई थी और बाद में स्वयं बस से जयपुर पहुंची थी।
खंडपीठ ने मेडिकल रिपोर्ट का भी उल्लेख किया, जिसमें पीड़िता के शरीर या निजी अंगों पर किसी प्रकार की चोट नहीं पाई गई।
डॉक्टर ने यह भी स्पष्ट कहा कि वह जबरन यौन संबंध होने की पुष्टि नहीं कर सकतीं।
कोर्ट ने कहा कि
फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) रिपोर्ट में भी आरोपियों के खिलाफ कोई ठोस वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं मिला।
कोर्ट ने कहा कि पीड़िता के नमूनों में किसी आरोपी का डीएनए या अन्य जैविक साक्ष्य नहीं मिला। आरोपी वीर सिंह उर्फ बंटी के खिलाफ होटल में ठहरने का भी कोई स्वतंत्र प्रमाण नहीं मिला।
हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि
अभियोजन पक्ष कोई स्वतंत्र गवाह पेश नहीं कर सका। न होटल स्टाफ, न बस स्टैंड का कोई व्यक्ति और न ही कोई अन्य स्वतंत्र साक्ष्य आरोपों की पुष्टि कर सका। इसके अलावा कथित अश्लील वीडियो और फोटो भी जांच में बरामद नहीं हुए।
कोर्ट ने कहा कि पीड़िता के बयानों में “महत्वपूर्ण विरोधाभास, अस्वाभाविक परिस्थितियां और कई सुधार” दिखाई देते हैं।
मेडिकल, वैज्ञानिक और स्वतंत्र साक्ष्यों के अभाव में अभियोजन की कहानी संदेह से परे साबित नहीं हो सकी। ऐसे में आरोपियों को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं होगा।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यौन अपराधों में केवल पीड़िता के बयान के आधार पर भी दोषसिद्धि संभव है, लेकिन जब बयान स्वयं विरोधाभासी हो और अन्य साक्ष्य उसका समर्थन न करें, तब अदालत को अत्यधिक सावधानी बरतनी होती है।
Case Details
HIGH COURT OF JUDICATURE FOR RAJASTHAN AT
JODHPUR
D.B. Criminal Appeal (DB) No. 326/2025
Veer Singh Alias Bunty S/o Shri Sumer Singh
D.B. Criminal Appeal (DB) No. 316/2025
Vikram Singh S/o Mahendra Singh,