टॉप स्टोरी

चर्चित खबरें

राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ड्यूटी के दौरान दिव्यांग हुए कर्मचारी के बेटे को मिलेगी अनुकंपा नियुक्ति

Rajasthan High Court Grants Relief in Compassionate Appointment Case of Disabled Government Employee’s Son
हाईकोर्ट ने कहा- दुर्घटना नियम लागू होने से पहले होने का आधार बनाकर अनुकंपा नियुक्ति ठुकराना गलत; पशुपालन विभाग का आदेश रद्द, 6 सप्ताह में दोबारा विचार के निर्देश

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि कोई सरकारी कर्मचारी ड्यूटी के दौरान स्थायी रूप से दिव्यांग हो जाता है, तो उसके आश्रित को केवल इस आधार पर अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता कि दुर्घटना नए नियम लागू होने से पहले हुई थी।

हाईकोर्ट ने पशुपालन विभाग के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें कर्मचारी के बेटे की अनुकंपा नियुक्ति की मांग खारिज कर दी गई थी।

जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने यह फैसला करण प्रताप सिंह राठौड़ की याचिका स्वीकार करते हुए दिया है।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और पशुपालन विभाग को आदेश दिया है कि वह याचिकाकर्ता के आवेदन पर नए सिरे से विचार करे और यदि वह पात्र पाया जाए तो छह सप्ताह के भीतर अनुकंपा नियुक्ति दी जाए।

क्या है मामला

याचिकाकर्ता के पिता महेंद्र प्रताप सिंह राठौड़ पशुपालन विभाग में सहायक प्रशासनिक अधिकारी के पद पर कार्यरत थे।

1 जुलाई 2021 को ड्यूटी के दौरान हुए एक हादसे में वे गंभीर रूप से घायल हो गए।

हादसे के बाद वे स्थायी रूप से दिव्यांग हो गए और कोमा की स्थिति में चले गए।

मेडिकल बोर्ड ने उनकी स्थिति को स्थायी और सुधार की संभावना से परे बताते हुए 85 प्रतिशत दिव्यांगता प्रमाणित की थी।

इसके बाद उनके बेटे करण प्रताप सिंह राठौड़ ने राजस्थान Compassionate Appointment of Dependents of Permanent Total Disabled Government Servants Rules, 2023 के तहत अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था।

पशुपालन विभाग ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि कर्मचारी की दुर्घटना वर्ष 2021 में हुई थी, जबकि संबंधित नियम 26 अप्रैल 2023 से लागू हुए हैं।

याचिकाकर्ता की ओर से दलीलें

याचिकाकर्ता करण प्रताप सिंह राठौड़ की ओर से अधिवक्ता तनवीर अहमद ने अदालत में कहा कि याचिकाकर्ता के पिता हादसे के बाद स्थायी रूप से दिव्यांग हो गए तथा कोमा की स्थिति में पहुंच गए। मेडिकल बोर्ड ने उनकी 85 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता प्रमाणित की और उन्हें सरकारी सेवा के लिए स्थायी रूप से अयोग्य माना।

अधिवक्ता तनवीर अहमद ने तर्क दिया कि राजस्थान Compassionate Appointment of Dependents of Permanent Total Disabled Government Servants Rules, 2023 का उद्देश्य ऐसे परिवारों को राहत देना है, जिनका कमाने वाला सदस्य ड्यूटी के दौरान स्थायी रूप से अक्षम हो जाए। इसलिए यह पूरी तरह अप्रासंगिक है कि दुर्घटना नियम लागू होने से पहले हुई या बाद में।

अधिवक्ता ने कहा कि 26 अप्रैल 2023 को जब नए नियम लागू हुए, उस समय भी याचिकाकर्ता के पिता स्थायी रूप से दिव्यांग थे और सेवा में बने हुए थे।

इसलिए केवल दुर्घटना की तारीख के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति से इनकार करना पूरी तरह अवैध और तर्कहीन है।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि नियमों में कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि केवल 26 अप्रैल 2023 के बाद हुई दुर्घटनाओं के मामलों में ही लाभ मिलेगा। ऐसे में विभाग द्वारा लगाया गया प्रतिबंध नियमों में कृत्रिम शर्त जोड़ने जैसा है, जिसकी अनुमति कानून नहीं देता।

सरकार की ओर से दलीलें

राज्य सरकार और पशुपालन विभाग की ओर से अदालत में कहा गया कि विभाग ने 14 मई 2025 का आदेश पूरी तरह नियमों के अनुरूप जारी किया था।

सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि वर्ष 2023 के नियम 26 अप्रैल 2023 से लागू हुए हैं, इसलिए इनका लाभ केवल उन्हीं मामलों में दिया जा सकता है, जहां स्थायी दिव्यांगता नियम लागू होने के बाद हुई हो।

सरकार ने यह भी कहा कि पशुपालन विभाग ने इस मामले में कार्मिक विभाग (DOP) से भी राय ली थी और कार्मिक विभाग ने भी यही मत दिया कि याचिकाकर्ता का मामला 2023 के नियमों के दायरे में नहीं आता।

सरकार की ओर से अदालत में यह दलील दी गई कि 2023 के नियम पूर्व प्रभाव (retrospective effect) से लागू नहीं किए जा सकते। इसलिए 2023 से पहले हुई दुर्घटनाओं या स्थायी दिव्यांगता के मामलों को इन नियमों के तहत शामिल नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट का फैसला

दोनों पक्षों की बहस और दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने सरकार के इस तर्क को पूरी तरह गलत ठहराया।

हाईकोर्ट ने कहा कि नियमों में कहीं भी यह नहीं लिखा कि केवल 2023 के बाद हुई दुर्घटनाओं के मामलों में ही अनुकंपा नियुक्ति मिलेगी।

हाईकोर्ट ने माना कि यदि नियम लागू होने के समय कर्मचारी स्थायी रूप से दिव्यांग था और सेवा में रहते हुए चिकित्सकीय रूप से अयोग्य घोषित किया गया, तो उसके आश्रित को नियमों का लाभ मिलना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार की यह व्याख्या नियमों के मूल उद्देश्य को ही समाप्त कर देती है।

कोर्ट ने कहा

अनुकंपा नियुक्ति का मकसद ऐसे परिवारों को आर्थिक और सामाजिक सहारा देना है, जिनका कमाने वाला सदस्य ड्यूटी के दौरान स्थायी रूप से अक्षम हो गया हो। लाभकारी और कल्याणकारी कानूनों की व्याख्या उदारतापूर्वक की जानी चाहिए, न कि तकनीकी आधार पर अधिकारों को छीना जाए।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि केवल दुर्घटना की तारीख को आधार बनाकर आश्रित को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित करना “कृत्रिम वर्गीकरण” है, जिसकी अनुमति नियमों में नहीं दी गई है।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने 14 मई 2025 को जारी विभागीय आदेश को निरस्त कर दिया।

सबसे अधिक लोकप्रिय