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प्राकृतिक जल मार्गों, नालों और जल निकासी क्षेत्रों पर किसी भी प्रकार का निर्माण संविधान और पर्यावरणीय सिद्धांतों के खिलाफ : राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा आदेश

Rajasthan High Court Orders Removal of Road and Crematorium Built on Natural Water Channel in Dausa

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने प्राकृतिक जल स्रोतों और पर्यावरण संरक्षण को लेकर बड़ा और सख्त फैसला सुनाते हुए दौसा जिले के लालसोट क्षेत्र में ‘गैर मुमकिन नाला’ भूमि पर बनी सड़क, श्मशान संरचना और अन्य निर्माण हटाने के आदेश दिए हैं।

राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि प्राकृतिक जल मार्गों, नालों और जल निकासी क्षेत्रों पर किसी भी प्रकार का निर्माण संविधान और पर्यावरणीय सिद्धांतों के खिलाफ है, चाहे वह “जनहित” या “सार्वजनिक उपयोग” के नाम पर ही क्यों न किया गया हो।

डॉ. जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस विनीत कुमार माथुर की खंडपीठ ने यह आदेश रामजी लाल सैनी द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिका में बताए गए स्थानों पर अगले तीन माह के भीतर सभी अवैध निर्माण हटाकर भूमि को उसकी मूल स्थिति में बहाल करने के आदेश दिए हैं।

दौसा का है मामला

मामला दौसा जिले के लालसोट तहसील स्थित खटवा गांव की खसरा नंबर 717/444 की भूमि से जुड़ा है, जो राजस्व रिकॉर्ड में ‘गैर मुमकिन नाला’ के रूप में दर्ज है।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ने आरोप लगाया था कि इस प्राकृतिक जल निकासी क्षेत्र पर सड़क का निर्माण कर दिया गया और श्मशान के लिए भी इसका उपयोग किया जाने लगा, जो पूरी तरह अवैध है।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता धर्मेंद्र पारीक ने अदालत में कहा कि ‘गैर मुमकिन नाला’ प्राकृतिक जल प्रवाह का हिस्सा होता है और इसका उपयोग केवल उसी उद्देश्य के लिए किया जा सकता है।

इस प्रकार की भूमि पर किसी भी अन्य निर्माण की अनुमति कानून नहीं देता। उन्होंने दलील दी कि यह कार्रवाई पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा से जुड़े संवैधानिक दायित्वों का उल्लंघन है।

याचिकाकर्ता ने अदालत में पुराने महत्वपूर्ण फैसलों का भी हवाला दिया।

इनमें अब्दुल रहमान बनाम राज्य सरकार और गुलाब कोठारी बनाम राज्य सरकार मामलों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि जल स्रोतों, नालों, तालाबों और कैचमेंट क्षेत्रों की सुरक्षा करना राज्य और नागरिकों दोनों का संवैधानिक दायित्व है।

सरकार का जवाब

वहीं राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि सड़क और श्मशान का निर्माण सार्वजनिक उपयोग के लिए किया गया है, इसलिए कोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

हालांकि सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अपने जवाब में यह स्वीकार कर लिया कि संबंधित भूमि वास्तव में राजस्व रिकॉर्ड में ‘गैर मुमकिन नाला’ के रूप में दर्ज है।

सरकार ने यह भी माना कि भूमि के एक हिस्से पर सड़क बनी हुई है और दूसरे हिस्से पर श्मशान की छतरियां मौजूद हैं।

हाईकोर्ट का फैसला

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ‘गैर मुमकिन नाला’ केवल एक जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की पारिस्थितिकी और जल निकासी प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।

ऐसी भूमि पर किसी भी प्रकार का अतिक्रमण, बदलाव या निर्माण पर्यावरणीय संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

कोर्ट ने कहा कि राजस्थान जैसे जल संकट वाले राज्य में प्राकृतिक जल स्रोतों और पारंपरिक जल मार्गों का संरक्षण और भी अधिक आवश्यक हो जाता है।

खंडपीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 48-ए और 51-ए(जी) राज्य और नागरिकों दोनों पर प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा का दायित्व डालते हैं।

स्वच्छ और सुरक्षित पर्यावरण का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के मौलिक अधिकार का हिस्सा है।

कोर्ट ने अपने आदेश में बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि सार्वजनिक सुविधा के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट नहीं किया जा सकता।

प्रशासनिक सुविधा या विकास के दबाव कानून से ऊपर नहीं हो सकते। यदि राज्य स्वयं प्राकृतिक जल मार्गों का स्वरूप बदलने लगे, तो यह गंभीर न्यायिक हस्तक्षेप का विषय बनता है।

अंतिम आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में जनहित याचिका स्वीकार करते हुए राज्य सरकार, जिला प्रशासन और पंचायत को आदेश दिया कि खसरा नंबर 717/444 पर बनी सड़क, श्मशान संरचना और अन्य निर्माण तत्काल हटाए जाएं तथा भूमि को उसकी मूल प्राकृतिक स्थिति में बहाल किया जाए।

साथ ही कोर्ट ने निर्देश दिया कि भविष्य में भी किसी ‘गैर मुमकिन नाला’ भूमि का उपयोग उसके मूल स्वरूप के विपरीत नहीं किया जाएगा।

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