नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने रिटायर्ड हाईकोर्ट चीफ जस्टिस और जजों की पेंशन को लेकर अपने मई 2025 के ऐतिहासिक फैसले पर महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण जारी किया है।
कोर्ट ने साफ किया कि 2025 में दिए गए अपने फैसले के तहत तय की गई संशोधित पेंशन 9 अक्टूबर 2016 से लागू मानी जाएगी। इस स्पष्टता के बाद लंबे समय से चल रहा भ्रम खत्म हो गया है और अब यह तय हो गया है कि किस तारीख से रिटायर्ड जजों को नई पेंशन का लाभ मिलेगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि इसी तारीख से एरियर यानी बकाया राशि की गणना भी की जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि
रिटायर्ड हाईकोर्ट चीफ जस्टिस को 15 लाख रुपये सालाना पूर्ण पेंशन और अन्य रिटायर्ड हाईकोर्ट जजों को 13.5 लाख रुपये सालाना पूर्ण पेंशन देने का आदेश 9 अक्टूबर 2016 से प्रभावी माना जाएगा।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने यह आदेश केंद्र सरकार द्वारा दायर आवेदन पर सुनवाई करते हुए पारित किया। अदालत ने अपने मई 2025 के ऐतिहासिक फैसले के दो महत्वपूर्ण हिस्सों को स्पष्ट किया
न्यायपालिका में पेंशन विवाद क्यों बढ़ा ?
पूरा विवाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जजों की पेंशन में समानता को लेकर था। लंबे समय से यह मांग उठ रही थी कि अलग-अलग समय पर रिटायर हुए जजों और अलग-अलग स्रोतों से नियुक्त जजों की पेंशन में भारी अंतर क्यों रखा जा रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में रिटायर्ड जजों की पेंशन को लेकर कई याचिकाएं दायर हुई थीं। मुख्य विवाद यह था कि जिला न्यायपालिका से आए जजों की service period गणना अलग तरीके से हो रही थी। कुछ जज जिला न्यायपालिका से प्रमोट होकर हाईकोर्ट पहुंचे थे, जबकि कुछ सीधे वकालत से नियुक्त किए गए थे। इसके अलावा अलग-अलग Pay Commission लागू होने के कारण भी पेंशन संरचना में बड़ा अंतर पैदा हो गया था।
इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में “In Re: Refixation of Pension Considering Service Period in District Judiciary and High Court” मामला चल रहा था। मई 2025 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने फैसला सुनाया था।
उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सभी रिटायर्ड हाईकोर्ट जज समान और पूर्ण पेंशन के हकदार हैं। अदालत ने “One Rank One Pension” के सिद्धांत को लागू करते हुए कहा था कि केवल रिटायरमेंट की तारीख या नियुक्ति के स्रोत के आधार पर पेंशन में भेदभाव नहीं किया जा सकता।
2025 में सुप्रीम कोर्ट ने क्या आदेश दिया था ?
मई 2025 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि:
- रिटायर्ड हाईकोर्ट चीफ जस्टिस को 15 लाख रुपये सालाना पूर्ण पेंशन दी जाए।
- जबकि अन्य रिटायर्ड हाईकोर्ट जजों को 13.5 लाख रुपये सालाना पूर्ण पेंशन मिले।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि Additional Judges भी इस श्रेणी में शामिल होंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने उस समय कहा था कि न्यायपालिका में भी “One Rank One Pension” का सिद्धांत लागू होना चाहिए। अदालत ने माना था कि एक ही संवैधानिक पद पर रहे जजों के बीच केवल इस आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता कि वे किस तारीख को रिटायर हुए या उनकी नियुक्ति किस माध्यम से हुई।
हालांकि उस फैसले में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि revised pension किस तारीख से लागू होगी। इसी मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दायर कर स्पष्टीकरण मांगा था।
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से क्या कहा ?
केंद्र सरकार की ओर से Attorney General आर. वेंकटरमणी ने अदालत के सामने कहा कि मई 2025 के फैसले में revised pension लागू होने की प्रभावी तारीख स्पष्ट नहीं थी।
सरकार ने अदालत से पूछा कि:
- बढ़ी हुई पेंशन किस तारीख से लागू मानी जाएगी?
- एरियर की गणना कब से होगी?
- उन जजों के मामलों में क्या व्यवस्था होगी जो 9 अक्टूबर 2016 से पहले रिटायर हो चुके हैं?
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के आदेश के दो प्रमुख पैराग्राफ को स्पष्ट किया।
सुप्रीम कोर्ट ने अब क्या स्पष्ट किया ?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने ताजा आदेश में कहा कि revised full pension 9 अक्टूबर 2016 से देय मानी जाएगी। अदालत ने कहा कि इसी तारीख से एरियर की गणना भी की जाएगी।
कोर्ट ने आदेश में कहा:
“Revised full pension 09.10.2016 से admissible होगी और arrears की गणना उसी आधार पर की जाएगी।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई जज 9 अक्टूबर 2016 से पहले रिटायर हुआ था, तो उसके एरियर की गणना पुराने अधिकतम पेंशन ढांचे के आधार पर की जाएगी।
यानी सुप्रीम कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया कि 2016 के बाद रिटायर हुए जजों को revised pension का पूरा लाभ मिले और उससे पहले रिटायर हुए जजों के साथ भी असमानता न हो।
“One Rank One Pension” सिद्धांत क्यों अहम
सुप्रीम कोर्ट ने अपने 2025 के फैसले में कहा था कि न्यायपालिका में पेंशन व्यवस्था समान होनी चाहिए। अदालत ने माना था कि एक ही संवैधानिक पद पर रहे जजों के बीच पेंशन असमानता उचित नहीं। रिटायरमेंट की तारीख के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए और न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए सम्मानजनक पेंशन जरूरी है।
अदालत ने यह भी कहा था कि यदि सेना और अन्य सेवाओं में “One Rank One Pension” का सिद्धांत लागू हो सकता है, तो न्यायपालिका में भी समानता का सिद्धांत लागू होना चाहिए।
कोर्ट ने माना कि न्यायपालिका के संवैधानिक पदों की गरिमा बनाए रखने के लिए pension parity जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट का ताजा आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मई 2025 में दिए गए revised pension आदेश 9 अक्टूबर 2016 से लागू माने जाएंगे। अदालत ने कहा कि उसी तारीख से arrears की गणना होगी।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि 9 अक्टूबर 2016 से पहले रिटायर हुए जजों के मामलों में pre-revised maximum pension के आधार पर गणना की जाएगी।
अदालत ने केंद्र सरकार के आवेदन का निपटारा करते हुए यह स्पष्टीकरण जारी किया।
यह फैसला आने वाले समय में न्यायपालिका की pension parity और constitutional office holders की सेवा शर्तों से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मिसाल माना जा सकता है।
रिटायर्ड जजों को क्या होगा फायदा ?
सुप्रीम कोर्ट के इस स्पष्टीकरण के बाद अब देशभर के बड़ी संख्या में रिटायर्ड हाईकोर्ट जजों और पूर्व चीफ जस्टिस को आर्थिक लाभ मिलेगा। अब:
- revised pension 9 अक्टूबर 2016 से लागू मानी जाएगी।
- उसी आधार पर arrears जोड़े जाएंगे।
- लंबित भुगतान का रास्ता साफ होगा।
यह फैसला उन जजों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो वर्षों से pension parity की मांग कर रहे थे।
अदालत के आदेश के बाद अब केंद्र सरकार को revised pension और बकाया भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ानी होगी।
पेंशन विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का साफ संदेश
इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट का रुख साफ है कि न्यायपालिका के भीतर किसी भी तरह का भेदभाव स्वीकार नहीं किया जाएगा। हालांकि, इसे लागू करने के तरीके में व्यावहारिकता भी जरूरी है। यही वजह है कि कोर्ट ने 2016 से लागू करने की सीमा तय की है।
यह फैसला न सिर्फ रिटायर्ड जजों के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि सुप्रीम कोर्ट अपने पुराने फैसलों को जरूरत पड़ने पर स्पष्ट करने से पीछे नहीं हटता।
