जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और मानवीय दृष्टिकोण वाला फैसला सुनाते हुए कहा है कि जब तक किसी आरोपी को मानसिक रूप से स्वस्थ घोषित नहीं किया जाता, तब तक उसके खिलाफ निष्पक्ष आपराधिक ट्रायल नहीं चलाया जा सकता।
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है और मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति को बिना उसकी समझ और बचाव क्षमता के ट्रायल का सामना नहीं कराया जा सकता।
राजस्थान हाईकोर्ट की एकलपीठ ने यह आदेश धौलपुर निवासी सोनू राम पचौरी द्वारा दायर आपराधिक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।
जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकलपीठ ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए दिए इस अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की रक्षा करने और निष्पक्ष ट्रायल सुनिश्चित करने के लिए आरोपी की मानसिक स्थिति का परीक्षण आवश्यक है।
ये है मामला
मामला वर्ष 1994 के हत्या प्रकरण से जुड़ा है। हत्या के इस मुकदमे का आरोपी पूरण सिंह करीब 30 वर्षों तक फरार रहा।
30 साल बाद पुलिस ने आरोपी पूरण सिंह को 24 जनवरी 2024 को गिरफ्तार किया।
गिरफ्तारी के तुरंत बाद ही आरोपी पूरण सिंह के बेटे ने ट्रायल कोर्ट में धारा 329 Cr.P.C. के तहत आवेदन पेश कर कहा कि उसके पिता डिमेंशिया (Dementia) से पीड़ित हैं और उनकी मानसिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वे कोर्ट की कार्यवाही समझ सकें या अपना बचाव कर सकें।
आरोपी के बेटे के आवेदन पर ट्रायल कोर्ट ने आरोपी के स्वस्थ होने तक ट्रायल करने से इनकार करते हुए आरोपी को बेटे को सुपुर्द कर दिया।
ट्रायल कोर्ट ने इसके साथ ही बेटे की सुपुर्दगी में छोड़ते हुए हर छह महीने में मानसिक स्वास्थ्य रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया।
ट्रायल कोर्ट के इस आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी।
याचिकाकर्ता की दलीलें
याचिकाकर्ता सोनू राम पचौरी की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि धौलपुर के कोलारी थाना क्षेत्र में वर्ष 1994 में दर्ज एफआईआर नंबर 40/1994 में आरोपी पूरण सिंह के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया गया था।
एफआईआर दर्ज होने के बाद आरोपी लंबे समय तक फरार रहा और उसकी अनुपस्थिति में धारा 299 Cr.P.C. के तहत चार्जशीट पेश की गई।
लगभग 30 साल बाद आरोपी को 24 जनवरी 2024 को गिरफ्तार किया गया।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि गिरफ्तारी के समय आरोपी की मानसिक स्थिति सामान्य थी और वह किसी मानसिक बीमारी से पीड़ित नहीं था।
बाद में आरोपी के जैविक पुत्र ने धारा 329 Cr.P.C. के तहत आवेदन पेश कर दावा किया कि पूरण सिंह डिमेंशिया से पीड़ित है और कोर्ट की कार्यवाही समझने तथा अपना बचाव प्रस्तुत करने की स्थिति में नहीं है।
इसी आधार पर आरोपी को बेटे की सुपुर्दगी में देने की मांग की गई।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कोर्ट में यह तर्क रखा कि आरोपी के बेटे द्वारा प्रस्तुत आवेदन समय से पहले (Premature) दायर किया गया था।
उनका कहना था कि धारा 329 Cr.P.C. के तहत इस प्रकार का आवेदन तभी विचारणीय होता है, जब ट्रायल शुरू हो चुका हो, जबकि इस मामले में अभी तक आरोप तय ही नहीं हुए थे और न ही ट्रायल प्रारंभ हुआ था। इसलिए ट्रायल कोर्ट को आवेदन स्वीकार नहीं करना चाहिए था।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि ट्रायल कोर्ट ने बिना पर्याप्त आधार के आरोपी को रिहा कर दिया, जबकि मेडिकल रिपोर्ट स्पष्ट और निर्णायक नहीं थी।
इस संबंध में जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट के “Johar Mehmood Vs. U.T. of Jammu and Kashmir and Ors.” फैसले का हवाला भी दिया गया।
आरोपी की ओर से दलीलें
मामले में आरोपी और प्रतिवादी पूरण सिंह की ओर से तथा राज्य सरकार की ओर से लोक अभियोजक ने याचिका का विरोध किया और ट्रायल कोर्ट के आदेश को सही ठहराया।
आरोपी पक्ष का मुख्य तर्क था कि पूरण सिंह गंभीर मानसिक बीमारी “डिमेंशिया” से पीड़ित है और उसकी मानसिक स्थिति इतनी कमजोर हो चुकी है कि वह कोर्ट की कार्यवाही को समझने, आरोपों को जानने या अपना बचाव करने की स्थिति में नहीं है। इसलिए निष्पक्ष ट्रायल संभव नहीं है।
प्रतिवादी पक्ष ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट का भी हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया कि आरोपी “Dementia with BPSD (Behavioral and Psychological Symptoms of Dementia)” से पीड़ित है। मेडिकल बोर्ड ने यह राय दी कि संज्ञानात्मक क्षमता (Cognitive Impairment) प्रभावित होने के कारण आरोपी कोर्ट की कार्यवाही में भाग लेने और उसे समझने में असमर्थ है।
प्रतिवादी पक्ष ने यह भी कहा कि बीमारी लगातार बढ़ने वाली प्रकृति की है और निकट भविष्य में सुधार की संभावना बहुत कम है। ऐसे में आरोपी को ट्रायल फेस कराने का प्रयास उसके संवैधानिक अधिकारों और निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांतों के विपरीत होगा।
राज्य सरकार और आरोपी पक्ष ने यह भी समर्थन किया कि यदि भविष्य में मेडिकल बोर्ड आरोपी को मानसिक रूप से स्वस्थ घोषित करता है, तो ट्रायल की कार्यवाही दोबारा शुरू की जा सकती है। फिलहाल आरोपी को उसके बेटे की देखरेख में रखना उचित और कानूनी है।
हाईकोर्ट ने किया मेडिकल बोर्ड गठित
पूर्व में सुनवाई के दौरान आरोपी पूरण सिंह के बेटे की ओर से पेश की गई प्रारंभिक मेडिकल रिपोर्ट पर हाईकोर्ट ने सवाल खड़े किए।
प्रारंभिक मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को अस्पष्ट मानते हुए हाईकोर्ट ने एसएमएस मेडिकल कॉलेज जयपुर में नया मेडिकल बोर्ड गठित करने के निर्देश दिए थे।
कोर्ट के आदेश के बाद गठित नए मेडिकल बोर्ड ने आरोपी पूरण सिंह की विस्तृत जांच की। बोर्ड में मनोचिकित्सा विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर, विशेषज्ञ चिकित्सक और क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट शामिल थे।
मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में पाया कि आरोपी “डिमेंशिया विद बीपीएसडी” (Behavioral and Psychological Symptoms of Dementia) से पीड़ित है और उसकी मानसिक स्थिति इतनी कमजोर है कि वह कोर्ट की कार्यवाही को समझने और उसमें भाग लेने में सक्षम नहीं है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि बीमारी की प्रकृति लगातार बढ़ने वाली है और निकट भविष्य में सुधार की संभावना बेहद कम है।
हाईकोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पर भरोसा जताते हुए कहा कि जब यह स्थापित हो चुका है कि आरोपी मानसिक रूप से ट्रायल फेस करने योग्य नहीं है, तब केवल आरोप तय होने की प्रतीक्षा करना “खाली औपचारिकता” होगी।
हाईकोर्ट का फैसला
राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने अपने फैसले में कहा कि किसी भी आरोपी के खिलाफ तब तक आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, जब तक उसे मानसिक रूप से स्वस्थ घोषित न किया जाए।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है और किसी भी व्यक्ति को बिना सुने दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई आरोपी मानसिक रूप से अस्वस्थ है और उसमें आरोपों को समझने, कोर्ट की कार्यवाही का पालन करने तथा अपना बचाव प्रस्तुत करने की क्षमता नहीं है, तो उसके खिलाफ ट्रायल जारी रखना निष्पक्ष सुनवाई के मूल सिद्धांतों के खिलाफ होगा।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसी स्थिति में आपराधिक न्याय प्रक्रिया ही प्रभावित हो जाती है।
जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने कहा कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की रक्षा करने और निष्पक्ष ट्रायल सुनिश्चित करने के लिए आरोपी की मानसिक स्थिति का परीक्षण आवश्यक है।
एकलपीठ ने माना कि यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि आरोपी कोर्ट की कार्यवाही को समझने और अपनी ओर से बचाव करने में सक्षम है या नहीं।
कोर्ट ने धारा 329 Cr.P.C. का विस्तृत उल्लेख करते हुए कहा कि यदि ट्रायल के दौरान यह प्रतीत हो कि आरोपी अस्वस्थ मस्तिष्क का है और अपना बचाव नहीं कर सकता, तो अदालत को सबसे पहले उसकी मानसिक स्थिति का परीक्षण कराना होगा।
इसके लिए मनोचिकित्सक और क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट से युक्त मेडिकल बोर्ड की राय लेना अनिवार्य है।
नए मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट
इसी कारण कोर्ट ने एसएमएस मेडिकल कॉलेज जयपुर में नया मेडिकल बोर्ड गठित करने के निर्देश दिए थे।
हाईकोर्ट ने कहा कि विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा आरोपी की विस्तृत मानसिक जांच कर यह स्पष्ट राय दी जानी चाहिए कि क्या आरोपी ट्रायल में भाग लेने और कोर्ट की कार्यवाही समझने की स्थिति में है।
नए मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पर टिप्पणी करते हुए जस्टिस ढंड ने कहा कि बोर्ड के सभी सदस्यों ने एकमत होकर पाया कि आरोपी पूरण सिंह “Dementia with BPSD” से पीड़ित है।
कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि संज्ञानात्मक क्षमता (Cognitive Impairment) प्रभावित होने के कारण आरोपी कोर्ट की कार्यवाही समझने और उसमें भाग लेने में असमर्थ है।
साथ ही बीमारी लगातार बढ़ने वाली है और निकट भविष्य में सुधार की संभावना बेहद कम है।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता की उस दलील को खारिज कर दिया कि धारा 329 Cr.P.C. के तहत आवेदन आरोप तय होने से पहले दायर नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा कि जब मेडिकल बोर्ड की राय से यह स्थापित हो चुका है कि आरोपी मानसिक रूप से ट्रायल फेस करने में अक्षम है, तब केवल आरोप तय होने की प्रतीक्षा करना “खाली औपचारिकता” (Empty Formality) होगी।
जस्टिस ढंड ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में आरोपी पूरण सिंह ट्रायल फेस करने की मानसिक स्थिति में नहीं है, इसलिए उसे बेटे की सुपुर्दगी में छोड़ने के ट्रायल कोर्ट के आदेश में कोई त्रुटि नहीं है।
ट्रायल कोर्ट का आदेश बहाल
राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए आरोपी को उसके बेटे की सुपुर्दगी में रखने के आदेश को बरकरार रखा।
साथ ही हाईकोर्ट ने धौलपुर जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) को निर्देश दिया कि आरोपी को हर वर्ष दिसंबर के दूसरे सप्ताह में एसएमएस अस्पताल जयपुर के मेडिकल बोर्ड के सामने पेश किया जाए, ताकि उसकी मानसिक स्थिति की समीक्षा हो सके।
कोर्ट ने कहा कि यदि भविष्य में मेडिकल बोर्ड यह राय देता है कि आरोपी मानसिक रूप से स्वस्थ हो गया है और ट्रायल समझने की स्थिति में है, तो ट्रायल कोर्ट धारा 331 Cr.P.C. के तहत मुकदमे की कार्यवाही दोबारा शुरू कर सकेगा।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी।