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लिव-इन रिलेशनशिप से जन्मी बेटी पर फैमिली कोर्ट का बड़ा आदेश: लंदन निवासी पिता को महीने में दो बार वीडियो कॉल का अधिकार

Jaipur Family Court Grants London-Based Father Virtual Access to Daughter Born From Live-in Relationship

जयपुर फैमिली कोर्ट ने कहा- बच्ची को पिता के प्यार से वंचित नहीं किया जा सकता, भावनात्मक और मानसिक विकास पर पड़ेगा असर

जयपुर। राजधानी जयपुर के पारिवारिक न्यायालय ने एक बेहद संवेदनशील और चर्चित मामले में महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश पारित करते हुए लंदन निवासी पिता को अपनी साढ़े तीन वर्षीय बेटी से महीने में दो बार वीडियो कॉल के जरिए बात करने का अधिकार दिया है।

मामला एक लिव-इन रिलेशनशिप से जन्मी बच्ची की अभिरक्षा और पिता के संपर्क अधिकार से जुड़ा हुआ है।

पारिवारिक न्यायालय ने अपने आदेश में साफ कहा कि किसी भी बच्चे को उसके पिता के स्नेह, प्रेम और भावनात्मक जुड़ाव से वंचित नहीं किया जा सकता।

यह मामला उस समय चर्चा में आया जब यूनाइटेड किंगडम (लंदन) निवासी व्यक्ति मारिउज मिचल्स्की पियोत्र ने जयपुर फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर अपनी बेटी से संपर्क कराने की मांग की।

याचिका में कहा गया कि बच्ची की मां द्वारा उसे बेटी से मिलने और बात करने से रोका जा रहा है।

क्या है पूरा मामला?

कोर्ट रिकॉर्ड के अनुसार लंदन निवासी मारिउज मिचल्स्की पियोत्र की मुलाकात वर्ष 2022 में गोवा के एक हॉस्टल में जयपुर निवासी महिला से हुई थी।

दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं और बाद में दोनों लिव-इन रिलेशनशिप में रहने लगे।

याचिका में दावा किया गया कि दोनों के बीच भावनात्मक संबंध बने और साथ रहने के दौरान बेटी “दर्पणा” का जन्म 16 दिसंबर 2022 को हुआ।

याचिकाकर्ता पिता ने अदालत को बताया कि वह लंबे समय तक बच्ची और उसकी मां के साथ रहा, आर्थिक सहायता देता रहा और बच्ची की देखभाल में भी शामिल रहा।

लेकिन समय के साथ दोनों के संबंधों में तनाव बढ़ गया और मां ने बच्ची को पिता से दूर करना शुरू कर दिया।

पिता ने अदालत में क्या कहा?

पिता की ओर से अधिवक्ता सुनील शर्मा और गिरीश सिंघल ने अदालत में कहा कि बच्ची को उसके पिता के प्रेम और स्नेह से दूर रखना उसके भावनात्मक और मानसिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

याचिका में कहा गया कि पिता लगातार बेटी से वीडियो कॉल और फोन पर संपर्क करने की कोशिश करता रहा, लेकिन मां उसे ऐसा करने से रोकती रही।

पिता ने यह भी दावा किया कि कई बार बच्ची की तस्वीरें और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी मांगने पर भी उसे नहीं दी गई।

पिता ने अदालत को बताया कि वह लंदन में इलेक्ट्रिकल सर्विसेज और कंसल्टेंसी का व्यवसाय करता है और अपनी बेटी की शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य को लेकर बेहद चिंतित है।

मां ने क्या कहा?

मामले में मां की ओर से अदालत में पिता की याचिका का विरोध करते हुए कहा कि पिता विदेश में रहता है और बच्ची को विदेश ले जाने की मंशा रखता है।

मां की ओर से यह भी कहा गया कि पिता की याचिका तथ्यों पर आधारित नहीं है और बच्ची के हित को देखते हुए उसे सीमित अधिकार ही दिए जाने चाहिए।

हालांकि अदालत ने इस स्तर पर अंतिम निर्णय देने के बजाय बच्ची के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता देते हुए अंतरिम व्यवस्था लागू करना उचित माना।

फैमिली कोर्ट की अहम टिप्पणी

जयपुर महानगर प्रथम के पारिवारिक न्यायालय क्रम-4 के पीठासीन अधिकारी ने अपने आदेश में कहा कि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए बच्ची को पिता के स्नेह, प्रेम और वात्सल्य से पूरी तरह दूर रखना उचित नहीं माना जा सकता।

अदालत ने कहा कि पिता से संवाद करना बच्चे का भी अधिकार है।

कोर्ट ने कहा कि यदि किसी बच्ची को उसके पिता के प्रेम और भावनात्मक जुड़ाव से वंचित रखा जाता है, तो उसके शारीरिक और मानसिक विकास पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

अदालत ने यह भी माना कि मामले के अंतिम निस्तारण में समय लग सकता है, इसलिए अंतरिम व्यवस्था के तौर पर पिता को बेटी से वीडियो कॉल पर बात करने का अधिकार दिया जाना आवश्यक है।

अदालत ने क्या आदेश दिया?

फैमिली कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि—

पिता प्रत्येक महीने के तीसरे और चौथे रविवार को सुबह 11 बजे से दोपहर 12 बजे तक बेटी से वीडियो कॉल के जरिए बात कर सकेगा।

मां को हर महीने बच्ची की शिक्षा और स्वास्थ्य से संबंधित रिपोर्ट पिता को उपलब्ध करानी होगी।

यदि किसी विशेष परिस्थिति में निर्धारित दिन वीडियो कॉल संभव न हो तो दोनों पक्ष पूर्व सूचना देकर अगली तिथि तय करेंगे।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह केवल अंतरिम व्यवस्था है और मामले की अंतिम सुनवाई अभी बाकी है।

अदालत ने बच्ची के हित को माना सर्वोपरि

फैमिली कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि किसी भी अभिरक्षा विवाद में बच्चे का हित सर्वोपरि होता है।

अदालत ने कहा कि बच्ची का अपने पिता से संपर्क बनाए रखना उसके मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए आवश्यक है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि एक पिता की भूमिका केवल जैविक संबंध तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह बच्चे के भावनात्मक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

लिव-इन रिलेशनशिप और कानूनी अधिकार

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह लिव-इन रिलेशनशिप से जन्मे बच्चे के अधिकारों से जुड़ा है।

सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट पहले भी यह स्पष्ट कर चुके हैं कि लिव-इन रिलेशनशिप से जन्मे बच्चों को कानूनी संरक्षण प्राप्त है और उनके अधिकारों की रक्षा करना अदालतों की जिम्मेदारी है।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार फैमिली कोर्ट का यह आदेश इस बात को मजबूत करता है कि बच्चे का हित किसी भी व्यक्तिगत विवाद से ऊपर है।

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