तीन साल के डिबारमेंट पर मणिपाल एनर्जी एंड इन्फ्राटेक को राजस्थान हाईकोर्ट की बड़ी राहत, AVVNL का आदेश रद्द
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकारी निविदाओं में कंपनियों/फर्म को ब्लैकलिस्टिंग और डिबारमेंट की कार्रवाई को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि बिना स्पष्ट शो-कॉज नोटिस दिए किसी कंपनी को ब्लैकलिस्ट या डिबार करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (AVVNL) द्वारा जारी तीन साल के डिबारमेंट आदेश को रद्द करते हुए यह फैसला दिया है।
जस्टिस गणेश राम मीणा की एकलपीठ ने मणिपाल एनर्जी एंड इन्फ्राटेक लिमिटेड (MEIL) और उसके एमडी एवं सीईओ सागर मुखोपाध्याय की याचिका स्वीकार करते हुए यह फैसला दिया है।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने 11 जुलाई 2025 को पारित AVVNL के आदेश को निरस्त कर दिया। अदालत ने आदेश के सभी परिणामी प्रभावों को भी समाप्त कर दिया।
मामले में याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल मेहता और दिव्येश माहेश्वरी ने पैरवी की।
क्या था पूरा मामला?
मामला वर्ष 2021 में AVVNL द्वारा जारी एक टेंडर से जुड़ा था।
इस टेंडर में भाग लेने के लिए मणिपाल एनर्जी एंड इन्फ्राटेक लिमिटेड (MEIL) और के.एस. प्रोजेक्ट्स के बीच एक संयुक्त उपक्रम (Joint Venture) बनाया गया था।
बाद में AVVNL ने आरोप लगाया कि कार्य निष्पादन में गंभीर अनियमितताएं हुईं, जिसके आधार पर 11 जुलाई 2025 को MEIL को तीन वर्षों के लिए सभी निविदाओं में भाग लेने से डिबार कर दिया गया।
साथ ही कंपनी की ₹73 लाख की ईएमडी तथा उस पर 18 प्रतिशत जीएसटी जब्त करने और लगभग ₹3.12 करोड़ की “रिस्क एंड कॉस्ट” राशि तथा अन्य वसूली के आदेश भी जारी किए गए।
याचिकाकर्ता की दलीलें
याचिकाकर्ता मणिपाल एनर्जी एंड इन्फ्राटेक लिमिटेड (MEIL) और उसके एमडी एवं सीईओ सागर मुखोपाध्याय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल मेहता और दिव्येश माहेश्वरी ने अदालत को बताया कि MEIL की भूमिका केवल अपनी तकनीकी योग्यता उपलब्ध कराने तक सीमित थी, जबकि परियोजना का वास्तविक निष्पादन, वित्तीय जिम्मेदारी, संचालन, वैधानिक अनुपालन और साइट से जुड़े सभी कार्य के.एस. प्रोजेक्ट्स को करने थे।
अधिवक्ता ने कहा कि AVVNL द्वारा 20 सितंबर 2024 को जारी शो-कॉज नोटिस में कहीं भी डिबारमेंट या ब्लैकलिस्टिंग की प्रस्तावित कार्रवाई का उल्लेख नहीं था। नोटिस केवल कुछ कथित अनियमितताओं पर स्पष्टीकरण मांगने तक सीमित था।
अधिवक्ता ने कहा कि इसके बावजूद बाद में सीधे तीन वर्षों के डिबारमेंट, ₹73 लाख की EMD जब्ती, GST वसूली और करोड़ों रुपये की “रिस्क एंड कॉस्ट” रिकवरी का आदेश जारी कर दिया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि RTPP Act, 2012 की धारा 46(5) के अनुसार किसी भी bidder को डिबार करने से पहले उसे सुनवाई का उचित अवसर देना अनिवार्य है।
चूंकि कोई विशेष शो-कॉज नोटिस जारी नहीं किया गया, इसलिए पूरी कार्रवाई कानून विरुद्ध है।
याचिकाकर्ता पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के Gorkha Security Services बनाम GNCT Delhi, UMC Technologies बनाम FCI, Kulja Industries और Blue Dreamz Advertising जैसे फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ब्लैकलिस्टिंग या डिबारमेंट “civil death” के समान गंभीर परिणाम उत्पन्न करती है, इसलिए स्पष्ट और विशेष नोटिस देना आवश्यक है।
अधिवक्ता ने यह भी कहा कि impugned order उन्हें समय पर संप्रेषित भी नहीं किया गया। जानकारी मिलने के बाद 31 जुलाई 2025 को विस्तृत प्रतिनिधित्व प्रस्तुत किया गया, लेकिन उस पर कोई विचार नहीं किया गया।
पूरी कार्रवाई मनमानी, असंगत और संविधान के अनुच्छेद 14 तथा 19(1)(g) का उल्लंघन है।
AVVNL का जवाब
इस मामले में प्रतिवादी AVVNL की ओर से अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि RTPP Act की धारा 11 और 46 के तहत निगम को कार्रवाई करने का अधिकार प्राप्त है।
AVVNL ने कहा कि संयुक्त उपक्रम के दस्तावेजों और पावर ऑफ अटॉर्नी में स्पष्ट रूप से यह शर्त मौजूद थी कि यदि bidding process या code of integrity का उल्लंघन होता है, तो संबंधित bidder को तीन वर्ष तक डिबार किया जा सकता है।
AVVNL ने यह भी कहा कि Joint Venture Undertaking में सभी साझेदारों की संयुक्त और पृथक (joint and several) जिम्मेदारी तय की गई थी।
इसलिए MEIL यह नहीं कह सकती कि उसकी भूमिका सीमित थी और वह परियोजना के निष्पादन में हुई कथित अनियमितताओं के लिए जिम्मेदार नहीं है।
AVVNL ने यह भी दलील दी कि CE Level Committee तथा बाद में CLPC द्वारा मामले पर विचार किया गया और रिकॉर्ड के आधार पर डिबारमेंट की अनुशंसा की गई। AVVNL ने यह भी कहा कि RTPP Act के प्रावधानों के तहत impugned order पूरी तरह वैध है।
वहीं प्रतिवादी नंबर-2 के.एस. प्रोजेक्ट्स की ओर से कहा गया कि वर्ष 2022 में बिलों को स्वीकृति मिल चुकी थी और रिकॉर्ड पर ऐसा कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है, जिससे joint venture partners को धोखाधड़ी या जालसाजी का दोषी माना जा सके। साथ ही किसी प्रकार की आपराधिक FIR या forgery case भी दर्ज नहीं किया गया था।
हाईकोर्ट ने क्या माना?
जस्टिस गणेश राम मीणा ने अपने विस्तृत फैसले में कहा कि किसी भी कंपनी या व्यक्ति को ब्लैकलिस्ट या डिबार करना अत्यंत कठोर प्रशासनिक कार्रवाई है, जिसके गंभीर नागरिक और व्यावसायिक परिणाम होते हैं।
इसलिए ऐसी कार्रवाई से पहले प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पूर्ण पालन अनिवार्य है।
जस्टिस गणेश राम मीणा ने स्पष्ट कहा कि इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या बिना विशेष शो-कॉज नोटिस दिए किसी bidder को डिबार किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने RTPP Act की धारा 46(5) का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी भी bidder को डिबार करने से पहले उसे “reasonable opportunity of being heard” देना कानूनन आवश्यक है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले Gorkha Security Services Vs. GNCT of Delhi का हवाला देते हुए कहा कि शो-कॉज नोटिस का उद्देश्य केवल आरोप बताना नहीं होता, बल्कि प्रस्तावित कार्रवाई की स्पष्ट जानकारी देना भी होता है।
कठोर कार्रवाई का उल्लेख जरूरी
यदि प्राधिकरण ब्लैकलिस्टिंग या डिबारमेंट जैसी कठोर कार्रवाई करना चाहता है, तो नोटिस में इसका स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए, ताकि संबंधित पक्ष प्रभावी बचाव प्रस्तुत कर सके।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह सिद्धांत उद्धृत किया कि केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि “अन्य उचित कार्रवाई” की जा सकती है।
कोर्ट ने कहा कि ब्लैकलिस्टिंग जैसी कार्रवाई के लिए विशेष और स्पष्ट चेतावनी देना आवश्यक है, क्योंकि यह “civil death” के समान परिणाम उत्पन्न करती है।
हाईकोर्ट ने UMC Technologies बनाम FCI और Kulja Industries मामलों का भी उल्लेख करते हुए कहा कि ब्लैकलिस्टिंग किसी व्यक्ति या कंपनी की प्रतिष्ठा और भविष्य के व्यवसाय पर गहरा प्रभाव डालती है।
इसलिए बिना स्पष्ट नोटिस के पारित आदेश न्यायिक समीक्षा में टिक नहीं सकते।
अलग या विशेष नोटिस नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध 20 सितंबर 2024 का शो-कॉज नोटिस देखने से स्पष्ट है कि उसमें केवल कथित त्रुटियों और कुछ “panel action” की बात कही गई थी। नोटिस में कहीं भी यह नहीं बताया गया कि याचिकाकर्ता को तीन वर्षों के लिए डिबार या ब्लैकलिस्ट किया जा सकता है।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि बाद में 4 मार्च 2025, 20 मार्च 2025 और 28 अप्रैल 2025 को केवल राशि वसूली से संबंधित पत्र जारी किए गए।
इसके बाद CE Level Committee ने 21 मई 2025 को दो वर्ष के डिबारमेंट की सिफारिश की, जबकि CLPC ने 19 जून 2025 की बैठक में इसे बढ़ाकर तीन वर्ष कर दिया। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया के दौरान याचिकाकर्ता को डिबारमेंट के संबंध में कोई अलग या विशेष नोटिस नहीं दिया गया।
न्यायालय ने कहा कि किसी भी प्रतिकूल कार्रवाई से पहले संबंधित पक्ष को स्पष्ट रूप से यह बताना आवश्यक है कि उसके खिलाफ कौन-सी कार्रवाई प्रस्तावित है, ताकि वह उचित स्पष्टीकरण और दस्तावेज प्रस्तुत कर सके। ऐसा न करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
जस्टिस गणेश राम मीणा ने यह भी कहा कि ब्लैकलिस्टिंग या डिबारमेंट का आदेश केवल इसलिए वैध नहीं माना जा सकता कि टेंडर दस्तावेजों में ऐसी शक्ति का उल्लेख है।
कानून यह अपेक्षा करता है कि संबंधित प्राधिकरण स्वतंत्र रूप से मन लगाकर निर्णय ले और प्रभावित पक्ष को सुनवाई का वास्तविक अवसर दे।
कोर्ट की अहम टिप्पणी
अदालत ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि 20 सितंबर 2024 का शो-कॉज नोटिस केवल “पैनल एक्शन” तक सीमित था।
बाद में अलग-अलग पत्रों के माध्यम से राशि वसूली की कार्रवाई की गई, लेकिन डिबारमेंट की प्रस्तावित कार्रवाई के बारे में कोई स्पष्ट नोटिस नहीं दिया गया।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पहले सीई लेवल कमेटी ने दो वर्ष के डिबारमेंट की सिफारिश की थी, जबकि बाद में CLPC ने तीन वर्ष का डिबारमेंट तय कर दिया। इसके बावजूद याचिकाकर्ता को कोई अतिरिक्त अवसर नहीं दिया गया।
आदेश रद्द
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने माना कि AVVNL की कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है और कानूनन टिकाऊ नहीं है।
अदालत ने 11 जुलाई 2025 का डिबारमेंट आदेश रद्द करते हुए याचिका स्वीकार कर ली और सभी परिणामी लाभ याचिकाकर्ता कंपनी को देने के निर्देश दिए।
हाईकोर्ट ने impugned order को निरस्त करने का आदेश दिया है