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BREAKING: आदर्श क्रेडिट घोटाले में आरोपी CEO राजीव कुमार राणा की डिफॉल्ट बेल रद्द, 4 सप्ताह में सरेंडर का आदेश, ट्रायल कोर्ट पर सख्त टिप्पणी

BREAKING | Rajasthan HC Cancels Default Bail of Adarsh Credit Scam Accused Rajeev Kumar Rana, Orders Surrender in 4 Weeks

9238 करोड़ रुपये के कथित घोटाले में हाईकोर्ट सख्त, कहा- “अधूरी चार्जशीट मानकर बेल देना गंभीर त्रुटि”, राजस्थान सरकार की याचिका मंजूर

जयपुर। बहुचर्चित “आदर्श क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसायटी घोटाले” में राजस्थान हाईकोर्ट ने एक बड़ा और सख्त फैसला सुनाते हुए आरोपी राजीव कुमार राणा को मिली डिफॉल्ट बेल रद्द कर दी है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि केवल इस आधार पर कि जांच कुछ बिंदुओं पर लंबित थी, चार्जशीट को “अपूर्ण” मान लेना कानून की गलत व्याख्या है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने बिना पर्याप्त न्यायिक परीक्षण के आरोपी को डिफॉल्ट बेल देकर गंभीर त्रुटि की।

जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकल पीठ ने राणा को ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई डिफॉल्ट बेल के खिलाफ दायर राजस्थान सरकार की जमानत रद्द करने की याचिका को स्वीकार करते हुए यह फैसला दिया है।

गौरतलब है कि जयपुर महानगर द्वितीय के Additional Sessions Judge No. 6 की अदालत ने 23 नवंबर 2022 को सीईओ आरोपी राजीव कुमार राणा को सीआरपीसी की धारा 167(2) के तहत डिफॉल्ट बेल दी थी।

हजारों करोड़ का मामला

यह मामला एसओजी थाना जयपुर में दर्ज एफआईआर नंबर 24/2018 से जुड़ा है, जिसे देश के सबसे बड़े सहकारी घोटालों में से एक माना जाता है।

प्रदेश के करीब 22 लाख निवेशकों की लगभग 14,000 करोड़ रुपये की जीवन भर की पूंजी इस घोटाले में फंसी हुई है।

करीब 200 लोगों के एक संगठित गिरोह ने 125 से अधिक शेल कंपनियां बनाकर आम जनता की मेहनत की कमाई को हड़पने का आरोप है।

मामले में आरोप है कि आदर्श क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसायटी के जरिए हजारों करोड़ रुपये का निवेशकों का पैसा शेल कंपनियों में ट्रांसफर किया गया।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इस आर्थिक अपराध को गंभीर बताते हुए कहा कि ऐसे मामलों में अदालतों को “समग्र और संतुलित दृष्टिकोण” अपनाने की आवश्यकता है क्योंकि इसमें आम जनता की गाढ़ी कमाई दांव पर लगी होती है।

क्या है पूरा मामला?

राजीव कुमार राणा को 13 अप्रैल 2022 को गिरफ्तार किया गया था। राजीव कुमार राणा बैंक का सीईओ था और उसने ₹393 करोड़ का ऋण वितरित किया।

एसओजी ने इससे पहले 22 जुलाई 2019 को 15 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी, जिनमें रोहित मोदी, राहुल मोदी और कमलेश चौधरी जैसे नाम शामिल थे।

आरोप है कि मुख्य आरोपी मुकेश मोदी और उसके सहयोगियों ने लगभग 9238 करोड़ रुपये 125 शेल कंपनियों में ट्रांसफर किए।

बाद में एसओजी ने 8 जुलाई 2022 को तीसरी चार्जशीट दाखिल की, लेकिन साथ ही धारा 173(8) सीआरपीसी के तहत आगे की जांच जारी रखी।

इसी बिंदु को आधार बनाकर आरोपी पक्ष ने दावा किया कि जांच पूर्ण नहीं हुई है और इसलिए उन्हें डिफॉल्ट बेल का अधिकार प्राप्त है। इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट ने नवंबर 2022 में आरोपी को बेल दे दी थी।

राजस्थान सरकार की दलीलें

राजस्थान सरकार की ओर से लोक अभियोजक ने हाईकोर्ट में कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी राजीव कुमार राणा को दी गई डिफॉल्ट बेल पूरी तरह कानून के विपरीत थी।

राज्य का मुख्य तर्क था कि आरोपी को धारा 167(2) सीआरपीसी के तहत डिफॉल्ट बेल का कोई अधिकार नहीं था क्योंकि एसओजी ने 8 जुलाई 2022 को समय सीमा के भीतर चार्जशीट दाखिल कर दी थी। इसलिए डिफॉल्ट बेल का अधिकार उसी समय समाप्त हो गया था।

राज्य सरकार ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने स्वयं अपने आदेश में यह स्वीकार किया था कि चार्जशीट दाखिल हो चुकी थी, लेकिन केवल इसलिए कि धारा 173(8) सीआरपीसी के तहत आगे की जांच लंबित थी, अदालत ने चार्जशीट को “अपूर्ण” मान लिया।

अभियोजन पक्ष ने दलील दी कि यह निष्कर्ष स्थापित विधिक सिद्धांतों और सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों के विपरीत है।

सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि आरोपी ने डिफॉल्ट बेल का आवेदन चार्जशीट दाखिल होने के बाद प्रस्तुत किया था। ऐसे में कानूनन उसे डिफॉल्ट बेल नहीं मिल सकती थी।

अभियोजन ने अदालत को बताया कि एक बार समय सीमा के भीतर चार्जशीट दाखिल हो जाए, तो आरोपी का धारा 167(2) के तहत मिलने वाला “अपरिहार्य अधिकार” समाप्त हो जाता है।

राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों—विशेषकर Venkatesan Balasubramaniyan vs Intelligence Officer, DRI Bangalore तथा Pandit Dnyanu Khot vs State of Maharashtra—का हवाला देते हुए कहा कि यदि डिफॉल्ट बेल गलत या अवैध तरीके से दी गई हो, तो हाईकोर्ट धारा 439(2) सीआरपीसी के तहत उसे रद्द कर सकता है।

सरकार ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने यह जांचने का प्रयास ही नहीं किया कि चार्जशीट वास्तव में इतनी “अपूर्ण” थी कि उस पर संज्ञान नहीं लिया जा सकता।

केवल आगे की जांच लंबित होना चार्जशीट को अवैध नहीं बनाता। राज्य का कहना था कि अदालत ने बिना न्यायिक परीक्षण के आरोपी को राहत दे दी।

राज्य सरकार ने आर्थिक अपराधों की गंभीरता पर भी जोर दिया।

सरकार के अनुसार, यह मामला हजारों करोड़ रुपये की वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़ा है, जिसमें आम निवेशकों की गाढ़ी कमाई दांव पर लगी है। आरोप है कि करीब ₹9238 करोड़ की राशि 125 शेल कंपनियों में ट्रांसफर की गई। ऐसे मामलों में अदालतों को अधिक सतर्क दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

आरोपी राजीव कुमार राणा की दलीलें

आरोपी राजीव कुमार राणा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने राज्य सरकार की याचिका का कड़ा विरोध किया।

बचाव पक्ष ने सबसे पहले यह तर्क दिया कि आरोपी को नवंबर 2022 में बेल मिली थी और लगभग चार वर्षों बाद बेल रद्द करने का प्रयास कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

बचाव पक्ष ने कहा कि एसओजी द्वारा दाखिल चार्जशीट वास्तव में “पूर्ण चार्जशीट” नहीं थी क्योंकि जांच उसी आरोपी के खिलाफ कई बिंदुओं पर लंबित रखी गई थी।

उनका कहना था कि जब तक जांच पूरी नहीं होती, तब तक न तो विधिवत संज्ञान लिया जा सकता है और न ही मुकदमा प्रभावी रूप से आगे बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में आरोपी को डिफॉल्ट बेल मिलना वैध था।

प्रतिवादी की ओर से सुप्रीम कोर्ट के Fakhrey Alam vs State of Uttar Pradesh और Kamlesh Chaudhary vs State of Haryana जैसे फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि डिफॉल्ट बेल केवल चार्जशीट दाखिल होने से स्वतः समाप्त नहीं हो जाती, विशेषकर तब जब चार्जशीट कानूनी रूप से पूर्ण न हो।

बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि यदि जांच अधूरी है, तो आरोपी को धारा 167(2) के तहत संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त रहती है।

आरोपी पक्ष ने यह भी कहा कि 8 जुलाई 2022 को दाखिल चार्जशीट को अदालत ने स्वयं “अपूर्ण” माना था।

इसलिए बाद में उसी आधार पर आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। बचाव पक्ष के अनुसार, ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध तथ्यों और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों को ध्यान में रखते हुए ही डिफॉल्ट बेल दी थी।

प्रतिवादी ने यह भी तर्क दिया कि इसी प्रकार के मामलों में, जो समान तथ्यों पर आधारित थे और जिनकी जांच एसएफआईओ कर रही थी, सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को 10 अप्रैल 2026 को राहत प्रदान की थी।

बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि आरोपी पहले ही 3.5 वर्ष से अधिक जेल में रह चुका है और उसकी ₹93 करोड़ से अधिक की संपत्तियां अटैच की जा चुकी हैं।

बचाव पक्ष ने Arvind Kejriwal vs CBI मामले का हवाला देते हुए कहा कि समान तथ्यों वाले मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को महत्व दिया है। इसलिए वर्तमान मामले में भी आरोपी को राहत मिलनी चाहिए।

इसके अतिरिक्त, आरोपी पक्ष ने Dolat Ram vs State of Haryana फैसले का हवाला देकर कहा कि बेल रद्द करने के लिए “सुपरवेनिंग सर्कम्स्टांसेस” यानी बाद में उत्पन्न हुई गंभीर परिस्थितियां आवश्यक होती हैं।

आरोपी ने बेल का कोई दुरुपयोग नहीं किया, न ही जांच को प्रभावित करने का प्रयास किया। इसलिए केवल विधिक मतभेद के आधार पर बेल रद्द नहीं की जा सकती।

बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि वर्तमान मामले में आरोपी की हिरासत की कोई आवश्यकता नहीं है और राज्य सरकार की याचिका केवल आरोपी को पुनः जेल भेजने का प्रयास है। इसलिए बेल निरस्तीकरण याचिका खारिज की जानी चाहिए।

हाईकोर्ट ने क्यों रद्द की बेल?

जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकल पीठ ने अपने विस्तृत फैसले में कहा कि ट्रायल कोर्ट ने चार्जशीट को “अपूर्ण” मानने के पीछे कोई स्पष्ट कारण दर्ज नहीं किया।

अदालत ने कहा कि यह भी नहीं बताया गया कि वे कौन से चार बिंदु थे जिनके कारण जांच लंबित थी और जिनसे ट्रायल आगे नहीं बढ़ सकता था।

जस्टिस अशोक कुमार जैन ने कहा कि जब चार्जशीट समय सीमा के भीतर दाखिल हो चुकी थी, तब आरोपी का डिफॉल्ट बेल का अधिकार समाप्त हो चुका था।

हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने बिना पर्याप्त परीक्षण के यह मान लिया कि चार्जशीट “कानूनी रूप से पूर्ण” नहीं है, जबकि सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले स्पष्ट कर चुके हैं कि आगे की जांच जारी रहना, चार्जशीट को अमान्य नहीं बनाता।

हाईकोर्ट ने विशेष रूप से सुप्रीम कोर्ट के “सीबीआई बनाम कपिल वाधवान” फैसले का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि यदि धारा 173(2) की आवश्यकताएं पूरी हो जाती हैं और समय पर चार्जशीट दाखिल कर दी जाती है, तो केवल आगे की जांच लंबित रहने से आरोपी को डिफॉल्ट बेल नहीं मिल सकती।

“व्हाइट कॉलर अपराधों में अदालतों को सतर्क रहना होगा”

फैसले में हाईकोर्ट ने आर्थिक अपराधों पर गंभीर टिप्पणी भी की।

हाईकोर्ट ने कहा कि आज के समय में व्हाइट कॉलर अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं और ऐसे मामलों में आरोपी अक्सर शेल कंपनियों के जरिए धन को ऐसी जगह ट्रांसफर कर देते हैं जहां तक जांच एजेंसियों की पहुंच मुश्किल हो जाती है।

कोर्ट ने कहा कि वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में जांच जटिल और समय लेने वाली होती है।

ऐसे मामलों में अदालतों को आरोपी के मौलिक अधिकारों और आम निवेशकों के हितों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। अदालत ने साफ कहा कि “आम आदमी का पैसा” ऐसे घोटालों में दांव पर लगा होता है, इसलिए न्यायिक दृष्टिकोण अत्यंत सावधानीपूर्ण होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का विस्तृत विश्लेषण

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलो का हवाला दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि डिफॉल्ट बेल और नियमित बेल दोनों अलग-अलग अवधारणाएं हैं। डिफॉल्ट बेल आरोपी का एक वैधानिक अधिकार जरूर है, लेकिन यह अधिकार तभी तक रहता है जब तक समय सीमा के भीतर चार्जशीट दाखिल नहीं होती।

कोर्ट ने “वेंकटेशन बालासुब्रमणियन बनाम डीआरआई” मामले का हवाला देते हुए कहा कि यदि डिफॉल्ट बेल गलत तरीके से दी गई हो तो उसे धारा 439(2) के तहत रद्द किया जा सकता है।

इसके अलावा अदालत ने “संजय दत्त बनाम स्टेट”, “उदय मोहनलाल आचार्य”, “एम. रविंद्रन”, “कपिल वाधवान”, “प्रज्ञा सिंह ठाकुर” समेत कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि डिफॉल्ट बेल का अधिकार चार्जशीट दाखिल होने के साथ समाप्त हो जाता है, यदि आरोपी ने उससे पहले उस अधिकार का प्रयोग नहीं किया हो।

एडीजे कोर्ट का फैसला रद्द

जस्टिस अशोक कुमार जैन ने राज्य सरकार की अपील को मंजूर करते हुए Additional Sessions Judge No. 6, Jaipur Metropolitan-II के 23 नवंबर 2022 के आदेश को रद्द कर दिया है।

हाईकोर्ट ने कहा कि CrPC की धारा 167(2) के तहत मिली हुई डिफॉल्ट बेल के लिए राजीव कुमार राणा हकदार नहीं है और मिली हुई जमानत को रद्द किया जाता है।

आरोपी को 4 सप्ताह में करना होगा सरेंडर

अंततः हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की याचिका स्वीकार करते हुए आरोपी राजीव कुमार राणा की डिफॉल्ट बेल रद्द कर दी।

अदालत ने आरोपी को चार सप्ताह का समय देते हुए ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया।

कोर्ट ने साथ ही ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि आरोपी को हिरासत में लिया जाए।

हालांकि अदालत ने यह स्पष्ट किया कि आरोपी चाहे तो बीएनएसएस की धारा 483 के तहत नियमित बेल के लिए आवेदन कर सकता है।

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