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राजस्थान में वेटलैंड्स संकट पर हाईकोर्ट सख्त, अतिक्रमण, प्रदूषण और घटते जल क्षेत्र पर लिया स्वतः संज्ञान, सरकार से मांगा राज्यव्यापी एक्शन प्लान

Rajasthan High Court Seeks Statewide Wetland Action Plan, Takes Suo Motu Cognisance Of Environmental Degradation
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि वेटलैंड सिर्फ जलाशय नहीं, भूजल, जैव विविधता और पर्यावरण सुरक्षा की जीवनरेखा है। कोर्ट ने पूरे राज्य में सर्वे और संरक्षण योजना के आदेश दिए।

जोधपुर: राजस्थान में तेजी से बिगड़ती आर्द्रभूमियों (वेटलैंड्स) की स्थिति को लेकर हाई कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है और स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार से विस्तृत कार्ययोजना मांगी है।

हाईकोर्ट ने कहा कि यह केवल कुछ जलाशयों या झीलों के क्षरण का मामला नहीं है, बल्कि पूरे राज्य के पर्यावरणीय संतुलन, भूजल संरक्षण, जैव विविधता और जल सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा है।

राजस्थान हाईकोर्ट की अवकाशकालीन पीठ, जिसमें जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस रेखा बोरणा शामिल थीं, ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह राजस्थान की सभी आर्द्रभूमियों की पहचान, अधिसूचना, संरक्षण और प्रबंधन से संबंधित विस्तृत रिपोर्ट कोर्ट में प्रस्तुत करे।

कोर्ट ने कहा कि यह समस्या केवल कुछ वेटलैंड्स तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे राज्य में पर्यावरणीय प्रबंधन की एक बड़ी चुनौती को दर्शाती है।

हाईकोर्ट ने अतिक्रमण, प्रदूषण, सीवेज के प्रवाह, कचरा डंपिंग और लगातार सिकुड़ते जल क्षेत्र को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो राज्य की कई महत्वपूर्ण आर्द्रभूमियां स्थायी नुकसान का शिकार हो सकती हैं।

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क्यों महत्वपूर्ण हैं राजस्थान की आर्द्रभूमियां?

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि आर्द्रभूमियां केवल पानी जमा होने वाले क्षेत्र नहीं हैं, बल्कि वे पर्यावरणीय तंत्र का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि वेटलैंड्स:

  • भूजल पुनर्भरण में मदद करती हैं।
  • बाढ़ के प्रभाव को कम करती हैं।
  • जैव विविधता को संरक्षण देती हैं।
  • जल शोधन का प्राकृतिक माध्यम होती हैं।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से लड़ने में मदद करती हैं।

राजस्थान जैसे जल संकट वाले राज्य में इनका महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। कोर्ट ने कहा कि राज्य में जल संरक्षण और पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए आर्द्रभूमियों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।

राज्य में वेटलैंड्स की स्थिति और आंकड़े

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में एक महत्वपूर्ण तथ्य का उल्लेख किया।

कोर्ट के अनुसार राजस्थान में लगभग 46,748 आर्द्रभूमि इकाइयां मौजूद हैं। इसके बावजूद इनमें से केवल सीमित संख्या को ही वेटलैंड्स (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम, 2017 के तहत अधिसूचित किया गया है।

हाईकोर्ट ने कहा कि यह स्थिति चिंताजनक है क्योंकि किसी आर्द्रभूमि को कानूनी संरक्षण मिलने के लिए उसका अधिसूचित होना महत्वपूर्ण माना जाता है।

कोर्ट ने कहा कि समस्या केवल कुछ वेटलैंड्स के क्षरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे राज्य में आर्द्रभूमियों की पहचान, अधिसूचना, संरक्षण और वैज्ञानिक प्रबंधन से जुड़ा व्यापक मुद्दा है।

इसी कारण अदालत ने मामले को एक व्यापक जनहित याचिका के रूप में दर्ज करने का निर्णय लिया।

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हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर दर्ज की जनहित याचिका

हाईकोर्ट ने इस मामले को “राजस्थान राज्य में आर्द्रभूमियों का संरक्षण, अधिसूचना एवं जैव विविधता, भूजल पुनर्भरण तथा पर्यावरणीय स्थिरता का संरक्षण” शीर्षक से स्वतः संज्ञान जनहित याचिका के रूप में दर्ज किया है।

इस कदम के साथ हाईकोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह इस मुद्दे की नियमित निगरानी करेगा।

राज्य सरकार समेत 16 पक्षों को नोटिस

मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और विभिन्न विभागों को पक्षकार बनाया है। हाईकोर्ट ने कुल 16 अधिकारियों और संस्थाओं को नोटिस जारी किए हैं।

इनमें शामिल हैं:

  • मुख्य सचिव
  • पर्यावरण विभाग के प्रमुख सचिव
  • वन विभाग के प्रमुख सचिव
  • नगरीय विकास विभाग
  • स्थानीय स्वशासन विभाग
  • जल संसाधन विभाग
  • भूजल विभाग
  • राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल
  • राज्य वेटलैंड प्राधिकरण
  • राजस्थान जैव विविधता बोर्ड
  • प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव)
  • पर्यावरण निदेशक

इसके अलावा उदयपुर, अजमेर, भरतपुर और फलोदी के जिला कलेक्टरों को भी नोटिस जारी किया गया है। कोर्ट ने सभी संबंधित पक्षों से विस्तृत हलफनामा और स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है।

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हाईकोर्ट ने मांगी विस्तृत राज्यव्यापी रिपोर्ट

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर विस्तृत जानकारी मांगी है।

इनमें जिलेवार आर्द्रभूमियों की सूची, अधिसूचित और गैर-अधिसूचित वेटलैंड्स का विवरण, जीआईएस मैपिंग और सीमा निर्धारण की स्थिति, रामसर स्थलों की वर्तमान स्थिति, अतिक्रमण और अवैध कब्जों की जानकारी, प्रदूषण के स्रोत, जैव विविधता का आकलन, राज्य वेटलैंड प्राधिकरण की कार्यप्रणाली, संरक्षण योजनाओं की प्रगति और पुनर्स्थापन परियोजनाएं समेत उनका वित्तीय प्रबंधन शामिल हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि इन सूचनाओं के बिना राज्य में वेटलैंड संरक्षण की वास्तविक स्थिति का आकलन नहीं किया जा सकता।

पूरे राजस्थान में सर्वे कराने का आदेश

हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश पारित करते हुए पूरे राज्य में आर्द्रभूमियों का सर्वे कराने का निर्देश दिया है।

कोर्ट ने कहा कि संबंधित एजेंसियां राज्यभर में मौजूद सभी प्रमुख वेटलैंड्स की स्थिति का मूल्यांकन करें और उनकी वर्तमान स्थिति की रिपोर्ट तैयार करें।

सर्वे के दौरान यह भी देखा जाएगा कि कहां अतिक्रमण हुआ है, कहां प्रदूषण की समस्या है, कहां जल क्षेत्र सिकुड़ रहा है और किन क्षेत्रों में संरक्षण की तत्काल आवश्यकता है।

अतिक्रमण और निर्माण गतिविधियों पर रोक

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट निर्देश दिया कि किसी भी आर्द्रभूमि क्षेत्र में बिना कानूनी प्रक्रिया अपनाए कोई नया अतिक्रमण, भूमि पुनर्भरण, निर्माण गतिविधि, कचरा डंपिंग या सीमा परिवर्तन नहीं किया जाएगा।

कोर्ट ने कहा कि जब तक मामले की सुनवाई चल रही है, तब तक संबंधित एजेंसियां यह सुनिश्चित करें कि वेटलैंड्स को और नुकसान न पहुंचे।

यह आदेश उन क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जहां शहरी विस्तार, व्यावसायिक गतिविधियों और अवैध कब्जों के कारण आर्द्रभूमियां लगातार सिकुड़ रही हैं।

प्रदूषण नियंत्रण मंडल को विशेष जिम्मेदारी

राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल को भी अदालत ने विशेष जिम्मेदारी सौंपी है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि प्रमुख वेटलैंड्स की जल गुणवत्ता की जांच की जाए और प्रदूषण के पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन किया जाए।

मंडल को यह भी बताना होगा प्रदूषण का स्तर कितना है, उसके पर्यावरणीय जोखिम क्या हैं और प्रदूषण फैलाने वालों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जल प्रदूषण और सीवेज का अनियंत्रित प्रवाह कई आर्द्रभूमियों के अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बन चुका है।

मुख्य सचिव को निर्देश और न्यायमित्रों की नियुक्ति

हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव को आदेश दिया है कि वे इस आदेश की प्रति राज्य के सभी जिला कलेक्टरों को भेजें। साथ ही पूरे राज्य से जिलेवार जानकारी एकत्र कर अदालत के समक्ष प्रस्तुत की जाए।

इससे पहली बार राजस्थान की सभी आर्द्रभूमियों का एक समेकित राज्यव्यापी डेटा तैयार हो सकता है।

वहीं मामले की सुनवाई में सहायता के लिए हाईकोर्ट ने अधिवक्ता जुबिन मेहता, दिविक माथुर और हर्षवर्धन सिंह राठौड़ को न्यायमित्र नियुक्त किया है। ये न्यायमित्र कोर्ट को तकनीकी, कानूनी और पर्यावरणीय पहलुओं पर सहायता प्रदान करेंगे।

क्यों अहम है यह मामला?

राजस्थान में सांभर झील, केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान, उदयसागर, जयसमंद, पुष्कर सरोवर और कई अन्य महत्वपूर्ण आर्द्रभूमियां पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील मानी जाती हैं।

विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि अतिक्रमण, प्रदूषण और अनियोजित विकास के कारण इन क्षेत्रों का अस्तित्व खतरे में पड़ रहा है।

हाईकोर्ट का यह स्वतः संज्ञान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पहली बार पूरे राज्य की आर्द्रभूमियों को एक साथ संरक्षण के दायरे में लाने का प्रयास किया जा रहा है। यदि अदालत के निर्देशों का प्रभावी पालन होता है तो यह राजस्थान में पर्यावरण संरक्षण और जल संसाधन प्रबंधन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है।

हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 6 जुलाई 2026 को निर्धारित की है, जब राज्य सरकार और अन्य विभाग अपनी प्रारंभिक रिपोर्टें प्रस्तुत करेंगे।

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